बंगाल के तलाबों में अब पलने लगी हिलसा मछली, अंतिम चरण में पहुंचा ‘माछेर राजा’ पर शोध

Hilsa Fish: हिलसा मछली खाने के लिए अब न मानसून का इंतजार करना है और न ही नदी तक जाने की जरुरत है, बस तालाब में जाल डालने पर हिलसा मछली निकल आएगी. बंगाल में इसपर काफी दिनों से शोध चल रहा है. काकद्वीप दुनिया के लिए एक बेहतरीन मछली तैयार कर रहा है.

By Ashish Jha | June 28, 2026 12:18 PM

Hilsa Fish: कोलकाता: बंगाल में हिलसा मछली को लेकर गजब की दिवानगी है. बंगाली और हिलसा मछली एक दूसरे के पूरक हैं. मूल रूप से समुद्री मछली हिलसा प्रजनन के लिए नदियों के मीठे जल की ओर आती है. समुद्र और नदी में पाये जानेवाली ‘माछेर राजा’ (मछलियों का राजा) हिलसा अब बंगाल के तालाबों में भी पलने लगी है. तालाबों में हिलसा मछली के पालन पर छठे और अंतिम चरण का शोध चल रहा है.

तालाबों में हिलसा का पैदावार अब संभव

काकद्वीप स्थित केंद्रीय खारे पानी के मत्स्य पालन संस्थान (ICAR-CIBA)ने शोध का अंतिम यानी छठा चरण शुरू कर दिया है. यदि यह चरण भी सफल रहा, तो भविष्य में निजी तालाबों में हिलसा मछली का पालन संभव हो सकेगा. इतना ही नहीं, तालाबों में पाली गई हिलसा मछली बाजार में भी उपलब्ध होगी. हालांकि, तालाबों में हिलसा मछली की खेती आज भी हो रही है, लेकिन यह पूरी तरह सफल प्रयोग नहीं माना गया है.

अभी 982 तालाबों में चल रहा शोध

काकद्वीप स्थित मत्स्य अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक पिछले दस वर्षों से विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं. यह प्रयोग अब पांचवें चरण तक पहुंच चुका है. शोध से पता चला है कि अब तक 982 गांवों में तालाबों में हिलसा मछली की खेती की जा चुकी है. हालांकि, सफलता तभी मिलेगी जब अंडों से बच्चे निकल सकेंगे. इस प्रक्रिया में सफलता प्राप्त करने के लिए शोध का अंतिम चरण चल रहा है.

छठे चरण के शोध में खर्च होंगे 60 लाख

अनुसंधान के पांचवें या अंतिम चरण को सफल बनाने के लिए, मत्स्य अनुसंधान केंद्र में अत्याधुनिक लवणता प्रवणता पुनर्संचारी मत्स्य पालन प्रणाली (आरएएस) का उद्घाटन किया गया. इसका उद्घाटन शनिवार को सुंदरबन विकास मंत्री दीपांकर जाना ने किया. इस अवसर पर आईसीएआर-सीआईबी के निदेशक डॉ. कुलदीप के. लाल और काकद्वीप अनुसंधान केंद्र के प्रमुख डॉ. देबाशीष डे भी उपस्थित थे. इस नई अनुसंधान परियोजना को लगभग 60 लाख टका की लागत से तैयार किया गया है.

एक साल तक चलेगा प्रयोग

काकद्वीप शाखा के प्रधानाध्यापक और हिलसा अनुसंधान के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. देबाशीष डे ने कहा- पूरी परियोजना का निर्माण विभिन्न पारिस्थितिक विधियों का उपयोग करके किया गया है. तीन उथले कुओं में तीन प्रकार का पानी रखा गया है. उस पानी को इलेक्ट्रिक पंप की सहायता से भंवर में बदला गया है. इसके अलावा, पानी के तापमान, प्रदूषण और प्रवाह को नियंत्रित किया गया है और हिलसा के बच्चों को छोड़ा गया है. इस अनुसंधान के लिए लगभग एक वर्ष तक निगरानी की आवश्यकता होगी.

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क्यों है हिलसा मछली खास

हिलसा भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और बर्मा समेत दुनिया भर के 11 देशों में पाई जाती है. भारत में यह महानदी, चिल्का, गोदावरी, रूपनारायण, हुगली और नर्मदा नदियों में पाई जाती है, लेकिन विश्व की 86 प्रतिशत हिलसा मछली अकेले बांग्लादेश में ही होती है. हिलसा बांग्लादेश की राष्ट्रीय मछली भी है और देश के सकल घरेलू उत्पाद में 1 प्रतिशत योगदान हिलसा उत्पादन का है. भारत के पश्चिम बंगाल सरकार ने 2018 में हिलसा के लगातार गिरते उत्पादन के बीच छोटी हिलसा मछली को पकड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, ताकि ये मछली बढ़ सके.

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