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Home बिहार बेगूसराय बेगूसराय : श्रावणी मेला शुरू होने में बचे महज 27 दिन, अब तक धरातल पर नहीं दिखी प्रशासनिक तैयारी

बेगूसराय : श्रावणी मेला शुरू होने में बचे महज 27 दिन, अब तक धरातल पर नहीं दिखी प्रशासनिक तैयारी

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बेगूसराय : श्रावणी मेला शुरू होने में बचे महज 27 दिन, अब तक धरातल पर नहीं दिखी प्रशासनिक तैयारी
श्रावणी मेला की फाइल तस्वीर

Begusarai News : सिमरियाधाम में इस बार श्रावणी मेला 30 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलेगा. सावन मेला शुरू होने में अब महज 27 दिन ही शेष रह गये हैं, लेकिन अभी तक सिमरियाधाम के घाटों पर प्रशासनिक तैयारियां शुरू नहीं हो सकी हैं. हालांकि, तीन दिन पहले बेगूसराय के डीएम श्रीकांत शास्त्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बरौनी अंचल में सीओ के प्रभार में चल रहे राजस्व पदाधिकारी राम बिनोद ठाकुर और बरौनी के बीडीओ अनुरंजन कुमार को युद्धस्तर पर तैयारी में लग जाने का सख्त निर्देश दिया था.

इसके बावजूद सिमरिया घाट के स्थानीय लोगों की मानें तो तैयारी को लेकर किसी भी विभाग के अधिकारी अभी तक यहां नहीं पहुंचे हैं. इसका नतीजा यह है कि घाटों पर अव्यवस्था जस की तस बनी हुई है.

धरातल पर काम शुरू करने की मांग

मां गंगा सिमरिया घाट सेवा समिति के महासचिव रामजी झा ने बताया कि अभी तक धरातल पर कोई भी काम शुरू नहीं किया गया है. पूरे सावन महीने में श्रद्धालुओं को कोई असुविधा न हो, इसके लिए जल्द ही अधिकारियों को आवेदन देकर प्रमुख समस्याओं की ओर उनका ध्यान आकृष्ट कराया जाएगा और सावन माह से पहले काम पूरा कराने की मांग की जायेगी.

सुविधा के नाम पर एक बार फिर मात्र औपचारिकता निभाए जाने की आशंका

इस वर्ष श्रावणी मेला का आयोजन 30 जुलाई से होना तय है, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती को देखकर स्थानीय लोगों को आशंका है कि पहले की तरह ही सिमरिया घाट में सुविधा के नाम पर इस बार भी महज औपचारिकता ही निभाई जायेगी. विदित हो कि पूरे सावन महीने में मिथिलांचल की पवित्र तीर्थ नगरी कहे जाने वाले सिमरिया गंगा घाट पर कांवरियों की भारी भीड़ उमड़ती है.

सिमरिया गंगा घाट से हर रविवार की शाम लाखों की संख्या में कांवरिया व डाक बम पवित्र जल लेकर ‘मिनी देवघर’ कहे जाने वाले हरिगिरीधाम (गढ़पुरा) एवं लखीसराय के अशोकधाम के लिये रवाना होते हैं और सोमवार को शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं.

घाटों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव

इसके बावजूद अब तक जिला प्रशासन एवं प्रखंड प्रशासन के द्वारा घाटों की सफाई, शौचालय, महिलाओं को कपड़ा बदलने के लिये अस्थाई चेंजिंग रूम, रोशनी, बैरिकेडिंग, सूचना केंद्र और स्वास्थ्य केंद्र सहित अन्य आवश्यक कार्यों को शुरू नहीं किया गया है. इसके कारण आने वाले कांवरियों को भारी कुव्यवस्था के बीच ही गंगा में डुबकी लगाने तथा जल भरने के लिये विवश होना पड़ेगा.

ट्रैफिक व रोशनी की व्यवस्था बड़ी चुनौती

बताते चलें कि रीवर फ्रंट पर तो रोशनी की व्यवस्था है, लेकिन वर्तमान में स्थायी घाट से गंगा नदी आधा किलोमीटर दूर बह रही है. ऐसे में अस्थायी स्नान घाटों पर रोशनी सहित अन्य सभी सुविधाओं की व्यवस्था नए सिरे से करनी होगी. इसके अलावा आरओबी (ROB) निर्माण कार्य को देखते हुए चकिया और बीहट में ट्रैफिक व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा. खास करके चकिया के पास वन-वे रास्ता रहने के कारण लगने वाले जाम की समस्या से निपटना प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा.

शौचालय की समुचित व्यवस्था नहीं

सिमरिया गंगा घाट पर हर तरफ गंदगी का अंबार लगा हुआ है. मुंडन के बाल, दातून, कूड़े-कचरे का ढेर और मल-मूत्र की दुर्गंध से कांवरियों को भारी परेशानियों का सामना निश्चित रूप से करना पड़ेगा. शौचालय की पर्याप्त व कारगर व्यवस्था नहीं रहने के कारण कांवरिया खुले में शौच करने को विवश होते हैं. इसके कारण महिला श्रद्धालुओं को कई बार बेहद लज्जास्पद परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है.

जलस्तर बढ़ने से खतरनाक बने स्नान घाट

वर्तमान में सिमरिया के स्नान घाटों की स्थिति सबसे बदतर है. गंगा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में रामघाट, सीढ़ी घाट सहित अन्य घाटों पर बिना सुरक्षा के स्नान करना खतरे से खाली नहीं है. इन खतरनाक घाटों को प्रशासन द्वारा कब चिह्नित किया जाएगा और कब बांस-बल्ले से इनकी बैरिकेडिंग की जाएगी, यह अब तक तय नहीं है. इसके अलावा बांस-बल्ली के सहारे झूलते बिजली के जर्जर तारों को भी व्यवस्थित करना बेहद जरूरी है.

गोताखोरों और पुलिस बल की तैनाती की मांग

मेले के सफल संचालन के लिए मुख्य स्नान घाट पर शुद्ध पेयजल, मोटरबोट पर महाजाल के साथ गोताखोरों की तैनाती, सुरक्षा के लिये पर्याप्त पुलिस बल की व्यवस्था और घाट तक जाने वाले वाहनों का प्रवेश पूरी तरह बंद कर उनके लिए अलग पार्किंग की समुचित व्यवस्था करनी होगी, ताकि पैदल आने-जाने वाले कांवरियों को किसी भी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े.

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