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Home World ईरान के ‘शाहेद’ की कॉपी कर अमेरिका ने बनाया ‘लुकास’, सुपरपॉवर US ने ‘चीन वाला धंधा’ क्यों अपनाया?

ईरान के ‘शाहेद’ की कॉपी कर अमेरिका ने बनाया ‘लुकास’, सुपरपॉवर US ने ‘चीन वाला धंधा’ क्यों अपनाया?

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ईरान के ‘शाहेद’ की कॉपी कर अमेरिका ने बनाया ‘लुकास’, सुपरपॉवर US ने ‘चीन वाला धंधा’ क्यों अपनाया?
ईरान युद्ध में ड्रोन हमलों ने अमेरिका को कॉपी करने पर मजबूर कर दिया.

US Lucas Drone vs Iran Shahed Drone: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच रविवार, 15 मार्च को ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिका और इजरायल अरब देशों पर फाल्स फ्लैग अटैक कर रहे हैं. इसके लिए दोनों देश ईरान के शाहेद ड्रोन की कॉपी लुकास ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह आने वाले समय में ही पता चलेगा, लेकिन अमेरिका ने लुकास ड्रोन बनाए तो जरूर हैं. यह ऐसा ड्रोन है, जिसे सबसे पहले रूस ने इस्तेमाल किया और यूक्रेन में तबाही मचाई, फिर ईरान ने अमेरिका के खिलाफ ताजा संघर्ष में इसका इस्तेमाल किया, अब अमेरिका इसका इस्तेमाल कर रहा है. अक्सर चीन के ऊपर आरोप लगता है कि वह दूसरे देशों की टेक्नॉलजी का इस्तेमाल करके सस्ते सामान तैयार करता है, अब अमेरिका ने भी ऐसा कर दिया है. हालांकि, ईरान ने सबसे पहले इसे नहीं बनाया था. तो आखिर कहां से आया इसका कान्सेप्ट और अमेरिका को इसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष में ईरान अपने जवाबी हमलों के लिए बड़ी संख्या में सस्ते ‘वन-वे कामिकाजे’ ड्रोन का इस्तेमाल कर रहा है. ये ड्रोन लक्ष्य से टकराकर विस्फोट करते हैं और इनकी कीमत अपेक्षाकृत बहुत कम होती है. वहीं, अमेरिका और उसके सहयोगियों के पास उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं, जो बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन को इंटरसेप्ट कर सकते हैं, लेकिन इनकी लागत बेहद ज्यादा होती है. मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कई सारे सैन्य ठिकानों पर ईरानी ड्रोन ने तबाही मचाई है.

ऐसे में अमेरिका ने भी इसका जवाब ढूंढ़ लिया. उसके नए कम लागत वाले कामिकाजे ड्रोन लुकास (Low-cost Uncrewed Combat Attack System- LUCAS) को अरब की खाड़ी में तैनात यूएसएस सांता बारबरा के फ्लाइट डेक से इस ड्रोन को उड़ान भरते हुए देखा गया. यह किसी नौसैनिक जहाज से लुकास ड्रोन का पहला प्रक्षेपण माना गया.

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान लुकास ड्रोन का इस्तेमाल पहली बार ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में किया गया. इन ड्रोन को पारंपरिक हवाई हमलों के साथ मिलाकर ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए. CENTCOM ने यह भी कहा कि ये कम लागत वाले वन-वे अटैक ड्रोन ईरान के शाहेद ड्रोन से प्रेरित हैं. 

ईरान के ‘शाहेद’ ड्रोन की चुनौती

ईरान के सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले ड्रोन में शाहेद श्रृंखला के लोइटरिंग म्यूनिशन (आत्मघाती ड्रोन- पहले लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर मंडराता है और फिर उस पर गोता लगाकर विस्फोट करता है) शामिल हैं. ये त्रिकोणीय आकार के ड्रोन करीब 11 फीट लंबे होते हैं और उड़ते समय तेज भनभनाहट की आवाज निकालते हैं. इनके अगले हिस्से में विस्फोटक लगाया जाता है और लक्ष्य से टकराते ही यह विस्फोट कर देते हैं.

इन ड्रोन का एक बड़ा फायदा यह है कि इन्हें ट्रकों से लॉन्च किया जा सकता है, इसलिए इन्हें छिपाना और तैनात करना आसान होता है. वहीं, लंबी दूरी वाला शाहेद-136 ड्रोन लगभग 2,500 किलोमीटर तक उड़ान भर सकता है, जिससे मिडिल ईस्ट के बड़े हिस्से को निशाना बनाया जा सकता है. 

रिपोर्ट के अनुसार, इन ड्रोन में कई हिस्से सामान्य बाजार में मिलने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से बनाए जाते हैं. इसलिए एक शाहेद ड्रोन को तैयार करने में करीब 30,000 से 50,000 डॉलर तक का खर्च आता है. इसकी कम लागत और लंबी दूरी की क्षमता के कारण यह ईरान की सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है. रूस ने भी यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल के लिए इसी तरह के ड्रोन का बड़े पैमाने पर उत्पादन किया है. 

Iran Shahed
ईरान के ‘शाहेद’ की कॉपी कर अमेरिका ने बनाया ‘लुकास’, सुपरपॉवर us ने ‘चीन वाला धंधा’ क्यों अपनाया? 3

ड्रोन को रोकना कहीं ज्यादा महंगा

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, टेक्सास स्थित ड्रोन निर्माता कंपनी हायलियो के सह-संस्थापक और सीईओ आर्थर एरिक्सन का कहना है कि किसी ड्रोन को गिराने की लागत उसे उड़ाने की लागत से कई गुना ज्यादा होती है. रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के हमलों में ईरान ने 2,000 से ज्यादा वन-वे ड्रोन का इस्तेमाल किया है. अरबों डॉलर की एयर डिफेंस व्यवस्था होने के बावजूद इनमें से कुछ ड्रोन अपने लक्ष्यों तक पहुंचने में सफल भी रहे हैं.

अमेरिका के प्रमुख एयर डिफेंस सिस्टम पैट्रियट मिसाइल सिस्टम के इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत प्रति लॉन्च 3 मिलियन डॉलर से ज्यादा हो सकती है. 2025 में लॉकहीड मार्टिन ने करीब 620 पीएसी-3 इंटरसेप्टर मिसाइलें तैयार की थीं, जो कंपनी के लिए रिकॉर्ड उत्पादन था. अमेरिका ने ईरान में थाड मिसाइल इंटरसेप्टर भी तैनात किया था. लेकिन जॉर्डन में अमेरिका का तैनात यह महंगा सिस्टम (तकरीबन 8300-22,000 करोड़) को भारी नुकसान पहुंचा है.

सस्ते समाधान की तलाश

लागत कम करने के लिए अमेरिका नए विकल्प तलाश रहा था. इनमें रेथियॉन का कोयोट काउंटर-ड्रोन सिस्टम शामिल रहे, जो दूसरे ड्रोन को मार गिराने के लिए ड्रोन का ही इस्तेमाल करता है. लेकिन, एक कोयोट इंटरसेप्टर की कीमत लगभग 1.26 लाख डॉलर बताई जाती है. हालांकि यह पैट्रियट मिसाइल से सस्ता है, लेकिन फिर भी शाहेद ड्रोन से कई गुना महंगा है.

इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम, माइक्रोवेव और लेजर तकनीक जैसे उपाय भी विकसित किए गए, जो ड्रोन के नेविगेशन को बाधित कर उन्हें निष्क्रिय कर सकते हैं. हालांकि, इन तकनीकों का इंपैक्ट हर परिस्थिति में समान नहीं होता और कई बार ये सिविल एरिया को भी प्रभावित कर सकते हैं.

अमेरिका का नया ड्रोन प्रोजेक्ट- क्या है लुकास ड्रोन?

ऐसे में फिर, शाहेद की चुनौती से निपटने के लिए अमेरिका ने खुद सस्ते कामिकाजे ड्रोन विकसित किए. लुकास एक छोटा और खर्च होने वाला ड्रोन है, जिसे एकतरफा हमले यानी कामिकाजे मिशन के लिए डिजाइन किया गया है. यह लक्ष्य तक उड़ान भरकर सीधे उससे टकराता है और विस्फोट करता है. इसकी अवधारणा काफी हद तक ईरान के प्रसिद्ध शाहेद-136 ड्रोन से मिलती है, जिसने हाल के वर्षों में कई संघर्षों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, इस ड्रोन को एरिजोना के फीनिक्स शहर स्थित रक्षा तकनीक कंपनी स्पेक्ट्रेवर्क्स ने विकसित किया है. इसे पहली बार जुलाई 2025 में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया था. इस ड्रोन की कीमत लगभग 35,000 डॉलर प्रति यूनिट बताई जाती है, जो ट्रैडिशनल सैन्य विमानों या क्रूज़ मिसाइलों की तुलना में बेहद कम है.

तुलना के लिए देखें तो अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन की कीमत करीब 2 से 3 करोड़ डॉलर तक होती है. हालांकि वह दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है और तकनीकी रूप से कहीं ज्यादा उन्नत है, लेकिन लागत के मामले में लुकास उससे कई गुना सस्ता है.

ईरानी शाहेद ड्रोन से प्रेरित डिजाइन

अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, लुकास ड्रोन को विकसित करने के लिए अमेरिकी इंजीनियरों ने कब्जे में लिए गए ईरानी ड्रोन का अध्ययन किया और उनकी रिवर्स इंजीनियरिंग की. खास तौर पर शाहेद-136 प्लेटफॉर्म के डिजाइन का विश्लेषण करके एक समान लेकिन अधिक आधुनिक तकनीक वाला संस्करण तैयार किया गया.

लुकास की डिजाइन और क्षमता

लुकास ड्रोन की सबसे बड़ी खासियत इसका ओपन-आर्किटेक्चर डिजाइन है. इसका मतलब है कि इसमें लगाए जाने वाले पेलोड और ऑनबोर्ड सिस्टम को मिशन की जरूरत के अनुसार बदला जा सकता है.

  • यह ड्रोन कई भूमिकाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे:
  • एकतरफा हमला (कामिकाजे स्ट्राइक)
  • निगरानी और टोही मिशन
  • संचार रिले ऑपरेशन
  • प्रशिक्षण अभ्यासों के लिए लक्ष्य ड्रोन
  • लुकास को जमीन, ट्रक या जहाज से लॉन्च किया जा सकता है और यह मध्यम ऊंचाई पर लंबी दूरी तक उड़ान भर सकता है. 
  • इसके संचालन के लिए ज्यादा विशेष प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती, जिससे इसे तेजी से तैनात किया जा सकता है.

सस्ते ड्रोन की नई रणनीति

अमेरिका अब ‘अफोर्डेबल मास’ रणनीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत बड़ी संख्या में कम लागत वाले स्वायत्त हथियार विकसित किए जा रहे हैं. पेंटागन के ड्रोन डोमिनेंस प्रोग्राम के तहत घरेलू ड्रोन उत्पादन को बढ़ाने की योजना है.

अधिकारियों के अनुसार, लक्ष्य 2027 तक 3 लाख से ज्यादा हथियारबंद ड्रोन तैयार करना है. लुकास जैसे सस्ते ड्रोन का उपयोग करके अमेरिका महंगी मिसाइलों और विमानों पर निर्भरता कम करना चाहता है, जबकि दुश्मन के रणनीतिक ठिकानों पर प्रभावी हमले जारी रख सकता है. अमेरिका ने इसके लिए 1 अरब डॉलर का बिग ब्यूटिफुल एक्ट पारित किया है. जिसके तहत ड्रोन डॉमिनेंस प्रोग्राम तैयार किया गया है. इसका मकसद अमेरिकी ड्रोन उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ाना है.

ईरान ने भी चुराई थी तकनीक

ईरान के शाहेद-136 ड्रोन को पूरी तरह मौलिक नहीं माना जाता. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इसकी डिजाइन कई पुराने ड्रोन सिस्टम से प्रभावित है. विश्लेषकों का कहना है कि शाहेद ड्रोन की अवधारणा काफी हद तक इज़रायल के हार्पी लोइटरिंग म्यूनिशन से मिलती है, जिसे 1990 के दशक में एंटी-रडार ड्रोन के रूप में विकसित किया गया था. 

हार्पी का डिजाइन बाद में दुनिया के कई देशों के लिए प्रेरणा बना. रॉयटर्स के मुताबिक चीन और ताइवान सहित कई देशों ने इसी तरह की लोइटरिंग म्यूनिशन तकनीक विकसित की. माना जाता है कि ईरान ने इसी अवधारणा को अपनाते हुए इसे लंबी दूरी के हमलों के लिए अनुकूलित किया.

ईरान द्वारा ड्रोन तकनीक हासिल करने की सबसे चर्चित घटना दिसंबर 2011 में हुई थी, जब उसने दावा किया कि उसने अमेरिका का अत्याधुनिक RQ-170 सेंटिनल स्टेल्थ निगरानी ड्रोन कब्जे में ले लिया है. यह ड्रोन अफगानिस्तान से सीआईए द्वारा संचालित किया जा रहा था और ईरानी क्षेत्र में उतर गया या क्रैश हो गया.

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बाद में ईरान ने इस ड्रोन की फुटेज जारी की और कहा कि वह इसकी रिवर्स इंजीनियरिंग करेगा. इसके बाद ईरान ने शाहेद-171 सिमोर्ग और साएकेह जैसे ड्रोन विकसित किए, जिनका डिजाइन अमेरिकी RQ-170 से काफी मिलता-जुलता माना जाता है.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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