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जो संतुलित रूप से प्यार करे वही गुरु

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जो संतुलित रूप से प्यार करे वही गुरु
श्री श्री आनंदमूर्ति
संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ है ‘अंधकार’ और ‘रु’ का अर्थ है ‘हटानेवाला’, यानी ‘गुरु’ का अर्थ हुआ मन के अंधकार को हटानेवाला. मन के अंधकार को अवश्य ही दूर करना है. यदि अपने घर में अंधकार है, तो बाहर दीवाली मनाने से क्या फायदा? अपने घर के भीतर भी प्रकाश होना चाहिए और यही मन का प्रकाश है, आत्मा का प्रकाश है. गुरु हमें एक नियमित जीवन जीने का तरीका सिखलाते हैं. सिर्फ प्यार करनेवाला गुरु नहीं है. जो तुम्हें सिर्फ प्यार करते हैं, वे तुम्हारे शत्रु हैं और जो सिर्फ दंड देते हैं, वे भी तुम्हारे शत्रु हैं, किंतु जो तुम्हें संतुलित रूप से प्यार भी करते हैं और गलतियों के लिए दंडित भी करते हैं, वही वास्तविक गुरु हैं.
कर्म ही ब्रह्म : कर्म के संबंध में कहा जाता है कि कर्म ही ब्रह्म है. इसलिए जितना संभव हो, अधिक-से-अधिक कर्म करने की चेष्टा करनी चाहिए. इस विश्व में सब कुछ कर्म में ही निहित है, गतिशीलता में है. कुछ भी स्थिर नहीं है. इसलिए कर्मात्मक सत्ता को लेकर आगे बढ़ो. कर्म योगी या कर्मपथ के अनुगामी कहते हैं कि कर्म ही सबकुछ है- कर्म के द्वारा ही हम चीजें प्राप्त करते हैं. कुछ लोग सोचते हैं- ‘मैं भूखा हूं, लिट्टी खाना चाहता हूं’. किंतु लिट्टी खाने के लिए हमें सत्तू, घी इत्यादि की व्यवस्था करनी होगी. ये सभी चीजें कर्म के द्वारा ही संभव हैं और इस कर्म का परिणाम होगा कि हमें लिट्टी खाने को मिलेगी. अतः कर्म ही सभी कुछ का स्रोत है. इसलिए कहा जाता है- ‘मरते-मरते करो, करते-करते मरो’.
भक्ति और आवेग में फर्क जानें : अब जो भक्तितत्व के प्रचारक हैं, वे कहते हैं कि भक्ति अथवा भावना से आवेग पाते हैं. मन जब एक विशेष दिशा में व्यवस्थित रूप से चलता है, तब उसे भक्ति कहते हैं, किंतु मन जब किसी विशेष व्यवस्था को न मान कर सनकी की तरह अक्रमिक रूप में चलता है, तब इसे भावनात्मक आवेग कहते हैं. भक्ति और भावनात्मक आवेग के इस मूल फर्क को जानना चाहिए. ज्ञानात्मक और बोधात्मक तत्व का अंतिम परिणाम भक्ति ही है, भावनात्मक आवेग नहीं. इसलिए प्राचीन महान ऋषि कहते थे- ‘भक्ति भगवान की सेवा है, भक्ति प्रेम स्वरूप है, भक्ति आनंद रूपा है, भक्ति भक्त का जीवन है.’
(प्रस्तुति : दिव्यचेतनानंद अवधूत)
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