तमिलनाडु सरकार का कहना है कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश राज्य के तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के खिलाफ है. इस कानून के तहत 10 साल से अधिक उम्र की ऐसी गायों के वध (मारने की अनुमति) की अनुमति है, जो काम करने या प्रजनन के लिए उपयुक्त नहीं हैं. ऐसी गायों को संबंधित अधिकारी से प्रमाणपत्र मिला होना चाहिए. सरकार ने दलील दी कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001 और राज्य के अन्य स्थानीय निकाय कानून पशुओं के वध को कंट्रोल करते हैं, लेकिन पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाते.
हाई कोर्ट ने क्या कहा था गायों को लेकर?
मद्रास हाई कोर्ट ने हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्य प्रशांत की ओर से दायर जनहित याचिका पर यह आदेश दिया था. याचिका में यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि पशुओं का वध केवल निर्धारित स्थानों पर किया जाए. कोर्ट ने हालांकि तमिलनाडु में किसी भी दिन और कहीं भी गायों और बछड़ों का वध किए जाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी.
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यह मामला 27 मई के उस आदेश से जुड़ा है, जिसे जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायण की खंडपीठ ने दिया था. कोर्ट ने कहा था कि पशुओं को केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही काटा जा सकता है. साथ ही राज्य के मुख्य सचिव और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया गया था कि बकरीद ही नहीं, बल्कि किसी भी दिन राज्य में गाय या बछड़े को काटने की अनुमति न दी जाए और इस आदेश का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए.
