छपरा (सारण) से संजय भारद्वाज की रिपोर्ट
Saran DPO Bribery Case : भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के गंभीर आरोपों से घिरे जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (डीपीओ) अजीत अमर हरिजन को आखिरकार अपने मूल पदस्थापन जिला सहरसा वापस लौटना पड़ा है. ‘प्रभात खबर’ के 28 और 29 जून के अंक में डीपीओ के भ्रष्टाचार की पूरी कहानी प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद शिक्षा विभाग ने त्वरित एक्शन लिया है. 29 जून को कबीर जयंती की राजकीय छुट्टी होने के बावजूद विभाग के निदेशक प्रशासन ने पत्र जारी कर उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त कर दी. हालांकि, इस कार्रवाई के बाद अब विभाग के रवैए पर भी सवाल उठने लगे हैं.
निदेशक ने पत्र में क्या लिखा है?
शिक्षा विभाग के निदेशक प्रशासन मनोरंजन कुमार द्वारा जारी पत्र के अनुसार, कार्यहित में अजीत अमर हरिजन (कार्यक्रम पदाधिकारी, सहरसा, सम्प्रति प्रतिनियुक्त सारण) की प्रतिनियुक्ति तत्काल प्रभाव से समाप्त की जाती है. उन्हें अपने मूल पदस्थापन जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय, सहरसा में अविलंब योगदान देने का निर्देश दिया गया है. इस पत्र की प्रतिलिपि महालेखाकार, शिक्षा मंत्री के आप्त सचिव, संबंधित प्रमंडलीय आयुक्त, जिलाधिकारी और कोषागार पदाधिकारियों को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु भेज दी गई है.
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आखिर 32 महीने तक प्रतिनियुक्ति पर कैसे जमे रहे अधिकारी
इस मामले के सामने आने के बाद सारण जिले के शिक्षाविदों ने विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उनका कहना है कि आम तौर पर किसी शिक्षक या कर्मी की प्रतिनियुक्ति 30 से 60 दिनों के लिए होते ही विभाग में हलचल शुरू हो जाती है. लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी पिछले 32 महीनों से अपना मूल जिला छोड़कर छपरा में प्रतिनियुक्ति पर जमे हुए थे, जिस पर लंबे समय तक किसी उच्चाधिकारी की नजर नहीं गई.
Saran DPO Bribery Case में सस्पेंशन की जगह प्रतिनियुक्ति तोड़ने पर उठे सवाल
सारण के जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने मामले की गहन जांच कराकर भ्रष्टाचार के सभी बिंदुओं को स्पष्ट करते हुए आरोप पत्र तैयार किया था. इतने गंभीर आरोपों के बाद कायदे से विभाग को डीपीओ को सस्पेंड या बर्खास्त करना चाहिए था. लेकिन निलंबन की जगह महज प्रतिनियुक्ति तोड़कर उन्हें मूल जिला भेजने को लेकर चर्चाएं गर्म हैं. सूत्रों का कहना है कि आरोपी अधिकारी की पहुंच विभाग के बड़े अफसरों और वर्तमान सरकार के मंत्रियों तक है, जिसके दबाव में केवल हटाने की खानापूर्ति कर मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है.
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