एसडीएम के तबादले से ‘आपन सरवस्तिया’ अभियान पर लगा ब्रेक, क्या अधूरी रह जाएगी गढ़वा की जन-क्रांति? 

Aapan Saraswati Campaign: गढ़वा में पूर्व एसडीएम संजय कुमार की पहल पर शुरू हुआ ‘आपन सरवस्तिया’ अभियान जन-सहयोग से नदी पुनर्जीवन की मिसाल बना, लेकिन तबादले के बाद इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई. पूरी खबर नीचे पढ़ें.

By Priya Gupta | June 23, 2026 1:10 PM

अविनाश की रिपोर्ट 

Aapan Saraswati Campaign: इन दिनों गढ़वा में एक नदी सिर्फ साफ नहीं हो रही थी, बल्कि जन-सरोकार और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के समन्वय से एक नया इतिहास लिखा जा रहा था. हम बात कर रहे हैं ‘सरस्वती नदी’ की, जो कभी इंसानी बेरुखी और अतिक्रमण के कारण सिकुड़ कर अपने अस्तित्व के लिए सिसक रही थी. लेकिन देखते ही देखते वही नदी प्रशासन और जनता की अद्भुत जुगलबंदी की एक अनूठी और जीवंत मिसाल बन चुकी थी. तत्कालीन सदर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीएम) संजय कुमार की एक बेहद संवेदनशील पहल ने “आपन सरवस्तिया” अभियान को जन्म दिया था. इस अभियान की सबसे विस्मित और भावुक करने वाली बात यह थी कि इसके लिए न तो सरकारी स्तर पर कोई लंबा-चौड़ा प्राक्कलन तैयार किया गया और न ही कोई विशेष बजटीय प्रावधान हुआ. बिना किसी सरकारी फंड के, बिना किसी टेंडर और संवेदक के, सिर्फ और सिर्फ जनता के सहयोग, अटूट विश्वास और श्रमदान के बल पर यह अभियान अपनी सफलता की नई इबारत लिख रहा था. 

तबादले के बाद धीमा पड़ता दिख रहा ‘आपन सरवस्तिया’ अभियान 

आपन सरस्तवीया अभियान में जेसीबी से हटा था अतिक्रमण

25 मई को तत्कालीन एसडीएम संजय कुमार की पहल पर जन-सहयोग से शुरू हुए “आपन सरवस्तिया” अभियान के तहत नदी के घाटों पर सुबह-शाम जन-आंदोलन की गूंज सुनाई देने लगी थी. यह जीवनदायिनी नदी गढ़वा जिले के मेराल प्रखंड के ‘किनू आहार’ से निकलती है. मेराल से निकलकर यह नदी पूरे गढ़वा शहर को जीवंत करते हुए गुजरती है. गढ़वा के ‘सोनपुरवा’ के पास पहुंचकर यह प्रसिद्ध दानरो नदी में मिल जाती है. लेकिन, नौकरशाही की अपनी एक रीत है—तबादला. एक कुशल और संवेदनशील अधिकारी का जाना व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है, मगर दुखद यह है कि संजय कुमार के जाते ही इस महाभियान की रफ्तार पर अचानक एक बड़ा ‘ब्रेक’ लग गया है. 

जन-सहयोग की मुहिम पर लगा ब्रेक 

जिस नदी के घाटों पर समाज के हर वर्ग के लोग श्रमदान करने जुटते थे, वहां आज एक सन्नाटा और मायूसी पसरी है. जो जन-आंदोलन पूरे झारखंड में नदी संरक्षण और पर्यावरण चेतना को लेकर एक नया ‘नैरेटिव’ यानी विमर्श स्थापित कर रहा था, वह आज प्रशासनिक शिथिलता की भेंट चढ़ता दिख रहा है. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कोई जन-हितैषी अभियान सिर्फ किसी एक अधिकारी के रहने या न रहने पर ही निर्भर होना चाहिए? अगर नेतृत्व की नीयत साफ हो, तो बिना बजटीय बैसाखी के भी युगांतकारी परिवर्तन लाया जा सकता है यह गढ़वा के पूर्व एसडीएम संजय कुमार ने साबित किया. लेकिन उनके जाते ही अभियान का इस तरह सुस्त पड़ जाना प्रशासनिक निरंतरता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है.

क्या जन-भागीदारी की यह मिसाल आगे बढ़ेगी? 

“आपन सरवस्तिया” केवल एक नदी की सफाई का काम नहीं था, बल्कि यह गढ़वा के जनमानस के स्वाभिमान, उनकी पहचान और सामूहिक संकल्प की पुनर्वापसी थी. यहां की मिट्टी में यह सामूहिक चेतना हमेशा से रची-बसी रही है कि जब भी किसी अधिकारी ने अपनी कुर्सी के अहंकार को छोड़कर, नेक नियत के साथ समाज के हित में कदम बढ़ाया है, यहां की जनता ने दलगत और व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठकर खुले दिल से उसका साथ दिया है.

अब यह गढ़वा की प्रबुद्ध जनता और वर्तमान जिला प्रशासन दोनों की अग्निपरीक्षा है. सवाल यह है कि क्या वे एक संवेदनशील अधिकारी की इस खूबसूरत और ऐतिहासिक विरासत को लावारिस छोड़ देंगे, या फिर से एकजुट होकर इसे एक नए मुकाम पर पहुंचाएंगे जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए जन-भागीदारी की एक अमर नजीर पेश की जा सके?

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