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Home Prabhat Khabar Special महंगाई और ईरान युद्ध के खिलाफ अमेरिका में No Kings प्रोटेस्ट क्यों?

महंगाई और ईरान युद्ध के खिलाफ अमेरिका में No Kings प्रोटेस्ट क्यों?

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महंगाई और ईरान युद्ध के खिलाफ अमेरिका में No Kings प्रोटेस्ट क्यों?
अमेरिका में नो किंग्स प्रोटेस्ट

NO Kings Protest and Iran War : ईरान पर अमेरिकी हमले की वजह से अमेरिका में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ गई हैं, साथ ही महंगाई भी तेजी से बढ़ रही है. इस वजह से ट्रंप के निर्णयों से परेशान लोगों ने नो किंग्स (No Kings) प्रोटेस्ट को और तेज कर दिया है. 28 मार्च को अमेरिका में लाखों लोग विभिन्न जगहों पर सड़क पर उतरे और ट्रंप का विरोध किया. अमेरिकी जनता यह मान रही है कि ईरान पर अमेरिका द्वारा किया जा रहा हमला कहीं से भी अमेरिकी हितों और उनकी सुरक्षा से जुड़ा मसला नहीं है.

नो किंग्स (No Kings) प्रोटेस्ट बना बड़ा जनांदोलन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ वहां की जनता ने संगठित होकर विरोध प्रदर्शन किया है. उनका मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों से अमेरिका और अमेरिकियों का नुकसान हो रहा है. ईरान युद्ध इस प्रोटेस्ट की आग को और भी भड़का रहा है, क्योंकि आम अमेरिकी यह मानता है कि ईरान से अमेरिकियों की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है.

Demonstrators-Rally-In-Front-Of-The-Lincoln-Memorial-During-A-No-Kings-Protest-In-Washington
वाशिंगटन में लिंकन मेमोरियल के सामने प्रदर्शन करते लोग

क्या है नो किंग्स प्रोटेस्ट?

अमेरिका एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और वहां के राष्ट्रपति को वहां की जनता स्वयं चुनती है. वह अपनी जनता और वहां की संसद के प्रति उत्तरदायी होता है. अमेरिका का राष्ट्रपति कोई भी ऐसा फैसला नहीं करता है, जिसमें से तानाशाही की बू आती हो. वह कोई भी बड़ा फैसला करने से पहले कांग्रेस की सलाह लेता है, लेकिन अपने दूसरे शासनकाल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई ऐसे फैसले किए हैं, जो एक तानाशाह ही कर सकता है. ईरान जैसे बड़े युद्ध का फैसला लेना उनमें से एक है. इसी वजह से वहां की जनता इस बात को लेकर प्रदर्शन कर रही है कि उन्हें राजा नहीं चाहिए, जो तानाशाही फैसले करता हो.

नो किंग्स प्रोटेस्ट में कौन लोग हुए शामिल?

नो किंग्स प्रोटेस्ट में हर वर्ग के लोग शामिल हैं, जिनमें छात्र, मजदूर, मिडिल क्लास और बुजुर्ग भी शामिल हैं.इस प्रदर्शन में डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े कई लोग भी शामिल हैं. इतना ही नहीं कई सेलिब्रेटी और कलाकारों ने भी नो किंग्स प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया, जिसकी वजह से यह प्रोटेस्ट चर्चा में आ गया है.यह प्रदर्शन अमेरिका में 3000 से ज्यादा स्थानों पर हुआ और लाखों लोगों ने इसमें शिरकत की.

नो किंग्स प्रोटेस्ट का क्या होगा प्रभाव?

नो किंग्स प्रोटेस्ट को अमेरिका के बड़े विरोध प्रदर्शनों में से एक माना जा रहा है. इस विरोध की वजह से डोनाल्ड ट्रंप पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है. यह भी संभव है कि आने वाले चुनावों पर इसका प्रभाव दिखे. ट्रंप सरकार की नीतियों का विरोध हो रहा है, इमिग्रेशन (आव्रजन) नीति से भी आम लोग काफी परेशान हैं, क्योंकि इस मुद्दे पर कड़ी कार्रवाई हुई, जिसकी वजह से कुछ नागरिकों की भी मौत हो गई. ट्रंप की नीतियों से देश में महंगाई बढ़ी है और LGBTQ+ समुदाय के लोगों के अधिकारों और ट्रंप शासन की नीतियों की वजह से भी यह वर्ग नो किंग्स प्रोटेस्ट के साथ खड़ा है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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