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Home Religion प्रदोष व्रत आज, जानें कैसे महादेव की आराधना ने दिलाई चंद्रदेव को ससुर के श्राप से मुक्ति

प्रदोष व्रत आज, जानें कैसे महादेव की आराधना ने दिलाई चंद्रदेव को ससुर के श्राप से मुक्ति

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प्रदोष व्रत आज, जानें कैसे महादेव की आराधना ने दिलाई चंद्रदेव को ससुर के श्राप से मुक्ति
प्रदोष व्रत 2026

Pradosh Vrat 2026: हिंदू धर्म में हर महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है. इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है और व्रत रखा जाता है. मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से जीवन के सभी दोष, कष्ट और दुख-दर्द दूर हो जाते हैं. साथ ही सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है. कहा जाता है कि इस व्रत की शुरुआत स्वयं चंद्रदेव ने की थी. आइए जानते हैं कि कैसे एक श्राप के कारण मृत्यु के कगार पर पहुंचे चंद्रदेव को महादेव ने न केवल जीवनदान दिया, बल्कि उन्हें अपने मस्तक पर भी धारण किया.

पौराणिक कथा

 चंद्रदेव का विवाह

कथा के अनुसार, चंद्रदेव अत्यंत सुंदर, आकर्षक और कलाओं से पूर्ण थे. उनकी इसी योग्यता से प्रभावित होकर प्रजापति दक्ष (भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र) ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रदेव से कर दिया. ये 27 पुत्रियां वास्तव में आकाश के 27 नक्षत्र हैं, जिनसे मिलकर एक चंद्रमास (महीना) पूरा होता है.

बहनों की ईर्ष्या

विवाह के बाद चंद्रदेव अपनी सभी पत्नियों के साथ रहने लगे. लेकिन कुछ समय बाद दक्ष की पुत्रियों को एहसास हुआ कि चंद्रदेव उनके साथ समान व्यवहार नहीं करते. वे अपनी सभी पत्नियों में से रोहिणी से सबसे अधिक प्रेम करते थे. चंद्रदेव अपना अधिकांश समय रोहिणी के साथ बिताते थे और अन्य 26 पत्नियों की उपेक्षा करते थे. इस कारण बाकी बहनें स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगीं. उन्होंने कई बार चंद्रदेव को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे रोहिणी के प्रेम में इतने मग्न थे कि किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुए. अंततः दुखी होकर सभी 26 बहनों ने अपने पिता प्रजापति दक्ष के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई.

राजा दक्ष का क्रोध और भयंकर श्राप

अपनी पुत्रियों के आंसू देखकर प्रजापति दक्ष अत्यंत क्रोधित हो गए. वे चंद्रदेव के पास गए और उन्हें दामाद होने का कर्तव्य याद दिलाते हुए सभी पत्नियों को समान प्रेम देने की सलाह दी. लेकिन चंद्रदेव ने अपने ससुर की बात को अनसुना कर दिया. चंद्रदेव के इस अहंकार और अपनी पुत्रियों के अपमान से क्रोधित होकर दक्ष ने उन्हें श्राप दे दिया “जिस रूप और चमक के घमंड में चूर होकर तुम मेरी पुत्रियों का हृदय दुखा रहे हो, वह रूप और चमक अब नष्ट हो जाएगी. तुम्हें ऐसा क्षय रोग होगा, जिससे तुम प्रतिदिन क्षीण होते जाओगे और तुम्हारी शक्तियां धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगी.”

चंद्रदेव का पश्चाताप

दक्ष के श्राप का प्रभाव पड़ते ही चंद्रदेव की चमक फीकी पड़ने लगी और उनकी शक्ति क्षीण होने लगी. जैसे-जैसे चंद्रमा कमजोर होते गए, पृथ्वी पर अंधकार बढ़ने लगा. समुद्र की लहरें शांत पड़ने लगीं तथा औषधियों और वनस्पतियों का रस सूखने लगा, क्योंकि चंद्रमा को वनस्पतियों का स्वामी माना जाता है. पूरी सृष्टि में हाहाकार मच गया. तब चंद्रदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ. उनका अहंकार टूट चुका था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. वे मृत्यु के निकट पहुंच चुके थे.

 नारद जी का मार्गदर्शन

जब कोई मार्ग नहीं बचा, तब देवर्षि नारद चंद्रदेव के पास पहुंचे. नारद जी ने कहा, “राजा दक्ष के श्राप को निष्प्रभावी करने की शक्ति केवल देवों के देव महादेव के पास है. तुम तुरंत उनकी शरण में जाओ.” नारद जी की सलाह पर चंद्रदेव ने त्रयोदशी तिथि के दिन भगवान शिव की स्थापना की और कठोर तपस्या आरंभ कर दी. वे अत्यंत कमजोर हो चुके थे और उनकी अंतिम सांसें चल रही थीं. प्रदोष काल में उन्होंने अपनी शेष बची हुई शक्ति समेटकर महादेव का आह्वान किया.

महादेव का वरदान

चंद्रदेव की सच्ची भक्ति, पश्चाताप और तड़प देखकर भगवान शिव प्रकट हुए. शिव जी ने कहा, “मैं दक्ष के श्राप को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं कर सकता, क्योंकि एक पिता का वचन असत्य नहीं हो सकता. लेकिन मैं तुम्हारे प्राणों की रक्षा अवश्य करूंगा.”

इसके बाद महादेव ने एक मध्यम मार्ग निकाला और चंद्रदेव को वरदान दिया कि महीने के 15 दिन (कृष्ण पक्ष) उनकी कलाएं धीरे-धीरे क्षीण होंगी और अगले 15 दिन (शुक्ल पक्ष) उनकी कलाएं पुनः बढ़ेंगी. इस प्रकार वे फिर पूर्णिमा के दिन अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त करेंगे.

चंद्रशेखर रूप

चंद्रदेव को मृत्यु से बचाने और दक्ष के श्राप के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शिव ने चंद्रमा की अंतिम शेष कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया. तभी से भगवान शिव ‘चंद्रशेखर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए.

क्यों पड़ा इसका नाम ‘प्रदोष’?

इस व्रत का सीधा संबंध समय से है. प्रदोष काल का अर्थ होता है सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आरंभ से पहले का समय, जिसे ‘गोधूलि बेला’ भी कहा जाता है. चूंकि इस व्रत की मुख्य पूजा इसी समय की जाती है, इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है.

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नेहा कुमारी प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. वे धर्म, ज्योतिष, राशिफल, व्रत-त्योहार, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन करती हैं. उनकी विशेष रुचि धार्मिक परंपराओं, ज्योतिषीय विश्लेषण और दैनिक राशिफल को सरल, सटीक और पाठक-हितैषी भाषा में प्रस्तुत करने में है. नेहा का उद्देश्य पाठकों तक विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी पहुंचाना है, ताकि वे धर्म, संस्कृति और ज्योतिष से जुड़े विषयों को आसानी से समझ सकें. उनकी लेखन शैली शोध-आधारित, सरल और स्पष्ट है, जो जटिल विषयों को भी सहज और रोचक बना देती है. वे राशिफल, ग्रह-गोचर, व्रत-त्योहार, धार्मिक मान्यताओं, वास्तु, पौराणिक प्रसंगों और भारतीय रीति-रिवाजों से संबंधित विषयों पर नियमित रूप से लेख लिखती हैं. डिजिटल पत्रकारिता में उनकी रुचि पाठकों की जरूरतों को समझते हुए जानकारीपूर्ण, SEO-अनुकूल और प्रभावी कंटेंट तैयार करने में है.
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