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Home Religion Aarti Chalisa माता सीता की चालीसा के बिना अधूरी है जानकी जयंती, पढ़ें पूरी लिरिक्स

माता सीता की चालीसा के बिना अधूरी है जानकी जयंती, पढ़ें पूरी लिरिक्स

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माता सीता की चालीसा के बिना अधूरी है जानकी जयंती, पढ़ें पूरी लिरिक्स
माता सीता चालीसा

Janki Jayanti 2026: जानकी जयंती या सीता अष्टमी भारत में मनाया जाने वाला एक विशेष पर्व है. इस दिन माता सीता के साथ भगवान राम की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है. विवाहित महिलाएँ इस व्रत को खास तौर पर दांपत्य जीवन में खुशहाली के लिए करती हैं, वहीं कई कुंवारी लड़कियाँ इसे मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए करती हैं. इस दिन माता को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्तों को पूजा के सभी नियमों का पालन कर विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए. पूजा के दौरान माता सीता की चालीसा का पाठ विशेष रूप से फलदायक माना जाता है. इस पूजा का फल दोगुना हो जाता है.

माता सीता चालीसा (Mata Sita Chalisa in Hindi)

॥ दोहा ॥


बंदौं चरण सरोज निज जनक लली सुख धाम,
रामप्रिय कृपा करें, सुमिरौं आठों धाम।
कीरति गाथा जो पढ़ें, सुधरैं सगरे काम,
मन मन्दिर बसा करें, दुःख भंजन सिया राम।

॥ चौपाई ॥


रामप्रिया रघुपति रघुराई, बैदेही की कीरत गाई।
चरणकमल बंदों सिर नाई, सिय सुरसरी सब पाप नसाई।
जनक दुलारी राघव प्यारी, भरत-लखन शत्रुहन वारी।
दिव्या धरा सों उपजी सीता, मिथिलेश्वर भयो नेह अतीता।
सिया रूप भायो मनवा अति, रच्यो स्वयंवर जनक महीपति।
भारी शिव-धनु खींचै जोई, सिय जयमाल साजिहैं सोई।
भूपति नरपति रावण संगा, नाहिं करि सके शिव-धनु भंगा।
जनक निराश भए लखि कारण, जनम्यो नाहिं अवनि मोहि तारन।
यह सुन विश्वामित्र मुस्काए, राम-लखन मुनि सीस नवाए।
आज्ञा पाई उठे रघुराई, इष्ट देव गुरु हिय मनाई।
जनक सुता गौरी सिर नावा, राम रूप उनके हिय भावा।
मारत पलक राम कर धनु लै, खंड-खंड करि पटकिन भू पाए।
जय-जयकार हुई अति भारी, आनन्दित भए सबै नर-नारी।
सिया चली जयमाल सम्हाले, मुदित होय ग्रीवा में डाले।
मंगल बाज बजे चहुँ ओर, परे राम संग सिया के फेरा।
लौटी बारात अवधपुर आई, तीनों मातु करैं नोराई।
कैकेई कनक भवन सिय दीन्हा, मातु सुमित्रा गोदहि लीन्हा।
कौशल्या सूत भेंट दियो सिय, हरख अपार हुए सीता हिय।
सब विधि बांटी बधाई, राजतिलक कई युक्ति सुनाई।
मंद मती मंथरा अड़ाइन, राम न भरत राजपद पाइन।
कैकेई कोप भवन मा गईली, वचन पति सों अपनेई गहिली।
चौदह बरस कोप बनवास, भरत राजपद देहि दिलासा।
आज्ञा मानि चले रघुराई, संग जानकी लक्षमन भाई।
सिय-श्रीराम पथ पथ भटकैं, मृग मारीचि देखि मन अटकै।
राम गए माया मृग मारन, रावण साधु बन्यो सिय कारण।
भिक्षा कै मिस लै सिय भाग्यो, लंका जाई डरावन लाग्य।
राम-वियोग सों सिय अकुलानी, रावण सों कही कर्कश बानी।
हनुमान प्रभु लाए अंगूठी, सिय चूड़ामणि दिहिन अनूठी।
अष्टसिद्धि नवनिधि वर पावा, महावीर सिय शीश नवाव।
सेतु बाँधी प्रभु लंका जीती, भक्त विभीषण सों करि प्रीति।
चढ़ि विमान सिय रघुपति आए, भरत-भ्रात प्रभु चरण सुहाए।
अवध नरेश पाई राघव से, सिय महारानी देखि हिय हुलसे।
रजक बोल सुनी सिय बन भेजी, लखनलाल प्रभु बात सहेजी।
बाल्मीक मुनि आश्रय दीन्यो, लव-कुश जन्म वहाँ पै लीन।
विविध भांति गुण शिक्षा दीन्हीं, दूनुह रामचरित रट लीन्हीं।
लरिकल कै सुनि सुमधुर बानी, रामसिया सुत दुई पहिचानी।
भूलमानी सिय वापस लाए, राम-जानकी सबहि सुहाए।
सती प्रमाणिकता केहि कारण, बसुंधरा सिय के हिय धारन।
अवनि सुता अवनी मां सोई, राम-जानकी यही विधि खोई।
पतिव्रता मर्यादित माता, सीता सती नवावों माथ।

॥ दोहा ॥


जनकसुत अवनिधिया राम प्रिया लवमात,
चरणकमल जेहि उन बसै, सीता सुमिरै प्रात।

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