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Home बिहार कैमूर बाउंड्रीवॉल नहीं, चिंतित हैं प्रधानाध्यापक, कैसे रोकेंगे कुत्तों की विद्यालय में इंट्री

बाउंड्रीवॉल नहीं, चिंतित हैं प्रधानाध्यापक, कैसे रोकेंगे कुत्तों की विद्यालय में इंट्री

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बाउंड्रीवॉल नहीं, चिंतित हैं प्रधानाध्यापक, कैसे रोकेंगे कुत्तों की विद्यालय में इंट्री
सांकेतिक तस्वीर

विभागीय आदेश व कार्रवाई की चेतावनी ने शिक्षकों में तनाव की स्थिति = प्रधानाध्यापकों ने कहा-पहले व्यवस्था करनी चाहिए, तब जारी करना चाहिए आदेश भभुआ नगर. जिले के सभी विद्यालय परिसर में आवारा कुत्तों की इंट्री पर पूरी तरह रोक लगाने का आदेश विभाग द्वारा दिया गया है. विभाग द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि यदि विद्यालय परिसर में आवारा कुत्ते पाये जाते हैं, तो इसके लिए सीधे संबंधित प्रधानाध्यापक को जिम्मेदार माना जायेगा और उनके खिलाफ कार्रवाई की जायेगी. इतना ही नहीं इसे लेकर प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी व जिला शिक्षा पदाधिकारी पर भी कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है. विभाग का उद्देश्य विद्यार्थियों की सुरक्षा और स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करना है, लेकिन जिले के कई विद्यालयों में अब भी चहारदीवारी का अभाव है, जिससे प्रधानाध्यापकों की चिंता बढ़ गयी है. खुले विद्यालय परिसर और बिना सीमांकन वाले विद्यालयों में आवारा कुत्तों की आवाजाही सामान्य बात है. ऐसे में शिक्षकों का कहना है कि जब स्कूल की चहारदीवारी ही नहीं हैं, तो कुत्तों की इंट्री रोकने की जिम्मेदारी निभाना भी लगभग असंभव है. आवश्यक आधारभूत सुविधा उपलब्ध नहीं कराने के बावजूद जिम्मेदार ठहराया जाना उन्हें अनुचित लग रहा है. इस संबंध में कई प्रधानाध्यापक बताते हैं कि कई बार चहारदीवारी निर्माण को लेकर स्थानीय प्रशासन को प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन वित्तीय या तकनीकी कारणों से कार्य रुका पड़ा है. दूसरी ओर विभागीय आदेश और कार्रवाई की चेतावनी ने शिक्षक समुदाय में असमंजस और तनाव की स्थिति पैदा कर दी है. उनका कहना है कि बिना सुरक्षा व्यवस्था के कुत्तों की रोकथाम की जिम्मेदारी देना और विफल होने पर दंडित करना मनमानी जैसा प्रतीत होता है. जबकि, विभाग का मानना है कि भटकते कुत्तों से विद्यार्थियों को काटने और संक्रमण का खतरा बना रहता है. इसलिए परिसर को सुरक्षित रखना आवश्यक है. लेकिन, बिना चहारदीवारी के यह लक्ष्य वास्तविकता में संभव नहीं है, कई विद्यालयों के आसपास गंदगी, खुले नाले और कचरे के ढेर होने के कारण कुत्ते स्वतः आकर्षित होते हैं. ऐसे में प्रधानाध्यापकों का तर्क है कि जब मूल समस्या पर्यावरण और अवसंरचना की है, तो समाधान भी उसी स्तर पर होना चाहिए. शिक्षा विभाग का मानना है कि विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है, प्रधानाध्यापक स्वत: ही इसके लिए प्रयासरत भी रहते हैं, परंतु बिना पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराये इस तरह आदेश को लागू करना कहीं से भी उचित नहीं है. जरूरत इस बात की है कि विभाग, स्थानीय प्रशासन और विद्यालय प्रबंधन मिलकर व्यावहारिक समाधान तैयार करें. अंततः यह स्पष्ट है कि विद्यालय परिसरों से आवारा कुत्तों की समस्या केवल आदेशों से नहीं, बल्कि समन्वित प्रयास, आधारभूत सुविधाओं और चहारदीवारी निर्माण से ही दूर हो सकती है, जब तक विभाग आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराता है, तब तक प्रधानाध्यापकों पर कार्रवाई का दबाव बनाना अनुचित माना जायेगा. गौरतलब है कि शिक्षा विभाग ने हाल ही में स्कूल परिसरों में बढ़ती आवारा कुत्तों की समस्या को गंभीरता से लेते हुए सख्त आदेश जारी किया है. विभाग ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी विद्यालय में अपशिष्ट भोजन, गिरी हुई सामग्री, अपशिष्ट जल या गंदगी के कारण कुत्तों का जमावड़ा पाया जाता है, तो इसे गंभीर लापरवाही माना जायेगा. ऐसे मामलों में प्रधानाध्यापक, प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी और जिला शिक्षा पदाधिकारी संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराये जायेगे. जारी निर्देश में कहा गया था कि मिड-डे मील व्यवस्था पर विशेष निगरानी रखी जायेगी. रसोईघर और भोजन वितरण स्थल के आसपास गंदगी या खुले में फेंका गया भोजन मिलने पर संबंधित प्रधानाध्यापक के खिलाफ कार्रवाई तय मानी जायेगी. विभाग का कहना है कि गिरी सामग्री और अव्यवस्थित भोजन प्रबंधन आवारा कुत्तों को आकर्षित करता है, जिससे बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. जारी निर्देश में शिक्षा विभाग ने यह भी साफ किया है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में आवारा कुत्तों की इंट्री पूरी तरह प्रतिबंधित है. बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस दिशा में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जायेगी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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