Bokaro News : राकेश वर्मा, उदय गिरि, बेरमो. झारखंड की धरती खनिज संपदा से ही समृद्ध नहीं है, बल्कि यहां की धरती पर कई प्रतिभा संपन्न कलाकार भी बसते हैं. उन्हीं में से एक थे खोरठा जगत में चर्चित लोकगायक व साहित्यकार स्व सुकुमार. झारखंड की लोकभाषा, लोकसंस्कृति और खोरठा साहित्य को अपनी लेखनी और आवाज से नयी पहचान दिलाने वाले साहित्यकार सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ आखिरकार जिंदगी की जंग हार गये. विडंबना यह रही कि जिनकी रचनाएं विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं, जिनके गीतों पर पूरा झारखंड झूमता रहा, वहीं साहित्यकार इलाज के लिए आर्थिक तंगी से जूझते रहे और अंततः समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया. साहित्य जगत से जुड़े लोग कहते हैं कि सुकुमार का निधन सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि खोरठा साहित्य और झारखंडी संस्कृति की एक जीवंत धरोहर का टूट जाना है. सुकुमार ने झारखंड की मूल भाषा खोरठा के क्षेत्र में आकाशवाणी व दूरदर्शन तक का सफर तय करते हुए पूरे प्रदेश में अपनी पहचान बनायी थी और खोरठा रत्न से सम्मानित हुए. साथ ही इनके द्वारा लिखित खोरठा नाटक ‘डाह’ रांची व हजारीबाग विश्वविद्यालय में इंटर व डिग्री स्तर के पाठ्यक्रमों में शामिल है.