क्या कर रहे हो पाकिस्तान : पहले बसंत मनाए, फिर ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम ‘जैन मंदिर चौक’ कर दिए…

पाकिस्तान ने बीते पांच महीने में तीन ऐसे काम किए हैं, जिससे हर हिन्दुस्तानी को जानना चाहिए. क्या इसके पीछे कोई साजिश है? या वो भारत से दोस्ती करना चाहते हैं?

By Achal Priyadarshy | July 2, 2026 8:16 PM

Pakistan : पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री का एक बयान वायरल हो गया है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तानियों को ‘सिंधु घाटी सभ्यता की संतान‘ बताया है. इस टिप्पणी ने व्यापक बहस और ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है, जिसमें कई लोग ऐतिहासिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय विमर्श पर चर्चा कर रहे हैं.

Pakistan : बसंत और विरासत की राजनीति

बसंत की वापसी को सिर्फ़ एक आम त्योहार के फिर से शुरू होने के तौर पर नहीं देखा जा सकता. जब इसे 2026 में लाहौर में फिर से शुरू किया गया, तो इसे ‘पारंपरिक पंजाबी पतंगबाज़ी त्योहार’ के तौर पर पेश किया गया. इससे पता चलता है कि पंजाब में सत्ता में बैठे लोग अब कुछ सांस्कृतिक चीजों को “अपनी विरासत” के तौर पर नए नजरिए से देख रहे हैं. लेकिन, यह भी याद रखना चाहिए कि यही वह बसंत त्योहार है जिस पर सुरक्षा कारणों से 2008 में रोक लगा दी गई थी.

विवाद की असली वजह यही है. जब किसी परंपरा को लंबे समय तक दबाकर रखा जाए और फिर अचानक उसे विरासत, पहचान और गर्व के प्रतीक के तौर पर बढ़ावा दिया जाए, तो उसके असली मकसद पर सवाल उठना लाजमी है. क्या यह सच में संस्कृति को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश है, या फिर राजनीतिक फ़ायदे के लिए इतिहास की चुनिंदा बातों को इस्तेमाल करने का मामला है?

लेखक और इतिहासकार आभास मलदहियार के मुताबिक, पाकिस्तान एक ऐसी सरकारी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जिसने कभी भारत की सभ्यतागत पहचान को ठुकरा दिया था, लेकिन अब वह उसी सभ्यता की मान्यता का फ़ायदा उठाना चाहता है.

लाहौर में सड़कों के पुराने नाम बहाल करने से यह बहस और तेज हो गई है. सरकारी साइनबोर्ड पर हिंदू, सिख, जैन और औपनिवेशिक नामों की वापसी को बंटवारे से पहले की विरासत को बहाल करने के तौर पर पेश किया गया है. यह सिर्फ नाम बदलने की बात नहीं है, यह इस बात की लड़ाई है कि लाहौर की ऐतिहासिक यादों पर असल हक किसका है. अब यह सवाल खुलकर सामने आ गया है कि शहर किस कहानी को अपनी पहचान के तौर पर अपनाएगा.

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पहचान पर यू-टर्न

पाकिस्तान के इतिहास और पहचान से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा उसका दो-मुंहा रवैया है. एक तरफ, उसने शिक्षा, सरकारी बयानों और सार्वजनिक चर्चाओं के जरिए खुद को भारत से अलग दिखाने की कोशिश की, लंबे समय तक उसने इस्लाम-पूर्व भारतीय अतीत को पराया, असहज या बेकार माना. दूसरी तरफ, जब वही अतीत पर्यटन, ‘सॉफ्ट पावर‘ और वैश्विक छवि बनाने के काम का साबित हुआ, तो उसके कुछ हिस्सों को ‘देशी’ या ‘क्षेत्रीय’ बताकर उन्हें फिर से अपनाए जाने की कोशिशें शुरू हुईं.

आलोचक इस प्रक्रिया को ‘आइडेंटिटी लॉन्ड्रिंग’ (पहचान को नया रूप देना) कहते हैं. इसमें पहले किसी विरासत को नकारा जाता है, और फिर जब उसके फायदे दिखने लगते हैं, तो उसी विरासत को नए रूप में पेश करके अपना लिया जाता है. प्रोफेसर डॉ. रोशनी सेनगुप्ता के अनुसार, जिसे ‘पाकिस्तानी संस्कृति’ कहा जाता है, वह असल में इस इलाके के हिंदू सभ्यता वाले अतीत की ही बची-खुची चीज़ें हैं. उनके नजरिए से, ‘पाकिस्तानी संगीत’ जैसा शब्द भी गुमराह करने वाला है, क्योंकि यह असल में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और उत्तर भारतीय लोक परंपराओं का ही आगे का रूप है.

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आभास मलदहियार इसे इतिहास का एक विरोधाभास मानते हैं. वे बताते हैं कि पाकिस्तान की स्थापना इस सोच पर हुई थी कि भारत की हिंदू सभ्यता मुसलमानों के लिए एक साझा राष्ट्रीय पहचान नहीं बन सकती. फिर भी, अब वह देश उसी सभ्यता के प्रतीकों को अपनाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे प्रतीक जिन्हें उसने कभी अपनी राष्ट्रीय परिभाषा से बाहर कर दिया था. यही उलटाव इस विवाद की जड़ है.

लाहौर के पुराने नामों की वापसी इस उलटाव का सबसे साफ उदाहरण है. इन पुराने नामों की वापसी का मतलब सिर्फ़ साइनबोर्ड बदलना नहीं है, यह यादों, पहचान और मालिकाना हक की भाषा में बदलाव को दिखाता है. नतीजतन, यह बदलाव इतिहास की सच्ची कद्र करने के बजाय राजनीतिक तौर पर चीज़ों को नए सिरे से पेश करने जैसा ज़्यादा लगता है.

पाकिस्तान का तर्क

पाकिस्तान की तरफ से बार-बार यह दावा किया जाता रहा है कि वह सिंधु घाटी सभ्यता का उत्तराधिकारी है. कल ही पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री ने दावा किया, “हम पाकिस्तानी सिंधु घाटी सभ्यता की संतान हैं. हाल के महीनों में, इस दावे को और भी खुलकर कहा गया है. इस दावे का आधार यह है कि सिंध, पंजाब, तक्षशिला, हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो जैसी जगहें पाकिस्तान की मौजूदा सीमाओं के अंदर आती हैं. हालाँकि, सिर्फ़ भौगोलिक कब्ज़े से सभ्यता पर मालिकाना हक़ तय नहीं होता.

यही इस विवाद की मुख्य बात है. कोई आधुनिक देश किसी प्राचीन सभ्यता का एकमात्र प्रतिनिधि सिर्फ इसलिए नहीं बन जाता क्योंकि उस सभ्यता के अवशेष उसके इलाके में मौजूद हैं. हालाकि मोहनजो-दड़ो, हड़प्पा, तक्षशिला या लाहौर की विरासत को किसी एक समकालीन देश की अपनी संपत्ति के तौर पर पेश करना आसान हो सकता है, लेकिन ऐसा करना इतिहास की जटिलताओं को बहुत ज़्यादा सरल बना देता है. सभ्यता की परिभाषा सिर्फ खंडहरों से नहीं होती; यह भाषा, यादों, धर्म, साहित्य, वास्तुकला और सांस्कृतिक निरंतरता से बनती है.

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आभास मलदहियार का तर्क है कि जहाँ पाकिस्तान ने शुरू में अपनी कहानी को मुहम्मद बिन कासिम जैसे विजेताओं पर केंद्रित किया था, वहीं अब वही देश पाणिनि, चाणक्य, तक्षशिला और सिंधु-सरस्वती परंपरा पर अपना दावा करता है. यह एक गहरा वैचारिक विरोधाभास है. जो देश अपनी शुरुआत के समय भारत की सभ्यता से दूर हो गया था, वह बाद में उसी सभ्यता का स्वाभाविक उत्तराधिकारी होने का दावा कैसे कर सकता है?

भारतीय संदर्भ में, असली मुद्दा ‘कब्ज़े’ का नहीं, बल्कि ‘सभ्यता की निरंतरता’ का है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा अपनी मौजूदा सीमाओं तक ही सीमित नहीं है. यह आज भी प्राचीन ग्रंथों, धार्मिक परंपराओं, भाषाओं, कला, शहरी नियोजन और सामाजिक यादों में जीवित है. नतीजतन, जब कोई देश इन प्रतीकों को चुनकर उन्हें ‘दक्षिण एशियाई’ या ‘पाकिस्तानी’ बताता है, तो यह साझा विरासत को मानने जैसा कम और राजनीतिक रूप से नई परिभाषा देने की कोशिश जैसा ज़्यादा लगता है.

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सांस्कृतिक दावे और राजनीति

बसंत, सिंधु सभ्यता और प्राचीन प्रतीक, ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं. ये एक बड़ी रणनीति का हिस्सा लगती हैं. रणनीति यह है: पहले अतीत से दूरी बनाना, और फिर, जरूरत पड़ने पर, उसी अतीत को चुनकर अपनाना. डॉ. रोशनी सेनगुप्ता के अनुसार, यह सिर्फ़ सांस्कृतिक लगाव का अचानक से फिर से उभरना नहीं है, बल्कि दुनिया के सामने एक धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु छवि पेश करने की कोशिश भी है. उनके नजरिए से, यह छवि आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक दबावों के बीच संतुलन बनाने के लिए तैयार की जा रही है.

यही वजह है कि बसंत की वापसी को सिर्फ़ एक त्योहार की वापसी के तौर पर नहीं, बल्कि एक अहम संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. यह दिखाता है कि पाकिस्तान अब कुछ ऐसे प्रतीकों को, जिन्हें उसने लंबे समय से हाशिए पर रखा था, फिर से काम का मानने लगा है. फिर भी, यह कदम उसके अंदरूनी विरोधाभास को हल नहीं करता; बल्कि, यह उस विरोधाभास को और भी साफ कर देता है.

एक तरफ़ यह दावा कि ‘हम भारत नहीं हैं,’ और दूसरी तरफ़ बंटवारे से पहले की या हिंदू जड़ों वाली विरासत पर अपना हक जताने की कोशिश, ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं. आभास मलदहियार के शब्दों में, कोई देश उस सभ्यता का स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन सकता जिसे उसने अपनी पहचान बनाते समय ठुकरा दिया था. और जैसा कि डॉ. रोशनी सेनगुप्ता का मानना ​​है, पाकिस्तान की मौजूदा सांस्कृतिक राजनीति इसी दुविधा से उपजी है- न तो अपनी जड़ों को बदल पाने की क्षमता और न ही उनसे पूरी तरह बच पाने की स्थिति.

सूचना युद्ध (Information Warfare) का संदर्भ

भारत और पाकिस्तान के बीच की प्रतिद्वंद्विता अब सिर्फ सीमाओं, सैन्य ताकत या कूटनीति तक सीमित नहीं है. 2025-26 के दौरान चर्चाओं में “सूचना युद्ध” (information warfare), “नैरेटिव फ्रेमिंग” (narrative framing) और “गलत जानकारी” (disinformation) जैसे शब्द अक्सर सामने आए, क्योंकि अब यह संघर्ष सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि सोच, भाषा और वैश्विक धारणा के स्तर पर भी लड़ा जा रहा है.

ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद, कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों पर सवाल उठाए गए क्योंकि वे घटना की मूल वजह और उसके बाद की प्रतिक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर नहीं कर पाईं. कुछ विश्लेषणों में वैश्विक कवरेज में कुछ रुझान देखे गए, जैसे ‘आक्रामक-पीड़ित फ्रेमिंग’ (aggressor-victim framing), ‘हाइफनेशन’ (hyphenation), और हिंसा को उसके संदर्भ से अलग करके दिखाना.

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भू-राजनीतिक विश्लेषक आदि अचिंत के अनुसार, यह मुद्दा साझा भूगोल से कहीं आगे का है. असल बात यह है कि दशकों तक पाकिस्तान ने खुद को वैचारिक रूप से इस्लाम-पूर्व भारत से दूर रखा. उसने हिंदू, बौद्ध और संस्कृत-आधारित इतिहास को विदेशी, घटिया या राजनीतिक रूप से असुविधाजनक बताकर खारिज कर दिया.

लेकिन जब वैश्विक ब्रांडिंग, पर्यटन और ‘सॉफ्ट पावर’ की ज़रूरत पड़ी, तो उसी विरासत को चुनिंदा तौर पर “पाकिस्तानी” बताना शुरू कर दिया. यही वजह है कि सांस्कृतिक दावे संस्कृति से आगे बढ़कर सूचना रणनीति का हिस्सा बन जाते हैं. जब कोई देश अपने अतीत को एक नए लेबल के साथ पेश करता है, तो वह सिर्फ इतिहास को फिर से नहीं लिख रहा होता, बल्कि सक्रिय रूप से अंतरराष्ट्रीय धारणा को भी आकार दे रहा होता है.

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रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल जे.एस. सोढ़ी भी इस बात से सहमत हैं. उनका तर्क है कि 1947 से ही पाकिस्तान ने खुद को भारत से अलग दिखाने की कोशिश की है और उसकी नींव में ही हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी भावनाएं शामिल रही हैं. वे कहते हैं कि भारत के खिलाफ ‘नैरेटिव वॉरफेयर’ (नैरेटिव के जरिए युद्ध) का अभियान लंबे समय से चल रहा है, जिसे DG ISPR जैसे संस्थानों के जरिए व्यवस्थित ढंग से चलाया जाता है. इस नजरिए से देखें तो इतिहास, धर्म, भाषा और सामूहिक स्मृति पर नियंत्रण करना असल में प्रोपेगैंडा युद्ध का ही एक रूप बन जाता है.

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पाकिस्तान का विरोधाभास

यही विरोधाभास पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती की जड़ में है. एक तरफ, वह अपनी राष्ट्रीय पहचान भारत-पूर्व, हिंदू-पूर्व या ‘गैर-भारतीय’ (non-Indic) नींव पर बनाता है. दूसरी तरफ, जब वही भारत-पूर्व विरासत आकर्षक, पर्यटन के लायक या प्रतिष्ठित लगती है, तो वह उसे अपनाना शुरू कर देता है. इसे नाम बदलने की राजनीति, यादों की राजनीति या ‘हेरिटेज ब्रांडिंग’ कहा जा सकता है, लेकिन आलोचनात्मक नजरिए से देखें तो यह ‘चुनिंदा अपनाना’ (selective appropriation) है, पहले दूरी बनाना, फिर अपना दावा जताना.

भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मनीष राय के अनुसार, पाकिस्तान अपनी बनावट के कृत्रिम (artificial) होने के कारण पहचान के संकट से जूझता रहा है. वे बताते हैं कि उसकी राष्ट्रीय भाषा भी भारत से ही आई थी, और ‘पाकिस्तान’ नाम का संबंध किसी प्राचीन, स्वतंत्र सभ्यता से नहीं, बल्कि भारत से जुड़े भू-राजनीतिक संदर्भ से है. वे आगे बताते हैं कि पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों के नाम अफगान हमलावरों के नाम पर रखे, ऐसे लोग जो भारतीय इतिहास में लूटपाट और आक्रामकता से जुड़े रहे हैं. यहाँ मुख्य बात यह है कि पाकिस्तान एक ही समय में बाहरी हमलावरों को प्रतीकों के तौर पर अपनाता है और साथ ही प्राचीन भारतीय विरासत पर अपना दावा भी करता है.

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लाहौर में राम गली, कृष्ण नगर, संत नगर, जैन मंदिर चौक और लॉरेंस गार्डन जैसे नामों को फिर से बहाल करने को इसी चुनिंदा रवैये का उदाहरण माना जाता है. इसका मतलब यह नहीं है कि हर बहाली गलत है; बल्कि, बहाली तभी विश्वसनीय लगती है जब वह पूर्वाग्रह से मुक्त हो और ऐतिहासिक निरंतरता के प्रति सम्मान पर आधारित हो. अगर सरकार पहले किसी पहचान को मिटा देती है और बाद में उसी पहचान के बचे-खुचे निशानों का फायदा उठाती है, तो सवाल उठना लाजमी है। इसीलिए कुछ लोग इस प्रक्रिया को ‘आइडेंटिटी लॉन्ड्रिंग’ (पहचान को बदलना या नया रूप देना) कहते हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. चांदनी सेनगुप्ता का मानना है कि पाकिस्तान का निर्माण टू-नेशन थ्योरी पर आधारित था, जिसके अनुसार हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग सभ्यताएँ हैं और इसलिए उन्हें अलग राष्ट्रों की आवश्यकता है. इसी विचारधारा के कारण पाकिस्तान की पाठ्यपुस्तकों और आधिकारिक इतिहास-लेखन में हिंदू, बौद्ध और प्राचीन भारतीय विरासत को लंबे समय तक हाशिये पर रखा गया, जबकि मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी और बाबर जैसे आक्रमणकारियों को प्रमुख स्थान दिया गया.

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उनके अनुसार आज यदि पाकिस्तान पाणिनि, चाणक्य, सिंधु-सरस्वती सभ्यता, साड़ी, झुमका या अन्य सांस्कृतिक प्रतीकों को अपनी विरासत के रूप में प्रस्तुत करता है, तो यह उसके मूल वैचारिक आधार से ही टकराता है. वे इसे ‘दबी हुई विरासत की वापसी’ नहीं, बल्कि ‘ऐतिहासिक रूप से असंगत पुनर्प्रस्तुति’ मानती हैं.

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हालांकि, सबसे इतर रिटायर्ड मेजर जनरल यश मोर का नजरिया इस बहस में एक और पहलू जोड़ता है. वे कहते हैं कि जहां पाकिस्तान में समाज तेजी से बदल रहा है, वहीं भारत में अक्सर अपनी ही विरासत को मिटाने की जल्दबाजी दिखाई देती है. जहां पाकिस्तान पुराने नामों को फिर से अपना रहा है, वहीं भारत कभी-कभी अपनी ऐतिहासिक पहचान के प्रति उदासीनता दिखाता है. 

भारत के लिए चुनौती

भारत के लिए चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि पाकिस्तान कुछ प्राचीन प्रतीकों पर अपना दावा कर रहा है. असली चुनौती यह है कि ऐसे दावों को धीरे-धीरे स्थापित तथ्यों के रूप में स्वीकार किए जाने से रोका जाए.

यहीं पर ‘नैरेटिव वॉरफेयर‘ असरदार हो जाती है. अगर बार-बार यह कहा जाए कि चाणक्य, पाणिनि, तक्षशिला या सिंधु घाटी सभ्यता ‘पाकिस्तानी’ हैं, तो बाहरी लोग अंततः इन्हें भ्रमित करने वाले या गलत बयानों के बजाय सही दावे मानने लग सकते हैं. इसलिए, इसका जवाब भावनात्मक बातों से नहीं, बल्कि लगातार दस्तावेज़ी, शैक्षणिक और कूटनीतिक प्रयासों से दिया जाना चाहिए.

मनीष राय के अनुसार, पश्चिम के कुछ वर्ग भी इस गलतफहमी को बढ़ावा दे सकते हैं, क्योंकि वे भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को कम करके दिखाना चाहते हैं. उनके नजरिए से, पाकिस्तान भारत के दावों को चुनौती देने के लिए एक सुविधाजनक मंच का काम करता है. हालाँकि यह बात कड़वी लग सकती है, लेकिन यह इस बहस में एक वास्तविक चिंता को उजागर करती है. वैश्विक मीडिया और शैक्षणिक चर्चाएँ अक्सर दक्षिण एशिया की जटिलताओं को बहुत ही सरल तरीके से पेश करती हैं. नतीजतन, भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी सभ्यता से जुड़ी कहानी दूसरों की व्याख्याओं पर निर्भर न रहे.

भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह स्पष्ट करने की ज़रूरत है कि सिंधु घाटी सभ्यता, वैदिक परंपराएँ, बौद्ध विरासत, प्राचीन गणराज्य, संस्कृत व्याकरण और उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप की विरासत किसी एक आधुनिक देश की निजी संपत्ति नहीं हैं. फिर भी, यह सच है कि इन परंपराओं का जीवंत क्रम भारत में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. इसके अलावा, भारतीय संस्थानों को पुरातत्व, भाषा-विज्ञान, संग्रहालयों, डिजिटल अभिलेखागार और सार्वजनिक इतिहास के माध्यम से सभ्यता की निरंतरता की प्रक्रिया को दिखाना चाहिए. यह लड़ाई केवल विदेश मंत्रालय की ज़िम्मेदारी नहीं है, इसमें विश्वविद्यालय, मीडिया, थिंक टैंक और सांस्कृतिक संस्थान भी शामिल हैं.

भारत की रणनीति

भारत की प्रतिक्रिया तीन स्तरों पर होनी चाहिए.

  1. कूटनीतिक स्तर: विदेशों में स्पष्ट और शांत तरीके से यह बताया जाना चाहिए कि पाकिस्तान के कई दावे निष्पक्ष इतिहास-लेखन के बजाय आधुनिक राष्ट्रवाद से प्रेरित हैं.
  2. शैक्षिक स्तर: स्कूल और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम, शोध प्रकाशनों और सार्वजनिक प्रदर्शनियों के माध्यम से भारतीय सभ्यता की निरंतरता को मज़बूती से पेश किया जाना चाहिए.
  3. सांस्कृतिक स्तर: फिल्मों, वृत्तचित्रों, संग्रहालयों, डिजिटल परियोजनाओं और कई भाषाओं में जानकारी पहुँचाने के ज़रिए भारत की प्राचीन विरासत को वैश्विक दर्शकों के सामने आसान और दिलचस्प तरीके से पेश किया जाना चाहिए. 

आदि अचिंत के अनुसार, पाकिस्तान एक ही समय में यह दावा नहीं कर सकता कि ‘हम भारत नहीं हैं,’ ‘हिंदुओं ने हमारा देश छीन लिया,’ और ‘हिंदू सभ्यता हमारे लिए बाहरी है,’ और साथ ही यह भी कहे कि पाणिनि, चाणक्य, तक्षशिला या सिंधु सभ्यता उसकी अपनी है। यही बुनियादी विरोधाभास है. उनका तर्क इस बात पर ज़ोर देता है कि पुरातात्विक स्थलों का कब्ज़ा होने का मतलब यह नहीं है कि आप उस सभ्यता के निर्माता भी हैं. 1947 में बना कोई देश 5,000 साल पुरानी भारतीय दुनिया का जनक होने का दावा नहीं कर सकता. यह बात सिर्फ पाकिस्तान पर कोई आरोप नहीं है, बल्कि यह इतिहास के गलत इस्तेमाल के खिलाफ एक चेतावनी भी है.

इस रणनीति का एक और अहम पहलू यह है कि भारत को सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, बल्कि उसे अपने नैरेटिव के ढांचे को मज़बूत करना चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि वह अपने इतिहास को आधुनिक, आसानी से समझ में आने वाले और कई भाषाओं वाले रूप में पेश करे. आज, प्रतीकों की लड़ाई उतनी ही अहम हो गई है जितनी कि जमीन या सीमाओं की लड़ाई. अगर कोई देश अपनी सांस्कृतिक यादों को ठीक से नहीं सहेज पाता है, तो दूसरे लोग उसके प्रतीकों को अपनाकर अपने एजेंडे के हिसाब से इस्तेमाल कर सकते हैं. इसलिए, सबसे असरदार जवाब आक्रामक शोर-शराबा नहीं, बल्कि एक मजबूत संस्थागत याददाश्त को विकसित करना है.

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