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Home बिहार सासाराम कभी विदेशी व्यंजनों में परोसा जाता था नोखा का चावल

कभी विदेशी व्यंजनों में परोसा जाता था नोखा का चावल

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कभी विदेशी व्यंजनों में परोसा जाता था नोखा का चावल

रंजन कुमार, नोखा. एक समय था, जब नोखा क्षेत्र चावल उद्योग का हब माना जाता था, जिसको लेकर इस क्षेत्र को धान का कटोरा भी कहा जाता था. इतना ही नहीं, नोखा को राइस मिलों की नगरी भी कहा जाता थी. यहां का चावल स्थानीय, देशी सहित विदेशी लोग भी चखते थे. देशी से लेकर विदेशी तक के व्यंजनों में यहां का चावल परोसा जाता था. इसके लिए विदेशी लोग पहले ही नोखा क्षेत्र में आकर अपना डेरा डाल देते थे. फिर विदेशी यहां से पर्याप्त मात्रा में चावल को अपने स्वदेश लेकर जाते थे. चाहे नेपाल हो या भूटान या फिर बांग्लादेश. अधिकतर देश चावल के लिए नोखा का दौरा करते थे. पर अब यहां का परिसीमन बदल गया है. समय के साथ नोखा क्षेत्र के विकास व उद्योग चल नहीं पाये और यह क्षेत्र धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता जा रहा है. अब आलम यह हो गया है कि नोखा क्षेत्र से देश-विदेश चावल भेजना तो दूर, यहां के उद्योग खुद धान के कटोरे में एक छटांक चावल के लिए तरस रहे हैं.

गौरतलब है कि रोहतास जिले के सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक नोखा विधानसभा क्षेत्र शुरू से ही राजनीतिक दृष्टिकोण से समृद्ध रहा है. नोखा, राजपुर व नासरीगंज प्रखंड को मिलाकर बने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले या तो सूबे में मंत्री पद प्राप्त करते रहे हैं, या फिर राष्ट्रीय राजनीति में अपने को स्थापित कर चुके हैं. वहीं, औद्योगिक दृष्टिकोण से भी धान के कटोरे के रूप में पहचान बनाये जिले का यह क्षेत्र कभी चावल उद्योग का हब था. लेकिन, अब उद्योग का सारा परिसीमन बदल गया है. सरकार की उदासीनता व बदलते माहौल में इस उद्योग पर अब ग्रहण लग गया है.

उद्योग पर मंडराये संकट के बादल, तो हजारों मजदूर हुए बेरोजगार

राइस मिलों की नगरी नोखा में केवल चावल के लिए तीन दर्जन से अधिक राइस मिलें संचालित होती थीं. यहां से ट्रकों पर लादकर चावल बांग्लादेश तक जाता था. यहां की चावल मंडी पूरे बिहार में प्रसिद्ध थी. लेकिन, उद्योग की सुस्ती से चावल मंडी में सन्नाटा पसरा गया है. उद्योग पर संकट के बादल मंडराने के साथ ही हजारों मजदूर भी बेरोजगार हो गये हैं. अब नोखा की दर्जनों राइस मिल बंद हो चुकी हैं, तो कई बंदी के कगार पर पहुंच गयी हैं. इसके चलते हजारों मजदूरों के रोजगार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं.

हर राइस मिल में औसतन 75 से 100 लोगों को मिलता था रोजगार

यदि आंकड़ों पर नजर डालें, तो एक राइस मिल में औसतन 75 से 100 लोगों को रोजगार मिलता था. किसानों, व्यवसायियों को भी अच्छी आमदनी हो जाती थी. लेकिन, राइस मिलों के बंद होने के चलते रोजगार का संकट खड़ा हो गया है. मिल बंद होने के कारण ट्रांसपोर्टर, होटल व ब्रोकर कार्य में लगे लोगों के समक्ष भी बेरोजगारी छा गयी है. इससे अब राइस मिलों में काम करने वाले मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है.

एक-एक कर बंद हो गयीं राइस मिलें

कभी रोजगार की स्रोत साबित हो रही राइस मिलों की नगरी नोखा में तीन दर्जन से अधिक राइस मिलें होती थीं. लेकिन, समय के साथ बदलते माहौल व हालात के कारण अब यहां की राइस मिलें एक-एक कर बंद हो गयीं. वर्तमान में नोखा में महज चार ही राइस मिल ही बची हैं, जो उसना चावल के बदले अब अरवा चावल बना रही हैं. राइस मिल की बदहाली से किसानों को अपना धान बेचने की समस्या आ खड़ी हुई है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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