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महाशिवरात्रि 2026: अनजाने में हुई शिव पूजा, कैसे बदली एक शिकारी की जिंदगी

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महाशिवरात्रि 2026: अनजाने में हुई शिव पूजा, कैसे बदली एक शिकारी की जिंदगी
महाशिवरात्रि की कथा

Mahashivratri ki Katha: महाशिवरात्रि महादेव को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है. यह पर्व हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है. कहा जाता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ज्यादा तामझाम की आवश्यकता नहीं होती, केवल सच्ची भक्ति और श्रद्धा ही उनकी कृपा पाने के लिए पर्याप्त होती है. इसी कारण महादेव को भोलेनाथ भी कहा जाता है. चित्रभानु शिकारी की यह कथा इस बात का प्रमाण है कि भोलेनाथ केवल शुद्ध भाव के भूखे हैं.

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था. वह वन्य जीवों का शिकार करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था. उस शिकारी पर एक सेठ का कर्ज था, जिसे वह चुका नहीं पा रहा था. इसलिए सेठ ने उसे पकड़कर बंद कर दिया और पूरे दिन भूखा रखा. उसी दिन महाशिवरात्रि का त्योहार भी था.

शाम को सेठ ने उसे कैद से बाहर निकाला और कर्ज चुकाने के लिए एक दिन का समय दिया. शिकारी ने वादा किया कि वह अगले दिन सुबह तक पैसा लौटा देगा और वहां से निकल गया.

जंगल में शिकार की तलाश

घर जाते समय रास्ते में जंगल पड़ता था. दिनभर भूखे-प्यासे रहने से वह बहुत थक गया था और रात भी होने लगी थी. उसने सोचा कि जंगल में शिकार करके अपना और परिवार का पेट भर लेगा, साथ ही सेठ का कर्ज भी चुका पाएगा.

वह शिकार की खोज में निकला, लेकिन पूरी शाम भटकने के बाद भी उसे कोई शिकार नहीं मिला. भूख और प्यास से व्याकुल शिकारी एक जलाशय के किनारे बेल के पेड़ पर चढ़ गया, इस उम्मीद में कि कोई जानवर पानी पीने आएगा. पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था, जो बेल के पत्तों से ढका होने के कारण शिकारी को दिखाई नहीं दे रहा था.

अनजाने में हुई ‘महापूजा’

पेड़ पर बैठकर शिकारी रातभर जागकर शिकार का इंतजार करता रहा. खुद को संभालने के लिए जब भी वह डालियां हिलाता, उसके हाथ से कुछ बेलपत्र टूटकर नीचे शिवलिंग पर गिर जाते थे. साथ ही शिकारी की आंखों से टपके आंसू और पसीना भी शिवलिंग का अभिषेक कर रहे थे.

पहला शिकार

इस दौरान पानी पीने के लिए एक गर्भवती मृगी (हिरणी) वहां आई. शिकारी ने उस पर निशाना साधा, लेकिन हिरणी ने विनती की कि उसे पहले अपने बच्चे को जन्म देने का अवसर दिया जाए. उसकी दयाभरी बात सुनकर शिकारी ने उसे जाने दिया.

दूसरा शिकार

थोड़ी देर बाद दूसरी हिरणी वहां आई. जब शिकारी उसे मारने लगा, तो उसने भी प्रार्थना की कि वह अपने साथी को खोजने जा रही है और बाद में स्वयं लौट आएगी. इस बार भी शिकारी को दया आ गई और उसने उसे छोड़ दिया.

तीसरा शिकार

रात गहराने लगी और भूख से व्याकुल चित्रभानु को एक और हिरणी अपने दो बच्चों के साथ दिखाई दी. उसने फिर तीर उठाया, लेकिन हिरणी ने कहा कि वह पहले बच्चों को उनके पिता के पास छोड़कर वापस आएगी. शिकारी ने उसे भी जाने दिया.

चौथा शिकार

सुबह होने लगी, लेकिन शिकारी को कोई शिकार नहीं मिला. तभी एक स्वस्थ नर हिरण वहां आया. उसने बताया कि पहले आई तीनों हिरणियां उसकी पत्नियां हैं. उसने शिकारी से कहा कि यदि उसने उन्हें छोड़ दिया है, तो उसे भी छोड़ दे. उसने वादा किया कि वे सभी मिलकर वापस आएंगे. शिकारी ने उसे भी जाने दिया.

पश्चाताप

कुछ समय बाद नर हिरण अपनी तीनों पत्नियों के साथ सचमुच लौट आया. उनकी सच्चाई और वचन निभाने की भावना देखकर शिकारी का मन बदल गया. पेड़ पर बैठे-बैठे उससे अनजाने में शिवलिंग पर बेलपत्र भी गिरते रहे थे और वह पूरे दिन भूखा भी था. इससे उसके मन में पश्चाताप और करुणा जाग उठी. उसने हिरणों से क्षमा मांगी और आगे कभी शिकार न करने का संकल्प लिया.

भक्ति का मिला दिव्य फल

मान्यता है कि शिकारी की भक्ति, उपवास और दया भाव से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसे मोक्ष का आशीर्वाद दिया. इसी घटना से महाशिवरात्रि पर उपवास रखने और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई.

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी केवल मान्यताओं और परंपरागत जानकारियों पर आधारित है. प्रभात खबर किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है.

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