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Home Sports Mission Mount Everest: साइकिल से नाप दिया 37 देश, अब माउंट एवरेस्ट नापने का इरादा, देखें वीडियो

Mission Mount Everest: साइकिल से नाप दिया 37 देश, अब माउंट एवरेस्ट नापने का इरादा, देखें वीडियो

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Mission Mount Everest: साइकिल से नाप दिया 37 देश, अब माउंट एवरेस्ट नापने का इरादा, देखें वीडियो
मिशन माउंट एवरेस्ट: ग्रामीण बालिका सशक्तिकरण अभियान के लिए देश-विदेश में साइकिलिंग करने वाली पर्वतारोही समीरा खान.

Mission Mount Everest: आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव की लड़की समीरा खान, जिन्होंने साइकिल से ही दुनिया के करीब 37 देशों का भ्रमण कर लिया है. समीरा खान पर्वतारोही हैं, लेकिन साइकिल चलाना उनका शौक और सामाजिक उद्देश्य है. समीरा खान ने साइकिल से न केवल दुनिया के 37 देशों का भ्रमण किया है, बल्कि पिछले 10 महीनों से देश के विभिन्न राज्यों का भी दौरा कर रही हैं. उनका उद्देश्य देश के शहर-शहर और गांव-गांव घूमकर ग्रामीण लड़कियों के बीच उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना है.

खास बात यह है कि ग्रामीण बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता मिशन चलाने के लिए पर्वतारोही समीरा खान को किसी सरकारी अथवा प्राइवेट संस्थानों की ओर से आर्थिक मदद नहीं मिलती, बल्कि अपने खर्च के लिए वह खुद का कारोबार भी करती हैं. यह कारोबार आंध्र प्रदेश के घरों में होम थिएटर इंस्टॉल या होम सिनेमा इन्स्टॉल करने का है. इस कारोबार से अपने मिशन के खर्च तक का पैसा इकट्ठा करने के बाद समीरा साइकिल से फिर अपने मिशन पर निकल पड़ती हैं. प्रभात खबर डॉट कॉम ने पर्वतारोही समीरा खान से उनके काम और मिशन के बारे में विस्तृत बातचीत की है. पेश है इस बातचीत का प्रमुख अंश…

प्रश्न: मिशन माउंट एवरेस्ट रूरल गर्ल एमावरमेंट एक सिर्फ यात्रा नहीं है, बल्कि एक आपकी ओर से चलाया गया आंदोलन है. इसकी प्रेरणा आपको कहां से मिली?

समीरा खान: मैं 2018 में माउंटेनियर बनी. तब से लेकर अब तक एवरी ईयर वन मंथ मैं अपने आप को स्कूल्स को डेडिकेट करती थी. मतलब रूरल स्कूल्स में जाती थी. बच्चियों को उनके अधिकारों के लिए मोटिवेट और इंस्पायर करती थी. मैं तब से लेकर अब तक हर साल यह काम कर रही हैं. मैं खुद से वन मंथ सर्विस कर रही हूं. अभी मैंने मई 2025 से ये अभियान मोमेंटम की तरह स्टार्ट किया. बिकॉज मैं तो इंडिया से नॉर्वे शिफ्ट हो चुकी थी. सोच यह थी कि मुझे अभी इंडिया को वापस नहीं जाना है. लेकिन, तब मेरे अंदर से सेल्फ कॉन्शियस ने फिर से मुझे खुद को जागृत किया है कि व्हाई? क्योंकि मैं मेरे अंदर इतना कुछ है, अगर से मैं इसको बांट सकती हूं, इससे मैं अवेयरनेस ला सकती हूं तो हमारा देश बहुत बदल सकता है.

प्रश्न: ये अवेयरनेस क्या है?

समीरा खान: ये है रूरल गर्ल एंपावरमेंट. यह पितृसत्ता, महिला-विरोधी सोच और फिर सामाजिक बंदिशों, धार्मिक बंदिशों, भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने जैसा है. ये सब जो लड़कियां हर जगह झेलती हैं, मतलब अलग-अलग तारीखों में अलग-अलग सिचुएशंस में यह सब कुछ हर लड़की झेलती है. कभी ना कभी झेलती है. यह ग्रामीण भारत में तो और भी अधिक है.

प्रश्न: आपने 37 देशों में साइकिलिंग क्यों की?

समीरा खान: मैंने एंथ्रोपोलॉजी स्टडी की है, तो मुझे अलग-अलग देशों का कल्चर, सोशल वैल्यू और खासकर वहां लड़कियों की स्थिति को ऑब्जर्व करना था. बहुत जगहों पर लड़कियां आज भी बहुत ज्यादा ऑप्रेस्ड हैं. इसी को समझने के लिए मैंने 37 देशों में साइकिलिंग की.

प्रश्न: आपने किन-किन देशों की यात्रा की है?

समीरा खान: मैं साउथ-ईस्ट एशिया में मलेशिया, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया, वियतनाम, जापान गई. अफ्रीका में साउथ अफ्रीका, तंज़ानिया, इथियोपिया, सेंट्रल एशिया में कजाकिस्तान और यूरोप तो लगभग पूरा कवर किया.

प्रश्न: आपका घर कहां है और ये सफर कहां से शुरू किया?

समीरा खान: मैं आंध्र प्रदेश की रहने वाली हूं. अनंतपुर मेरा गांव है. वहीं से मैंने अपना साइकिलिंग कैंपेन शुरू किया. कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश होते हुए नेपाल गई, फिर बिहार और झारखंड आई.

प्रश्न: इतना बड़ा सफर, खर्च कैसे चलता है?

समीरा खान: सब कुछ सेल्फ-फंडेड है. मैं एक एंटरप्रेन्योर हूं. हैदराबाद और बैंगलोर में “होम सिनेमा” डिजाइन करती हूं, मतलब घर में थिएटर सेटअप. इसके अलावा, मैं माउंटेनियरिंग एक्सपेडिशन और रॉक क्लाइंबिंग भी ऑर्गनाइज करती हूं. मैं फ्रीलांस की तरह काम करती हूं. जब पैसों की जरूरत होती है, पूरा फोकस बिजनेस पर होता है. करीब 4-5 लाख रुपये, 8-10 लाख रुपये इकट्ठा करती हूं और फिर अपने मिशन पर निकल जाती हूं.

प्रश्न: आपके परिवार में कौन-कौन है?

समीरा खान: मेरी मां का देहांत तब हो गया था, जब मैं 9 साल की थी. 2015 में पापा भी चले गए. मैं सबसे छोटी हूं. मेरी चार बड़ी बहनें हैं और मैं उनके बच्चों के साथ बड़ी हुई.

प्रश्न: आपने शादी क्यों नहीं की?

समीरा खान: हमारे देश में शादी को जरूरत से ज्यादा जरूरी बना दिया गया है. मुझे समझ नहीं आता क्यों. अगर इंसान कुछ अलग करना चाहता है, तो उसे पहले रोका जाता है, खासकर लड़की को. मैं लड़कियों से कहती हूं कि आप लड़की नहीं, इंसान हो. आपको हर तरह की फ्रीडम मिलनी चाहिए… सोचने की, चुनने की, जीने की आजादी.

प्रश्न: रूरल इंडिया में लड़कियों की हालत देखकर आपको क्या महसूस हुआ?

समीरा खान: पिछले 10 महीनों में जो भारत मैंने देखा, वो बहुत अलग है. बहुत जगह आज भी मोबाइल, इंटरनेट तक नहीं है. इनइक्वालिटी बहुत ज्यादा है. लड़कियों पर रीति-रिवाज, बंदिशें, जिम्मेदारियां-सब कुछ. लड़कों को बहुत ज्यादा फ्रीडम है.

प्रश्न: लड़के और लड़की की फ्रीडम में सबसे बड़ा फर्क क्या लगा?

समीरा खान: लड़का अपने कंफर्ट के हिसाब से जीता है, पहनावे से लेकर फैसलों तक. लड़की को हर कदम पर सोसाइटी, धर्म, डर, बदनामी, सब कुछ झेलना पड़ता है. आज सोशल मीडिया की वजह से लड़कियां बोलने लगी हैं, “हम इंसान हैं, हमें भी वही मौके चाहिए, जो लड़कों को मिलते हैं.”

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प्रश्न: आप लड़कियों को क्या मैसेज देना चाहती हैं?

समीरा खान: जब तक आप स्टेबल नहीं हो जातीं, तब तक आपको पूरा सपोर्ट मिलना चाहिए, जैसे लड़कों को मिलता है. आपको इंसान की तरह ट्रीट किया जाए, प्रोजेक्ट की तरह नहीं. आपका सपना भी उतना ही जरूरी है.

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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