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Home बिहार किशनगंज ठाकुरगंज में पैर पसार रहा मखाना का साम्राज्य, सुपरफूड की खेती से बदली ग्रामीण अर्थव्यवस्था

ठाकुरगंज में पैर पसार रहा मखाना का साम्राज्य, सुपरफूड की खेती से बदली ग्रामीण अर्थव्यवस्था

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ठाकुरगंज में पैर पसार रहा मखाना का साम्राज्य, सुपरफूड की खेती से बदली ग्रामीण अर्थव्यवस्था
मखाना की खेती
ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट

Makhana Farming: बिहार का सीमांचल क्षेत्र, जो दशकों से केवल धान और मक्के की बंपर पैदावार के लिए जाना जाता था, अब कृषि विविधीकरण (Crop Diversification) के एक ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है. ठाकुरगंज प्रखंड के ग्रामीण अंचलों में इन पारंपरिक फसलों के बीच एक नई “सफेद क्रांति” तेजी से अपनी जड़ें जमा रही है. क्षेत्र के प्रगतिशील किसान अब पारंपरिक ढर्रे से हटकर मखाना की आधुनिक खेती की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं. देश ही नहीं बल्कि विदेशों में ‘सुपरफूड’ के रूप में विख्यात हो चुके मखाने का बढ़ता उत्पादन अब मिथिलांचल की सीमाओं को लांघकर ठाकुरगंज की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई पहचान बनता जा रहा है.

धान-मक्के से कई गुना अधिक मुनाफा; बंजर भूमि को तालाबों में बदल रहे किसान

  • अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियां: ठाकुरगंज और आस-पास के इलाकों में प्रचुर मात्रा में पानी की उपलब्धता, निचले जलजमाव वाले क्षेत्र और उपयुक्त जलवायु मखाने की उत्तम गुणवत्ता के उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल साबित हो रहे हैं.
  • परती जमीन का कायाकल्प: स्थानीय किसानों के अनुसार, पिछले तीन-चार वर्षों में क्षेत्र के कई जागरूक किसानों ने अपनी कम उपजाऊ, जलजमाव वाली या परती पड़ी कृषि भूमि को गहरे तालाबों में परिवर्तित कर दिया है. जहां पहले साल में एक फसल लेना मुश्किल था, वहां अब मखाने की बदौलत लाखों का टर्नओवर हो रहा है.
  • सीधे खाते में नकदी: धान और मक्का जैसी फसलों में लागत के मुकाबले बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव का जोखिम ज्यादा रहता है, जबकि मखाना एक शुद्ध नकदी फसल (Cash Crop) है. बाजार में इसकी निरंतर मजबूत मांग और प्रसंस्करण (Processing) उद्योगों के विस्तार के कारण किसानों को अपनी उपज का तुरंत और मनमाफिक दाम मिल रहा है.

तालाब विकास के लिए मिल रहा सरकारी अनुदान; स्थानीय स्तर पर मिल रहा बंपर रोजगार

सिर्फ उपवास नहीं, ग्लोबल सुपरफूड: कभी सिर्फ पूजा-पाठ और व्रत-त्योहारों के फलाहार तक सीमित रहने वाला मखाना आज अपनी उच्च पोषण क्षमता (एंटी-ऑक्सीडेंट और लो-कैलोरी) के कारण वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमा चुका है. इसकी इसी बढ़ती महत्ता को देखते हुए बिहार सरकार कृषि विभाग के माध्यम से मखाना उत्पादक किसानों को विशेष सहायता और सब्सिडी (अनुदान) उपलब्ध करा रही है. राष्ट्रीय मखाना विकास योजना के तहत नए तालाबों के निर्माण, उन्नत बीजों के वितरण और उत्पादन की नई तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है.

फसल कटाई से पैकेजिंग तक रोजगार की बहार:

मखाने के बढ़ते साम्राज्य ने ठाकुरगंज में न केवल किसानों की किस्मत बदली है, बल्कि स्थानीय मजदूरों के लिए पलायन रोकने का एक बड़ा जरिया भी तैयार किया है. मखाने के जलीय पौधों से बीज (गुड़ी) निकालने, उन्हें सुखाने, पारंपरिक भट्टियों में भूनने, लावा फोड़ने (पॉपिंग), ग्रेडिंग और फाइनल पैकेजिंग जैसे श्रम-साध्य कार्यों में बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं और महिलाओं को सीधे तौर पर रोजगार मिल रहा है.

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि फसल विविधीकरण ही सीमांचल के किसानों की आय को दोगुना करने का सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक रास्ता है. ठाकुरगंज के किसानों द्वारा उठाया गया यह कदम आने वाले समय में पूरे जिले को मखाना उत्पादन के एक बड़े नेशनल हब के रूप में स्थापित करेगा. किसानों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि यदि ठाकुरगंज में ही एक अत्याधुनिक मखाना क्लस्टर या कोल्ड स्टोरेज की स्थापना करा दी जाए, तो स्थानीय स्तर पर इसकी ब्रांडिंग को वैश्विक पंख लग सकते हैं.

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दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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