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Home झारखण्ड पूर्वी सिंहभूम मानसून की दगाबाजी: पूर्वी सिंहभूम के बहरागोड़ा में धान संकट, सरकारी व्यवस्था ने भी मोड़ा मुंह

मानसून की दगाबाजी: पूर्वी सिंहभूम के बहरागोड़ा में धान संकट, सरकारी व्यवस्था ने भी मोड़ा मुंह

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मानसून की दगाबाजी: पूर्वी सिंहभूम के बहरागोड़ा में धान संकट, सरकारी व्यवस्था ने भी मोड़ा मुंह
खेत में लगे धान की खेती

East Singhbhum Farming Crisis, पूर्वी सिंहभूम: पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा प्रखंड में इस साल मानसून की बेरुखी ने अन्नदाताओं की कमर तोड़ दी है. आलम यह है कि जून का पूरा महीना बीत जाने के बाद भी क्षेत्र में खेती लायक बारिश नहीं हुई है, जिससे धान की खेती करीब 15 दिन पिछड़ गई है. किसान इस बार धान की बुआई और रोपनी में बुरी तरह पिछड़ रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में सूखे का खतरा मंडराने लगा है. कृषि विभाग की ओर से इस बार बहरागोड़ा में कुल 18,062 हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती का लक्ष्य तय किया गया है, लेकिन आसमान से बरसती आग और सूखे खेतों ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.

पिछले साल के मुकाबले सिर्फ नाममात्र की बारिश

मौसम के इस दगाबाज रुख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल जून महीने में मात्र 142.8 एमएम (मिलीमीटर) बारिश रिकॉर्ड की गई है. जबकि पिछले वर्ष 2025 के जून महीने में रिकॉर्ड 670 एमएम बारिश हुई थी. पिछले साल के मुकाबले इस बार पांच गुना कम बारिश होने के कारण अभी भी सैकड़ों एकड़ खेत बंजर और सूखे पड़े हैं. हालांकि, 1 जुलाई को 84.8 एमएम बारिश होने के बाद किसानों ने थोड़ी राहत की सांस ली है और हल-बैल लेकर खेतों को तैयार करने में जुट गए हैं. आंशिक तौर पर कुछ किसान किसी तरह बिचड़ा (नर्सरी) लगाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पानी की भारी कमी अब भी सबसे बड़ी बाधा है. इस क्षेत्र के गरीब किसान साल में दो बार पूरी तरह भगवान भरोसे (मानसून पर निर्भर) ही धान की खेती करते हैं. अगर सही समय पर पानी बरस गया तो फसल अव्वल होती है, वरना पूरी मेहनत बर्बाद हो जाती है क्योंकि यहां के ग्रामीणों की आय का मुख्य स्रोत सिर्फ और सिर्फ खेती ही है.

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250 क्विंटल की जरूरत

एक तरफ किसानों पर जहां प्रकृति की मार पड़ी है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था भी किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है. बहरागोड़ा और पाथरी लैंपस में बीते 22 जून को नाममात्र का मात्र 126 बैग सरकारी धान का बीज भेजा गया था, जो मांग अधिक होने के कारण महज एक-दो दिन के भीतर ही खत्म हो गया. इसके बाद से लैंपस में ताला लटका है और किसानों को मजबूरी में खुले बाजार से महंगे दामों पर धान का बीज खरीदना पड़ रहा है. सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि खेती का पीक सीजन शुरू होने के बाद भी अब तक लैंपस में खाद (उर्वरक) और नया बीज उपलब्ध नहीं कराया गया है, जबकि इस पूरे क्षेत्र में लगभग ढाई सौ (250) क्विंटल धान बीज की सख्त आवश्यकता होती है. संकट के इस समय में सरकार और प्रशासन की यह घोर अनदेखी स्थानीय किसानों की समझ से परे है.

क्या कहते हैं किसान और जिम्मेदार अधिकारी?

स्थानीय किसानों का दर्द छलक उठा है. उनका कहना है कि इस बार मानसून ने उन्हें पूरी तरह मायूस किया है. जून खत्म होने तक बारिश न होने से खेती पखवाड़े भर लेट हो चुकी है. क्षेत्र में कई छोटे और सीमांत किसान ऐसे हैं, जिनके पास पैसे न होने के कारण उन्होंने अब तक बाजार से बीज भी नहीं खरीदा है. किसानों ने सरकार से अविलंब लैंपस के जरिए उचित मूल्य पर खाद और बीज उपलब्ध कराने की मांग की है.

क्या कहते हैं कृषि प्रभारी पदाधिकारी

इस पूरे मामले पर बहरागोड़ा के प्रभारी कृषि पदाधिकारी संजय कुमार ने अपनी लाचारी जताते हुए कहा कि यह बात सच है कि लैंपसों में इस बार धान का बीज बेहद कम मात्रा में आया था, जो तुरंत खत्म हो गया. उन्होंने भरोसा दिलाया है कि वे वरीय अधिकारियों से बात कर लैंपसों में दोबारा जल्द से जल्द बीज और खाद उपलब्ध कराने की मांग करेंगे.

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