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रोजाना दो किमी दूर झरने से लाते हैं पानी

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रोजाना दो किमी दूर झरने से लाते हैं पानी

सिमडेगा. पहाड़ों की गोद में बसी दियापत्थल पहाड़ टोली की बिरहोर कॉलोनी आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. यहां रहने वाले 30 बिरहोर परिवार पानी, सड़क व बिजली जैसी मूलभूत जरूरतों के अभाव में रोजाना संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं. ग्रामीणों के अनुसार गांव में बनी दो जलमीनार पिछले तीन वर्षों से खराब पड़ी हैं. इससे महिलाओं व बच्चों को पीने के पानी के लिए पहाड़ के अंदर स्थित झरने तक करीब दो किमी का सफर तय करना पड़ता है. गंदा पानी लाने-ले जाने में ही लगभग दो घंटे का समय लग जाता है. पानी की व्यवस्था में दिन का बड़ा हिस्सा खर्च होने से बच्चे समय पर स्कूल नहीं पहुंच पाते और वयस्क अपने पारंपरिक रोजगार पर भी पर्याप्त समय नहीं दे पाते. बिरहोर कॉलोनी तक पहुंचने के लिए चार किलोमीटर लंबा कच्चा रास्ता है. यहां तक कोई सड़क नहीं बनी है. चार पहिया वाहन तो दूर, आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस भी गांव तक नहीं पहुंच पाती. बीमार पड़ने पर ग्रामीणों को चार किमी पैदल चल कर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है, जहां से उन्हें वाहन की सुविधा मिलती है. गांव में बिजली की भी व्यवस्था नहीं है. शाम ढलते पूरी बिरहोर कॉलोनी अंधेरे में डूब जाती है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है और ऑनलाइन सेवाओं का लाभ लेना भी ग्रामीणों के लिए संभव नहीं हो पाता. बिरहोर समुदाय का मुख्य व्यवसाय रस्सी, हल व ओखली बनाना है. सभी परिवारों को बिरसा आवास योजना के तहत आवास तो मिल चुका है, लेकिन आवास के साथ आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं करायी गयी हैं. ग्रामीणों का कहना है कि सरकारी योजनाएं कागजों तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है.

बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करायें सरकार व प्रशासन

ग्रामीणों ने प्रशासन से खराब जलमीनारों की तत्काल मरम्मत, कॉलोनी तक सड़क निर्माण और बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है, ताकि उनका जीवन सुगम हो सके. गांव के निवासी बिरसू बिरहोर ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से दोनों जलमीनार बंद पड़ी हैं, जिससे ग्रामीणों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. शुद्ध पेयजल के लिए रोजाना करीब दो किमी दूर झरने से पानी लाना पड़ता है. उन्होंने प्रशासन से जल्द जलमीनारों की मरम्मत कराने की मांग की. वहीं दिलीप बिरहोर ने कहा कि तीन साल से जलमीनार बंद हैं, गांव में न सड़क है और न बिजली. चार किलोमीटर लंबे कच्चे रास्ते से आवागमन करना पड़ता है. उन्होंने इसे आदिम जनजाति की उपेक्षा का उदाहरण बताते हुए सरकार और प्रशासन से जल्द सड़क, बिजली और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की.

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