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Home Sports अरबों की आबादी, फुटबॉल का जुनून; फिर भी फीफा वर्ल्ड कप से क्यों दूर हैं भारत-चीन जैसे देश?

अरबों की आबादी, फुटबॉल का जुनून; फिर भी फीफा वर्ल्ड कप से क्यों दूर हैं भारत-चीन जैसे देश?

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अरबों की आबादी, फुटबॉल का जुनून; फिर भी फीफा वर्ल्ड कप से क्यों दूर हैं भारत-चीन जैसे देश?
अर्जेंटीना फैंस जश्न मनाते हुए (फोटो-सोशल मीडिया)

FIFA World Cup 2026: फीफा वर्ल्ड कप 2026 अपने चरम पर है. सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों के बिना खेले जा रहे इस टूर्नामेंट का क्रेज पहले से भी ज्यादा है. इस टूर्नामेंट में भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देश शामिल नहीं हैं. इसके बावजूद इन देशों के लोगों में फुटबॉल के जुनून को लेकर कोई कमी नहीं है. 17 जून को जब लियोनेल मेसी ने अल्जीरिया के खिलाफ फीफा वर्ल्ड कप 2026 में अपना पहला गोल किया, तो भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में लोग सड़कों पर निकलकर खुशी मनाने लगे. वहीं अर्जेंटीना की जर्सी पहने फैंस ने आतिशबाजी की, नारे लगाए और जीत का जश्न मनाया.

इसमें सबसे बड़ी बात यह रही कि इन देशों में जश्न मनाने वालों में शायद ही कोई अर्जेंटीना का नागरिक था. ऐसी कहानी लगभग हर उस देश की है, जो इस वर्ल्ड कप का हिस्सा नहीं है. कोलकाता में मेसी और माराडोना की तस्वीरें दीवारों पर दिखाई देती हैं. केरल में अर्जेंटीना और ब्राजील के विशाल कटआउट लगाए जाते हैं. पाकिस्तान में रोनाल्डो के प्रशंसकों की बड़ी संख्या है. इंडोनेशिया में विश्व कप मैचों के दौरान रातभर कैफे और सार्वजनिक स्थान भरे रहते हैं. लेकिन इसी कहानी का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा दिलचस्प है. जिन देशों में फुटबॉल के लिए इतना जुनून है, उनकी अपनी टीमें विश्व कप में नहीं हैं.

दुनिया के सबसे ज्यादा फैनबेस, लेकिन विश्व कप से बाहर

दुनिया के 10 सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से सिर्फ अमेरिका और ब्राजील 2026 विश्व कप में खेल रहे हैं. भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इथियोपिया और चीन जैसे देश अब भी बाहर हैं. भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है. बांग्लादेश में फुटबॉल के लिए असाधारण जुनून है. चीन के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. इसके बावजूद ये देश विश्व कप तक नहीं पहुंच पाए. यहीं से सवाल शुरू होता है. आखिर क्यों इन देशों की टीमें फीफा विश्व कप तक नहीं पहुंच पातीं?

रैंकदेशआबादी (करोड़ में)
1भारत146.39 करोड़
2चीन141.61 करोड़
3अमेरिका34.73 करोड़
4इंडोनेशिया28.57 करोड़
5पाकिस्तान25.52 करोड़
6नाइजीरिया23.75 करोड़
7ब्राजील21.28 करोड़
8बांग्लादेश17.57 करोड़
9रूस14.40 करोड़
10इथियोपिया13.55 करोड़

सिर्फ आबादी से नहीं जीता जाता विश्व कप

ब्रिटिश अर्थशास्त्री और फुटबॉल विश्लेषक स्टीफन सिजमांस्की के एक बयान के मुताबिक, बड़ी आबादी खिलाड़ियों का बड़ा पूल तो देती है, लेकिन सफलता की गारंटी नहीं देती. उनके अनुसार विश्व फुटबॉल में सफलता के तीन स्तंभ हैं. जिसमें जनसंख्या, आर्थिक संसाधन और फुटबॉल का ऐतिहासिक अनुभव भी शामिल है. ब्राजील, जर्मनी, फ्रांस, अर्जेंटीना, इंग्लैंड और स्पेन जैसे देशों ने वर्षों से मजबूत फुटबॉल ढांचा तैयार किया है. इन देशों में बेहतरीन प्रशिक्षण केंद्र, पेशेवर लीग, प्रतिभा को पहचानने और निखारने की व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर का व्यापक अनुभव मौजूद है. यही वजह है कि फीफा विश्व कप जीतने वाली ज्यादातर टीमें शुरू से ही फुटबॉल की मजबूत ताकत रही हैं.

सिर्फ क्रिकेट को दोष नहीं दिया जा सकता

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भारत और बांग्लादेश में फुटबॉल लोकप्रिय है, लेकिन फुटबॉल व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है. भारत में क्रिकेट का दबदबा एक बड़ा कारण माना जाता है. आईपीएल दुनिया की सबसे अमीर क्रिकेट लीग है. खेल प्रतिभाओं, निवेश और मीडिया का बड़ा हिस्सा क्रिकेट की ओर जाता है. हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ क्रिकेट को दोष नहीं दिया जा सकता. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश क्रिकेट में सफल होने के बावजूद फुटबॉल विश्व कप में जगह बनाते रहे हैं. असल चुनौती जमीनी ढांचे, कोचिंग नेटवर्क, युवा विकास कार्यक्रम और दीर्घकालिक योजना की है.

चीन का अरबों डॉलर वाला प्रयोग क्यों नहीं चला?

चीन का मामला सबसे रोचक है. 2010 के दशक में चीन ने फुटबॉल पर भारी निवेश किया. यूरोप और दक्षिण अमेरिका के कई बड़े खिलाड़ियों को चीनी लीग में लाया गया. क्लबों ने करोड़ों डॉलर खर्च किए. इसके बावजूद चीन 2002 के बाद दोबारा विश्व कप में नहीं पहुंच पाया. विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या निवेश की कमी नहीं, बल्कि फुटबॉल संस्कृति और जमीनी विकास मॉडल की कमजोरी है. शीर्ष स्तर पर पैसा खर्च हुआ, लेकिन निचले स्तर पर प्रतिभा विकास उतनी तेजी से नहीं हो पाया.

China
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इथियोपिया और पाकिस्तान की अलग चुनौतियां

इथियोपिया कभी अफ्रीकी फुटबॉल की उभरती ताकत माना जाता था. 1962 में उसने अफ्रीका कप ऑफ नेशंस भी जीता था. लेकिन आज वहां स्टेडियमों की कमी तक देखने को मिलती है. पाकिस्तान में स्थिति और जटिल रही. वहां फुटबॉल प्रशासन लंबे समय तक राजनीतिक विवादों और प्रतिबंधों से प्रभावित रहा. फीफा ने 2017 से 2025 के बीच पाकिस्तान फुटबॉल महासंघ पर कई बार प्रतिबंध लगाए.

इंडोनेशिया ने दिखाई उम्मीद

इंडोनेशिया 2026 विश्व कप क्वालिफायर के अंतिम चरण तक पहुंचा. हालांकि उसकी सफलता में यूरोप में जन्मे इंडोनेशियाई मूल के खिलाड़ियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही. यह मॉडल अल्पकालिक सफलता तो दे सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी सफलता के लिए घरेलू प्रतिभा विकास जरूरी है.

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विश्व कप का सबसे बड़ा विरोधाभास

विश्व कप 2026 ने एक बार फिर फुटबॉल की सबसे दिलचस्प सच्चाई सामने रखी है. फुटबॉल के सबसे भावुक प्रशंसक हमेशा उन्हीं देशों में नहीं होते जो विश्व कप खेलते हैं. कई बार सबसे ज्यादा जुनून उन देशों में मिलता है, जिनकी टीमें टूर्नामेंट का हिस्सा तक नहीं होतीं. ढाका में मेसी के गोल पर जश्न, कोलकाता में अर्जेंटीना के झंडे, कराची में रोनाल्डो के समर्थक और जकार्ता में पूरी रात चलने वाली वॉच पार्टियां इसी कहानी का हिस्सा हैं. फिलहाल इन देशों के करोड़ों प्रशंसक दूसरों की जीत का जश्न मना रहे हैं. लेकिन उनके मन में एक ही सपना है. किसी दिन विश्व कप में मेसी, रोनाल्डो या ब्राजील नहीं, बल्कि उनकी अपनी राष्ट्रीय टीम मैदान पर उतरे.

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उज्ज्वल कुमार सिन्हा | स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट उज्ज्वल कुमार सिन्हा एक खेल पत्रकार हैं, जिन्हें खेल पत्रकारिता के क्षेत्र में छह वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह प्रभात खबर में स्पोर्ट्स सेक्शन को लीड कर रहे हैं, जहां वे विभिन्न खेलों से संबंधित खबरों की योजना, संपादन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं. अपने पत्रकारिता करियर के दौरान उन्होंने क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल और अन्य प्रमुख खेलों से जुड़ी खबरों, विश्लेषणों और विशेष रिपोर्टों पर व्यापक रूप से कार्य किया है. डेस्क पत्रकारिता में उनकी विशेष विशेषज्ञता रही है, जहां उन्होंने एक्सक्लूसिव कंटेंट, स्पेशल स्टोरीज और गहन खेल विश्लेषण पर लगातार काम किया है. उज्ज्वल ने प्रो कबड्डी लीग और रणजी ट्रॉफी जैसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंटों को कवर किया है. इससे उन्हें पेशेवर खेलों की कार्यप्रणाली, खिलाड़ियों के प्रदर्शन और खेल इकोसिस्टम की गहरी समझ विकसित करने का अवसर मिला है. प्रभात खबर से पहले वह नवभारत, CricTracker, जनसत्ता, स्पोर्ट्स तक और एपीएन न्यूज जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ कार्य कर चुके हैं. विभिन्न राष्ट्रीय और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर काम करने का अनुभव उन्हें खेल पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और दर्शकों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है. शैक्षणिक रूप से उन्होंने सेंट जेवियर्स यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में स्नातक तथा सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार से जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की है. पत्रकारिता के अलावा उनका खेल से व्यक्तिगत जुड़ाव भी रहा है. वह क्रिकेट खिलाड़ी रह चुके हैं और बिहार के स्टेट कैंप में हिस्सा ले चुके हैं. मैदान पर खिलाड़ी के रूप में मिले अनुभव के कारण उनके लेखन और विश्लेषण में खेल की तकनीकी एवं व्यावहारिक समझ की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. विशेष रुचि: क्रिकेट, कबड्डी, घरेलू खेल, खेल विश्लेषण, खिलाड़ी प्रोफाइल और एक्सक्लूसिव स्पोर्ट्स स्टोरीज.
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