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आजादी के नायक सिदो-कान्हू की जयंती आज

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आजादी के नायक सिदो-कान्हू की जयंती आज
साहिबगंज (फाइल फोटो)

बरहेट

आजादी के नायक सिदो-कान्हू की जयंती छठीहार महा के रूप में मनायी जाती है. इस बार जयंती के 211 वर्ष पूरे हो रहे हैं. यह दिन 1855 के उस संघर्ष की याद दिलाता है, जब अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाले सिदो कान्हू का जन्म हुआ था. हर साल 11 अप्रैल को यह धरती उनकी जयंती के उत्सव में सराबोर हो जाती है. ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश का प्रथम आंदोलन 1855 में झारखंड के सुदूरवर्ती जिला साहिबगंज के बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह से शुरू हुआ था. यह आंदोलन दो साल तक चला. गरीब तबका, आदिवासी और गैर आदिवासी का सेठ साहूकारों द्वारा शोषण किया जा रहा था. इसी को लेकर भोगनाडीह की धरती से चार भाई और दो बहन जो सिदो कान्हू, चांद भैरव और फूलो झानो ने आंदोलन का बिगुल फूंका. खास बात है कि खपरैल के घर पर जन्म लेकर पले बढ़े और देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त और शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की. तकरीबन दो वर्षों की लड़ाई में 30 हजार से अधिक आदिवासियों ने अपने देश की आजादी पर जान कुर्बान कर दी. इस लड़ाई में बाबूपूर स्थित बरगद के पेड़ पर सिदो-कान्हू को फांसी दे दी गयी.

मांझी थान से जाहेर थान तक दिखती है आदिवासी परंपरा की झलक

सिदो-कान्हू की जयंती पर झारखंड, बंगाल, ओडिशा, बिहार से हजारों की संख्या में आदिवासियों का जुटान होता है. इसके बाद जयंती की रात को विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. वहीं, विदीन धर्म मानने वाले आदिवासी अपने गुरुओं के साथ बाबूपुर स्थित क्रांति स्थल पहुंचकर बरगद पेड़ के चारों ओर पूजा-अर्चना करते हैं. तत्पश्चात भोगनाडीह पार्क स्थित सिदो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं. यह उत्सव सिर्फ श्रद्धा नहीं, बल्कि संताल संस्कृति का जीवंत संग्रहालय है. मांझी थान और जाहेर थान जैसे पवित्र स्थलों पर पांच देवी-देवताओं की पूजा होती है. रातभर चलने वाले अनुष्ठानों के बीच ढोल की थाप पर नृत्य होता है और पारंपरिक गीत गूंजते हैं.

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सबसे पहली लड़ाई 1855 में शुरू हुई थी : वंशज मंडल मुर्मू

वंशज परिवार के सदस्य मंडल मुर्मू ने कहा कि देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सबसे पहली लड़ाई 1855 में शुरू हुई थी, जो 1856 तक चली. इस लड़ाई में एक परिवार के चार भाई व दो बहनों ने इस लड़ाई में अपनी कुर्बानी दे दी. आज भी पंचकठिया में वो पेड़ गवाह है, जहां सिदो कान्हू को फांसी दी गयी थी. आज हम इन वीर शहीदों की बदौलत खुली हवा में सांस ले रहे हैं. हर साल 30 जून को शहीद दिवस और 11 अप्रैल को सिदो-कान्हू की जयंती के रूप में याद कर उन्हें नमन करते हैं.

प्रशासनिक स्तर पर भी पूरी है तैयारी

सिदो-कान्हू की जयंती को लेकर जिला प्रशासन की तैयारी पूरी हो गयी है. प्रशासन की ओर से बरहेट के भोगनाडीह स्थित सिदो-कान्हू प्रतिमा का रंग-रोगन एवं साफ-सफाई करा ली गयी थी. साथ ही तमाम प्रकार की व्यवस्थाएं की गयी है. इसके अलावे चौक-चौराहे पर बड़े-बड़े पोस्टर व बैनर लगाये गये हैं. बाबूपुर स्थित क्रांति स्थल में पर्याप्त सुविधाओं का इंतजाम किया गया है. जिले के उप विकास आयुक्त सतीश चंद्रा ने बताया कि अमर शहीद सिदो-कान्हू की जयंती समारोह में जुटने वाले लोगों के लिये विधि-व्यवस्था एवं सुरक्षा सहित अन्य इंतजाम किये गये हैं. किसी को भी कोई परेशानी न हो, इसका ध्यान रखा जा रहा है.

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