Giridih News :भावनात्मक संयम व चरित्र निर्माण से ही रुकेंगे महिलाओं के विरुद्ध अपराध : प्रमाण सागर

Giridih News :मधुबन में संचालित गुणायतन परिसर में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में शनिवार को अपने मंगल प्रवचन में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल बाहरी वेशभूषा या किसी विशेष जीवन-पद्धति का नाम नहीं है, बल्कि अपनी दृष्टि, विचारों और भावनाओं की पवित्रता का नाम है.

By PRADEEP KUMAR | June 6, 2026 10:16 PM

समाज में बढ़ते अपराधों विशेषकर महिलाओं के प्रति होनेवाली हिंसा और दुष्कर्म जैसी घटनाओं का स्थायी समाधान केवल कठोर कानूनों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर आत्मसंयम, नैतिकता और चरित्र निर्माण के विकास से संभव है. मुनिश्री ने कहा कि यदि प्रत्येक युवक और युवती एक-दूसरे को सम्मान और पवित्रता की दृष्टि से देखना सीख लें तथा माता, बहन, बेटी, पिता, पुत्र अथवा भाई के समान आदरपूर्ण भाव विकसित करें, तो समाज में बलात्कार जैसी वीभत्स और अमानवीय घटनाओं की संभावना स्वतः समाप्त हो सकती है.

मनुष्य की दृष्टि से उसका आचरण निर्धारित करता है

मनुष्य की दृष्टि ही उसके आचरण को निर्धारित करता है. जब दृष्टि पवित्र होती है, तब व्यवहार भी मर्यादित और संस्कारित बनता है. उन्होंने कहा कि यौन सदाचार का पालन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है. प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपने जीवन में नैतिक मर्यादाओं का पालन करे. कानून भी नागरिकों को संयमित, अनुशासित और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है. इसलिए ब्रह्मचर्य और नैतिक संयम किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित विषय नहीं हैं, बल्कि समस्त मानव समाज के लिए उपयोगी और आवश्यक जीवन-मूल्य है. कहा कि आधुनिक जीवनशैली में व्यावसायिक और सामाजिक कारणों से स्त्री-पुरुषों का निरंतर संपर्क स्वाभाविक है. कार्यस्थलों पर साथ काम करना, संवाद करना और विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन करना जीवन का हिस्सा है. ऐसे वातावरण में पूर्ण ब्रह्मचर्य के कुछ पारंपरिक स्वरूपों का पालन कठिन प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद व्यक्ति अपनी मर्यादा, सीमाओं और चरित्र की पवित्रता को बनाये रख सकता है. वास्तविक ब्रह्मचर्य बाहरी दूरी में नहीं, बल्कि मन और दृष्टि की पवित्रता में निहित है.

समाज को सबसे अधिक आवश्यकता आत्मसंयम, सदाचार, मर्यादा और नैतिक मूल्यों की है

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज को सबसे अधिक आवश्यकता आत्मसंयम, सदाचार, मर्यादा और नैतिक मूल्यों की है. भौतिक प्रगति के साथ यदि नैतिक विकास नहीं होगा, तो समाज अनेक प्रकार की विकृतियों का शिकार बनता रहेगा. ऐसे में परिवार, समाज और शिक्षा संस्थानों को भी ऐसे संस्कार विकसित करने चाहिये, जो युवाओं में सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की भावना उत्पन्न करे. कहा कि आज समाज में आये दिन महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले अपराध, दुष्कर्म और उत्पीड़न की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय हैं. किसी घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश व्यक्त किया जाता है, प्रदर्शन होते हैं और कठोर दंड की मांग उठती है. यह आवश्यक भी है, लेकिन केवल प्रतिक्रिया देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा. जब तक मनुष्य के भीतर भावनात्मक संयम, आत्मनियंत्रण और चरित्र की दृढ़ता विकसित नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर पूर्ण विराम लगाना कठिन रहेगा. कहा कि अपराध रोकथाम के लिए बाहरी नियंत्रण के साथ-साथ आंतरिक अनुशासन भी आवश्यक है. समाज में नैतिकता और संस्कारों का वातावरण निर्मित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री प्रतिदिन सुबह 7:15 बजे भगवान का अभिषेक व शांति धारा करते हैं.