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तीन दशकों से अधर में अटकी है इंद्रपुरी जलाशय योजना

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तीन दशकों से अधर में अटकी है इंद्रपुरी जलाशय योजना

– इंद्रपुरी जलाशय योजना में सोन के पानी के इस्तेमाल को लेकर बिहार और झारखंड के बीच नहीं बन सकी है सहमति संवाददाता, पटना इंद्रपुरी जलाशय योजना में सोन नदी के पानी के इस्तेमाल को लेकर अब तक झारखंड और बिहार के बीच सहमति नहीं बन सकी है. इस कारण इंद्रपुरी बराज का निर्माण भी अब तक करीब तीन दशकों के बाद भी अटका हुआ है. इसकी डीपीआर बनाने की जिम्मेदारी नयी दिल्ली के रोडिक कंसल्टेंट प्रालि को दी गयी थी. डीपीआर तैयार हो चुकी है. झारखंड और बिहार के बीच सोन के पानी के इस्तेमाल को लेकर सहमति बनाने के लिए 16 फरवरी, 2024 को पत्र लिखकर केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के सचिव से बैठक आयोजित कराने का अनुरोध किया गया था. अब केंद्र में नयी सरकार के गठन के साथ ही इंद्रपुरी जलाशय योजना के निर्माण की संभावनाएं एक बार फिर से जगी हैं. 1980 के दशक में प्रस्तावित कदवन जलाशय योजना का नाम बदलकर इंद्रपुरी जलाशय योजना कर दिया गया : सूत्रों के अनुसार योजना के तहत उत्तर प्रदेश और झारखंड की मंजूरी जरूरी है. वर्ष 1980 के दशक में प्रस्तावित कदवन जलाशय योजना का नाम बदलकर इंद्रपुरी जलाशय योजना कर दिया गया है. इस योजना की डीपीआर 1987 से 2004 तक सीडब्लूसी में उत्तर प्रदेश के डूब क्षेत्र सर्वे को लेकर लंबित रहा. राज्य सरकार के अनुरोध पर इसे लेकर वर्ष 2005 से 2007 के बीच कई बैठक हुई. इसके बाद सर्वे ऑफ इंडिया से कंटूर सर्वे करवाया गया. कैबिनेट की अनुमति से डीपीआर तैयार करने की जिम्मेदारी कंसल्टेंट को सौंपी गयी. कंसल्टेंट से तैयार पीपीआर सीडब्लूसी को सौंपी गयी, लेकिन झारखंड सरकार ने इस योजना पर अपनी सहमति नहीं दी. इस कारण यह सीडब्लूसी के पास लंबित रही. राज्य सरकार ने 27 जुलाई, 2021 को सीडब्लूसी से भी पीपीआर की स्वीकृति के लिए अनुरोध किया. इस पर मंजूरी से पहले सोन नदी के पानी के इस्तेमाल को लेकर झारखंड और बिहार के बीच मंजूरी जरूरी है. इंद्रपुरी जलाशय से क्या होगा लाभ जलाशय निर्माण के बाद मध्य बिहार, दक्षिण बिहार सहित झारखंड में सिंचाई सुविधा बेहतर होगी. अतिरिक्त 11 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगा. इस समय सोन नहरों से करीब 11 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो रही है. इंद्रपुरी बराज भी सिंचाई के लिए आत्मनिर्भर होगा. पानी के लिए मध्य प्रदेश के बाणसागर व उत्तर प्रदेश के रिहंद जलाशय से पानी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. परियोजना के पूरा होने पर लगभग 250 मेगावाट जल विद्युत का भी उत्पादन होगा.

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