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Home पश्चिम-बंगाल कोलकाता डरे सहमे हैं SIR में लगे न्यायिक सेवा के अधिकारी, बोले- बंगाल में बिना डर ​​के काम करना संभव नहीं

डरे सहमे हैं SIR में लगे न्यायिक सेवा के अधिकारी, बोले- बंगाल में बिना डर ​​के काम करना संभव नहीं

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डरे सहमे हैं SIR में लगे न्यायिक सेवा के अधिकारी, बोले- बंगाल में बिना डर ​​के काम करना संभव नहीं

SIR in Bengal: कोलकाता : पश्चिम बंगाल में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. राज्य में SIR का काम चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस काम में अब न्यायिक सेवा के अधिकारी लगाये गये हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर, न्यायिक अधिकारी बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया में पाई गई सूचनाओं की विसंगतियों की जांच कर रहे हैं. SIR में लगे बीएलओ की सुरक्षा को लेकर कोर्ट में उठे सवाल के बीच अब न्यायिक सेवा के अधिकारी भी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. मालदा और मुर्शिदाबाद में काम करने वाले न्यायिक अधिकारियों ने कहा कि वहां बिना डर ​​के काम करना संभव नहीं है. चुनाव आयोग ने उन्हें आश्वासन दिया कि उनके लिए अर्धसैनिक बल उपलब्ध होंगे. मुख्य न्यायाधीश ने आश्वासन दिया कि चूंकि मुर्शिदाबाद में पहले से ही अर्धसैनिक बल मौजूद हैं, इसलिए उन्हें तैनात करने में कोई समस्या नहीं होगी.

दूसरे राज्यों से थोड़ा अलग है बंगाल : एएसजी

कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने इस संबंध में एक बैठक की. बैठक में राज्य के एडवोकेट जनरल ने कहा कि अन्य राज्यों में भी बंगाल की तरह ही दस्तावेज की जांच हो रही है. हालांकि, यहां इसे अवैध बताया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई आयोग द्वारा निर्धारित 13 वैध दस्तावेजों के अलावा कुछ और नहीं दिखा पाता है, तो उसे मतदाता नहीं माना जाएगा, जो कि उचित नहीं है. उन्होंने मतदाताओं को अधिक अवसर दिए जाने का अनुरोध किया. इस संबंध में आयोग का तर्क है कि 14 फरवरी तक अवसर था. उसके बाद अनुमति नहीं दी जा सकती. केंद्र द्वारा नियुक्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) अशोक चक्रवर्ती ने कहा कि यह राज्य अन्य राज्यों से अलग है. इसलिए, बंगाल में मकानों जैसे दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

संतों से लिये जायेंगे कौन से दस्तावेज

तीन घंटे लंबी चली बैठक में न्यायिक अधिकारियों ने जानना चाहा कि क्या हमें ऑनलाइन उपलब्ध दस्तावेज़ लेने चाहिए या मूल प्रति देखनी चाहिए. साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि पिता-पुत्र, पोते-दादा आदि की आयु संबंधी समस्या का समाधान कैसे होगा. राज्य में रह रहे संतों के दस्तावेजों का क्या होगा. एन्क्लेवों को लेकर भी सवाल उठते हैं. हालांकि, आयोग ने बताया कि एन्क्लेवों की समस्या का समाधान हो चुका है. मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने कहा- हमारे पास मौजूद दस्तावेजों की भारी मात्रा पर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए. समय पर काम पूरा करना बहुत मुश्किल है. आज उन्होंने राज्य को स्पष्ट कर दिया कि अदालत नागरिकता का फैसला नहीं करेगी. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार काम करेंगे.

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