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अहंकार छोड़ें, आनंद से भर उठेगी जिंदगी

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अहंकार छोड़ें, आनंद से भर उठेगी जिंदगी
सीताराम गुप्ता
सेना की बड़े-बड़े पहियोंवाली विशालकाय गाड़ियों का काफिला एक अनजान मार्ग से गुजर रहा था. तभी सड़क पर सामने एक बड़ा-सा गेट नजर आया.पास जाने पर पता चला कि गेट की चौड़ाई तो काफी थी, लेकिन ऊंचाई सेना की गाड़ियों से एक इंच कम थी. गेट के सिर्फ एक इंच छोटा होने के कारण गाड़ियों का पार जाना असंभव था. सभी बड़े परेशान थे. काफिला रुका देख कर पास के ग्रामीण वहां आ पहुंचे. समस्या जानने के बाद, एक ग्रामीण ने गाड़ियों के बड़े-बड़े पहिये ध्यानपूर्वक देखते हुए कहा कि पहियों की थोड़ी-थोड़ी हवा निकाल कर देखो. ऐसा ही किया गया. थोड़ी-थोड़ी हवा कम करने से गाड़ियों की ऊंचाई डेढ़-दो इंच तक कम हो गयी और गाड़ियां आसानी से गेट पार हो गयीं.
हमारी जीवन-रूपी गाड़ी के साथ भी प्रायः ऐसा ही होता है. अहंकार रूपी हवा अधिक होने के कारण ही वह ठीक से आगे नहीं बढ़ पाती और कहीं भी अटक जाती है. जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन्नति के लिए इस अहंकार रूपी वायु को संतुलित व नियंत्रित रखना अनिवार्य है.
हवा का कम दबाव हो या ज्यादा दबाव, दोनों ही नुकसानदेह होते हैं. बिना पर्याप्त हवा के किसी भी वाहन के पहिये आगे नहीं बढ़ सकते, लेकिन अधिक हवा होने पर उनके फटने का खतरा बना रहता है. इसी तरह हममें स्वाभिमान अथवा आत्मसम्मान तो अनिवार्य है, लेकिन अहंकार नहीं. स्वाभिमान अथवा आत्मसम्मान का विकृत स्वरूप ही अहंकार है, जो पूर्णतः त्याज्य है.
अहंकार रूपी वायु के कारण ही हमारा थोबड़ा सूजा रहता है. एक बार इस अहंकार रूपी वायु को कम करके देखिए, कितना आनंद आयेगा. मुखमंडल कितना कोमल व आकर्षक दिखने लगेगा. उसका सम्मोहन बढ़ जायेगा.
जो लोग हमारी परछाई से भी दूर भागते थे, वे पास आने और मित्रता करने को बेताब नजर आयेंगे. उन्मुक्त ठहाके न जाने कितने भयंकर रोगों को दूर करने में समक्ष हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब अहंकार रूपी वायु नियंत्रण में रहे. अहंकार रूपी वायु ही है जो दो इंसानों को मिलने से रोके रखती है. इसी के कारण गले लगना तो दूर, ठीक से हाथ मिलाने में भी संकोच होता है. इसके चलते हम ऐसे हाथ मिलाते हैं जैसे दो अस्थिपंजरों की हथेलियां व उंगलियां टकरा रही हों.
जैसे ही अहंकार के स्तर में कमी आयेगी हर दरवाजे से प्रवेश करना व हर इंसान के नजदीक पहुंचना संभव हो जायेगा. बस हमें थोड़ा झुकने, थोड़ा विनम्र होने व थोड़ा सहज होने की जरूरत है, किसी के समक्ष रेंगने अथवा आत्मसम्मान-स्वाभिमान त्यागने की नहीं. (स्वतंत्र लेखक, दिल्ली)
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