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Home बिहार पटना OTT फिल्म ‘एजुकेशन द टेरर’ से चर्चा में हैं बिहारी अभिनेता कुमार आर्यन, पिता की याद में लिखी भावुक कविता

OTT फिल्म ‘एजुकेशन द टेरर’ से चर्चा में हैं बिहारी अभिनेता कुमार आर्यन, पिता की याद में लिखी भावुक कविता

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OTT फिल्म ‘एजुकेशन द टेरर’ से चर्चा में हैं बिहारी अभिनेता कुमार आर्यन, पिता की याद में लिखी भावुक कविता
अभिनेता कुमार आर्यन

पटना से हिमांशु देव की रिपोर्ट
Actor Kumar Aryan : संघर्ष से कभी हार नहीं मानी, लेकिन पिता के निधन ने भीतर से पूरी तरह तोड़ दिया. यह कहना है सुपौल जिले के प्रतापगंज प्रखंड के गोविंदपुर गांव निवासी अभिनेता कुमार आर्यन का, जो पिछले 15 वर्षों से मुंबई में अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई फिल्म ‘एजुकेशन द टेरर’ में उनके अभिनय की सराहना हो रही है.

पिता का सपना बना जीवन का लक्ष्य

कुमार आर्यन ने बताया कि 19 जून 2024 को पटना एम्स में उनके पिता का निधन हो गया था. महज 35 वर्ष की उम्र में पिता को खोना उनके जीवन का सबसे बड़ा आघात था. उन्होंने कहा कि उनके पिता का सपना था कि वह सुपौल के ही प्रसिद्ध पार्श्व गायक उदित नारायण की तरह देशभर में अपनी पहचान बनाएं. पिता के इसी सपने को अपना लक्ष्य बनाकर उन्होंने दोबारा खुद को संभाला और अभिनय के क्षेत्र में पूरी ऊर्जा के साथ जुट गए.

अभिनय के सफर में जारी है संघर्ष

कुमार आर्यन का कहना है कि पिता अब उनके बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सपने आज भी उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं. उनका लक्ष्य अभिनय के क्षेत्र में ऐसी पहचान बनाना है, जिस पर उनके पिता को गर्व होता. उन्होंने कहा कि हर सफलता को वह अपने दिवंगत पिता को समर्पित मानते हैं.

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Ott फिल्म ‘एजुकेशन द टेरर’ से चर्चा में हैं बिहारी अभिनेता कुमार आर्यन, पिता की याद में लिखी भावुक कविता 3

भावनाओं को कविता में किया व्यक्त

पिता के निधन के बाद अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालने में उन्हें करीब ढाई महीने का समय लगा. इस दौरान उन्होंने ‘बाबूजी’ शीर्षक से एक भावुक कविता लिखी, जिसमें पिता के व्यक्तित्व, उनके स्नेह, परिवार के प्रति समर्पण और उनके साथ बिताए पलों को बेहद मार्मिक ढंग से याद किया है.

कविता में उन्होंने पिता की सादगी, धार्मिक आस्था, समाजसेवा, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और मां के जीवन में उनकी भूमिका का भावपूर्ण चित्रण किया है. साथ ही यह भी लिखा है कि पिता के जाने के बाद घर की रौनक और जीवन का सहारा जैसे एक साथ छिन गया.

‘बाबूजी’

गौर वर्ण का काया उनका, कान में शोभित स्वर्ण का कुंडल
पान में जिनके प्राण बसा था, मुख-मंडल पर सूरज सा आभा
ऐसे थे बाबूजी छोड़ हमें कहां चले गए बाबूजी..?

शिव-शक्ति के भक्ति में जो डूब से जाते
भाल पर खुद के नित्य जो टीका लाल लगाते
कीर्तन-भजन में अपार आनंद था मिलता
अच्छे कद के हट्टे कट्टे हरफनमौला थे बाबूजी
ऐसे थे बाबूजी छोड़ हमें कहां चले गए बाबूजी..?

दरवाजे पर बैठ समस्या वो लोगों की सुनते थे
मोदी-योगी कहते रहते, खबर देश-दुनिया की रखते थे
बिन अखबार और टीवी पर समाचार के पल भर उनको चैन ना मिलता
ऐसे थे बाबूजी छोड़ हमें कहां चले गए बाबूजी..?

मां का गुस्सा, मां का साहस, मां का धैर्य, मां का प्रेम और फिर चेहरे पर मुस्कान
माथे पर की बिंदिया हो या था जो मांग का लाल सिंदूर
नाक में का नथिया हो या गले का था मंगलसूत्र
हाथों की चूड़ियां हो या पैरों की बिछिया थी
आपसे बढ़कर मां का क्या था जग में
ना व्रत, ना उत्सव और ना कोई त्योहार
मां का बसता दुनिया आपमें, आपसे ही था सोलह श्रृंगार
छोड़ हमें कहां चले गए बाबूजी..?

शान भी आप थे, सम्मान भी आप थे और हम सबों की पहचान भी आपसे
धन भी आप थे, सामर्थ्य भी आप थे और सारे घर की संपन्नता भी आपसे
रूठे मन से टूटे तन से क्या बोलूं मैं बाबूजी
बल भी आप थे, आत्मबल भी आप थे और हम सभी बलवान भी आपसे
छोड़ हमें कहां चले गए बाबूजी..?

घर-आंगन के चहल-पहल और दरवाजे पर मेला थे
घर-आंगन को सुना कर कहां चले गए बाबूजी
बात-बात पर अचानक से कहने लगे थे
बच्चे नहीं अब बड़े हो गए
हम बच्चे को बड़ा बना कर खुद कहां चले गए बाबूजी
छोड़ हमें कहां चले गए बाबूजी..?

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