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Home झारखण्ड दुमका सोहराय हमारी सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक : बादल

सोहराय हमारी सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक : बादल

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सोहराय हमारी सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक : बादल

बासुकिनाथ. जरमुंडी में प्रखंड मुखिया संघ द्वारा प्रखंड मुख्यालय मैदान में सभ्यता व संस्कृति का पर्व सोहराय मिलन समारोह धूमधाम से मनाया गया. मुख्य अतिथि पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख ने मांदर बजाकर आदिवासी भाई-बहनों के साथ मिलकर पर्व मनाया. समिति के सदस्यों ने माला पहनाकर स्वागत किया. प्रमुख बसंती टुडू की मौजूदगी में सभी 27 पंचायत के मुखिया ने सामूहिक रूप से आताड दाराम दिसोम सोहराय पोरोब पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया. पूर्व मंत्री बादल ने कहा कि सोहराय पर्व में आदिवासी समाज को एकता व सौहार्द का संदेश देता है. यह एक ऐसा त्योहार है, जिसमें भाईचारा, एकता, मिलन सामूहिक खान-पान करने का मौका मिलता है. उन्होंने कहा कि पर्व परिवार व प्रकृति से जुड़ा है. जीवन यापन से जुड़ी एवं जरूरत से जुड़ी सभी चीजों की पूजा करते हैं. उन्होंने कहा कि अपनी सभ्यता संस्कृति को न भूले बच्चे को शिक्षा अवश्य दें. सोहराय पर्व हमारी सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक है. पर्व पालतू पशु और मानव के बीच गहरा प्रेम स्थापित करता है. परंपरागत तरीके से कृषि मंत्री का भव्य स्वागत किया गया. प्रखंड नायकी संतलाल हेंब्रम ने विधिवत पूजा की. त्योहार में किसान अपने खेतों में पशुधन के सहयोग से अच्छी धान की फसल होने की खुशी में यह पर्व मनाते हैं. पहले दिन परंपरागत तरीके से हुई गौड़ पूजा सोहराय पर्व मनाने का मुख्य उद्देश्य गाय और बैलों को खुश करना है. मुखिया बलीराम सोरेन व पूर्व मुखिया बाबूराम मुर्मू ने बताया कि पर्व के पहले दिन गौड़ पूजा पर चावल गुंडी के कई खंड का निर्माण कर पहला खंड में एक अंडा रखा गया. बैल गायों के सिंग पर तेल लगाये जाने की परंपरा रही है. दूसरे दिन गोहाल पूजा पर मांझी थान में युवकों द्वारा लठ खेल का प्रदर्शन किये जाने की परंपरा रही है. तीसरे दिन खुंटैव पूजा पर प्रत्येक घर के द्वार पर बैलों को बांधकर पीठा पकवान का माला पहनाया जाता है, चौथे दिन जाली पूजा पर घर-घर में चंदा उठाकर प्रधान को दिया जाता है. सोहराय गीतों पर नृत्य गीत चलता है. पांचवां दिन हांकु काटकम कहलाता है. इस दिन लोग मछली ककड़ी पकड़ते हैं. छठे दिन शिकार के लिए निकलते हैं. शिकार में प्राप्त खरगोश तीतर आदि को मांझीथान में इकठ्ठा कर घर घर प्रसादी के रूप में बांटा जाता है. सकरात को बेझा तुय कहा जाता है. इस दिन गांव के बाहर नायकी सहित अन्य लोग ऐराडम पेड़ को गाड़कर तीर चलाते हैं. मौके पर पूर्व बीडीओ फुलेश्वर मुर्मू, मुखिया लखीराम मुर्मू, बलीराम सोरेन, शिशु हांसदा, सोनालाल हेंब्रम, श्यामसुंदर मोदी, महादेव यादव, रसिक टुडू, बीपीओ सुलेमान हेंब्रम, जेइ आशुतोष टुडू, बाबूराम मुर्मू, बैजून मुर्मू, सिपाही जी, नंदकिशोर बास्की, शिवलाल सोरेन, मंसू मरांडी, शिवलाल किस्कू, छोटका, माताल, वीरेंद्र कुमार हेंब्रम,और साथ में सभी मांझी, जोंगमांझी नायकी, प्राणी, गोड़ैत, प्रधान आदि मौजूद थे.

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