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Home World ईरान-US के बीच हुआ ‘इस्लामाबाद एमओयू’, डील में पाकिस्तान का कितना योगदान? ‘डाकिया’ था या ‘ब्रोकर’ 

ईरान-US के बीच हुआ ‘इस्लामाबाद एमओयू’, डील में पाकिस्तान का कितना योगदान? ‘डाकिया’ था या ‘ब्रोकर’ 

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ईरान-US के बीच हुआ ‘इस्लामाबाद एमओयू’, डील में पाकिस्तान का कितना योगदान? ‘डाकिया’ था या ‘ब्रोकर’ 
ईरान संघर्ष 28 फरवरी से शुरू हुआ, 8 अप्रैल को सीजफायर और 17 जून को ट्रंप-पेजेश्कियान ने शांति समझौते पर साइन किए.

US Iran Deal Pakistan Role: अमेरिका और ईरान के बीच जिस 14 सूत्रीय समझौते पर सहमति बनी है, उसे ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू)’ नाम दिया गया है. नाम से ही साफ है कि पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा था. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान सिर्फ दोनों पक्षों के बीच संदेश पहुंचाने वाला ‘डाकिया’ था या उसने वास्तव में इस समझौते को संभव बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई? संघर्ष और उसके बाद के घटनाक्रम को देखें तो तस्वीर यह बनती है कि पाकिस्तान ने वार्ता के लिए मंच उपलब्ध कराने, बैक-चैनल संपर्क बनाए रखने और अंतिम मसौदे तक पहुंचने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई. हालांकि समझौते की वास्तविक शर्तें अमेरिका और ईरान ने ही तय कीं.

पाकिस्तान ने शुरुआत कहां से की और अंत कहां हुआ?

मार्च 2026 में संघर्ष तेज होने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत कराने की पेशकश की थी. बाद में डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस पहल को सकारात्मक संकेत दिया. कई रिपोर्टों के अनुसार इस्लामाबाद ने दोनों देशों के बीच संपर्क का माध्यम बनने की कोशिश की और धीरे-धीरे वार्ता प्रक्रिया आगे बढ़ी.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने भी वार्ता प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई. मई में वे तेहरान गए थे और ईरानी नेतृत्व से मुलाकात की थी. उस समय अमेरिका-ईरान बातचीत में प्रगति की खबरें सामने आई थीं. मुनीर ने इस पूरे संघर्ष के दौरान सऊदी अरब, तेहरान और पाकिस्तानी पीएम ने चीन तक की दौड़ लगाई.

28 फरवरी से शुरू हुआ अमेरिका-इजरायल और ईरान संघर्ष 8 अप्रैल को सीजफायर के साथ समाप्त हुआ. फिर अमेरिका और ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच 11-12 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई. 1979 के बाद यह पहला मौका था जब दोनों देशों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधि पाकिस्तान की पहल पर आमने-सामने बातचीत के लिए एक ही मंच पर पहुंचे.

इस कूटनीतिक पहल में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. वार्ता को आगे बढ़ाने में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की सक्रिय भागीदारी रही. अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने किया, जबकि उनके साथ स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर भी मौजूद रहे. दूसरी ओर, ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने प्रतिनिधित्व किया.

बैठक के बाद कई दौर की बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के परिणामस्वरूप दोनों पक्ष एक सहमति तक पहुंचे, जिसे पहली बार ‘इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (एमओयू) का नाम दिया गया. इस समझौते को अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव को कम करने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े विवादों के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया.

इस बैठक के बाद भी दोनों देश सहमत नहीं हो पाए थे. बाद में एक बार और दूसरे दौर का प्रयास हुआ. 25 अप्रैल 2026 को दूसरे चरण की शांति वार्ता के लिए अमेरिकी विशेष दूत और ईरानी विदेश मंत्री इस्लामाबाद पहुंचे थे, लेकिन ईरान का रुख सख्त रहा और कोई सीधी बैठक नहीं हो सकी. हालांकि, बैक चैनल से दोनों देश (ईरान और अमेरिका) युद्ध को समाप्त करने में लगे रहे.

पाकिस्तान ने अपने मंत्रियों की पूरी मशीनरी इसी काम के लिए लगा दी. इशाक डार हौं या मोहसिन नकवी सभी ने तेहरान तक की दौड़ लगाई. इशाक डार तो बीच में चीन भी गए. लेकिन एक वक्त आया जब पाकिस्तान के हाथ से बात निकल गई.

कतर की एंट्री ने बिगड़ी हुई बात को बनाया

11-12 जून को कतर का एक प्रतिनिधिमंडल तेहरान में लैंड हुआ. उसने ईरान के प्रमुख प्रतिनिधियों से बात की. इसके बाद ही अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सफल हुई.

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शहबाज शरीफ लगातार करते रहे घोषणाएं

जून के दूसरे सप्ताह में सबसे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है.

12 जून को उन्होंने कहा कि ‘अंतिम सहमतिपूर्ण पाठ तैयार हो गया है और पाकिस्तान दोनों पक्षों के साथ मिलकर अगले कदमों को अंतिम रूप देने पर काम कर रहा है.’

इसके अगले दिन शरीफ ने कहा कि समझौता ‘पहले से कहीं ज्यादा करीब’ है और पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर की तैयारियों में जुटा है. बाद में समझौते की घोषणा करते हुए शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से आसिम मुनीर को श्रेय दिया और कहा कि उनकी अथक कोशिशों ने इस सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

अंत समय में पाकिस्तान को भनक भी नहीं लगी

हालांकि, पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई मीटिंग सफल नहीं हुई. शरीफ ने दावा किया कि शुक्रवार 19 जून को अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में इस डील पर साइन किए जाएंगे. लेकिन, यह डील बुधवार रात फ्रांस के वर्साय पैलेस में साइन की गई. यह हस्ताक्षर फ्रांसीसी राष्ट्रपति के साथ एक आधिकारिक डिनर के दौरान हुआ था.

डोनाल्ड ट्रंप के बाद ईरान के राष्ट्रपति ने मसूद पेजेश्कियान ने ईरान में ही बैठकर इस पर साइन किए. यानी ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ डिजिटली साइन किए.  इसका मतलब पाकिस्तान को इस बात की जानकारी नहीं दी गई थी. जिस डील का नाम ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन’ है, पाकिस्तान को अंतिम समय में इसकी भनक ही नहीं लगी.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को भरपूर इस्तेमाल किया. उन्होंने हर उन दावों में जहां अमेरिका को थोड़ा पीछे हटना पड़ा, ‘पाकिस्तान की रिक्वेस्ट पर’ जोड़कर ऐलान किया. हालांकि, उन्होंने अपने सभी समझौते वाले बयानों में पाकिस्तान की तारीफ की. गाजा शांति समझौता करवाने के दौरान उन्होंने आसिम मुनीर को अपना फवरेट फील्ड मार्शल कहा था. और ट्रंप के उनके फेवरेट फील्ड मार्शल उनकी मशाल लेकर दौड़ते रहे, क्योंकि रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मार्शल मुनीर को पाकिस्तान का बॉस बनाने वाला भी अमेरिका ही है.

यहां पढ़ें अमेरिका ने मुनीर को कैसे पाकिस्तान का सरताज बनाया.

मजबूर पाकिस्तान की मजबूरी

ऐसा करना पाकिस्तान की मजबूरी और हित दोनों रहे. क्योंकि- ईरान पाकिस्तान का पड़ोसी है, अगर संघर्ष लगातार चलता तो असर पाकिस्तान पर भी आता. पाकिस्तान में शिया और सुन्नी दोनों समुदायों की अच्छी खासी आबादी है, लंबे समय का तनाव पाकिस्तान को आंतरिक रूप से और कमजोर करता. होर्मुज बंद होने से पूरी दुनिया में तेल संकट पैदा हुआ; पाकिस्तान में महंगाई का स्तर और बढ़ता. 

पाकिस्तान ने वास्तव में क्या किया?

पाकिस्तान की भूमिका को पांच हिस्सों में समझा जा सकता है:

1. बातचीत का चैनल खुला रखा: जब दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत मुश्किल हो रही थी, तब पाकिस्तान ने संवाद के लिए संपर्क माध्यम उपलब्ध कराया.

2. मसौदे पर चर्चा के लिए मंच दिया: ‘इस्लामाबाद एमओयू’ नाम से ही संकेत मिलता है कि शुरुआती वार्ता और मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में पाकिस्तान की मेजबानी महत्वपूर्ण रही.

3. राजनीतिक भरोसा बनाने की कोशिश: पाकिस्तान के ईरान और अमेरिका दोनों से रिश्ते हैं. इसी वजह से उसने दोनों पक्षों के बीच भरोसे का माहौल बनाने की कोशिश की.

4. अंतिम पाठ पर सहमति बनाने में मदद: शहबाज शरीफ लगातार सार्वजनिक रूप से बताते रहे कि दोनों पक्ष अंतिम पाठ पर सहमत हो चुके हैं और पाकिस्तान आगे की प्रक्रिया को समन्वित कर रहा है.

5. हस्ताक्षर और कार्यान्वयन की तैयारी: पाकिस्तान ने इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर, तकनीकी वार्ताओं और आगे की बातचीत की रूपरेखा बनाने में भी समन्वयक की भूमिका निभाई.

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क्या पाकिस्तान के बिना डील नहीं हो सकती थी?

यह कहना मुश्किल है. 14 सूत्रीय समझौते के लगभग सभी महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में ढील, 300 अरब डॉलर का विकास फंड और सैन्य गतिविधियों का अंत सीधे अमेरिका और ईरान के बीच तय हुए हैं. यानी पाकिस्तान ने बातचीत को सुगम बनाया, लेकिन समझौते की असली शर्तों को तय करने वाला पक्ष नहीं था. कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की भूमिका ‘फैसिलिटेटर’ यानी वार्ता को संभव बनाने वाले देश की थी, जबकि अंतिम राजनीतिक फैसले वाशिंगटन और तेहरान ने ही लिए.

इस्लामाबाद एमओयू साइन होने के बाद क्या बोले शरीफ?

इस्लामाबाद एमओयू साइन होने के बाद, शहबाज शरीफ ने लिखा, आज संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्लामी गणराज्य ईरान के बीच ऐतिहासिक ‘इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (एमओयू)’ पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हस्ताक्षर कर दिए गए हैं. इस समझौते पर दोनों देशों के सम्मानित राष्ट्रपतियों ने हस्ताक्षर किए हैं और मध्यस्थ के रूप में मैंने भी इसका अनुमोदन किया है. सरकारों के सर्वोच्च स्तर पर इस समझौते पर हस्ताक्षर होना इस बात का प्रमाण है कि दोनों पक्ष संघर्ष का समाधान कूटनीतिक तरीके से निकालने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

इस्लामाबाद एमओयू तत्काल प्रभाव से लागू होगा. इसके तहत पहले कदम के रूप में इस्लामी गणराज्य ईरान तुरंत होर्मुज जलडमरूमध्य को खोल देगा, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका तत्काल प्रभाव से अपनी नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करेगा. उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को बधाई देते हुए कहा कि उनकी कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देने की वजह से ऐसे संघर्ष को समाप्त करने में मदद की है. उन्होंने अमेरिकी वार्ता दल के सदस्यों जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की भी प्रशंसा की.

शहबाज ने ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के प्रति गहरा सम्मान और आभार व्यक्त किया. उन्होंने आगे कहा कि शांति के उद्देश्य को स्वीकार करने में उन्होंने जो दूरदृष्टि, विवेक और राजनयिक नेतृत्व दिखाया, वह सराहनीय है. ईरानी वार्ता दल के सदस्यों मोहम्मद बागेर गालिबाफ, अब्बास अराघची और एस्कंदर मोमेनी के धैर्य, दृढ़ता और रचनात्मक संवाद के प्रति समर्पण ने इस समझौते को संभव बनाने में अहम भूमिका निभाई.

कतर सऊदी अरब, तुर्किये और इजिप्ट के नेताओं को भी शरीफ ने धन्यवाद किया. इसके बाद उन्होंने अपने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अथक प्रयास, निस्वार्थ समर्पण और निर्णायक भूमिका की बड़ाई करते हुए कहा कि इस महत्वपूर्ण सफलता को संभव बनाने तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को आगे बढ़ाने में उन्होंने अहम योगदान दिया. शहबाज ने आशा जताई कि यह समझौता पूरे क्षेत्र में बेहतर समझ, आपसी सम्मान और साझा समृद्धि की एक मजबूत और स्थायी नींव साबित होगा.

समझौते में पाकिस्तान को क्या मिला?

इस समझौते ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक सफलता का दावा करने का अवसर दिया है. एक ऐसे समय में जब पाकिस्तान आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहा है, अमेरिका और ईरान जैसे कट्टर विरोधियों के बीच मध्यस्थ के रूप में उसकी छवि मजबूत हुई है. यही वजह है कि समझौते का नाम भी ‘इस्लामाबाद एमओयू’ रखा गया.

पाकिस्तान को इस डील का ‘आर्किटेक्ट’ कहना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन  पाकिस्तान सिर्फ ‘डाकिया’ नहीं था. दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने और मसौदे को अंतिम रूप दिलाने में भूमिका निभाई. भले ही उसे आगे करने में अमेरिका का ही हाथ रहा हो. इसलिए इस्लामाबाद ने मध्यस्थ और समन्वयक दोनों की भूमिका निभाई, जबकि अंतिम फैसला वाशिंगटन और तेहरान के हाथ में रहा.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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