क्यों खत्म हुआ 45 फीसदी ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ का लक्ष्य! भारत पर क्या होगा इसका असर?
World Bank Climate Finance: अमेरिका के भारी दबाव में विश्व बैंक झुक गया है. COP-28 में तय 45 प्रतिशत क्लाइमेट फाइनेंस का ऐतिहासिक लक्ष्य लिया वापस. भारत समेत दुनिया भर के विकासशील देशों में ‘क्लाइमेट एडाप्टेशन’ प्रोजेक्ट्स पर संकट. पढ़ें इन-डेप्थ रिपोर्ट.
मिथिलेश झा
World Bank Climate Finance: वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन एनर्जी (Green Energy) को बढ़ावा देने की कोशिशों को झटका लगा है. विश्व बैंक (World Bank) ने विकासशील देशों के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने (Mitigation & Adaptation) के लिए तय किये गये अपने 45 प्रतिशत क्लाइमेट फाइनेंस लक्ष्य को आधिकारिक वापस ले (Scrap) लिया है. यह फैसला अमेरिका के राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव में लिया गया है.
फ्रांस के विरोध के बावजूद जीता अमेरिका
विश्व बैंक के पांचवें सबसे बड़े शेयरधारक फ्रांस इस लक्ष्य को बनाये रखना चाहता था. यूरोप के कई अन्य देशों ने भी उसका साथ दिया, लेकिन अमेरिकी दबाव के आगे वर्ल्ड बैंक ने घुटने टेक दिये. हालांकि, एक राहत की बात यह है कि बैंक का क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान (CCAP), जो 30 जून को समाप्त हो रहा था, उसे विकासशील देशों के G-11 समूह के अनुरोध पर आगे बढ़ा दिया गया है.
COP-29 और COP-30 के रोडमैप पर संकट के बादल
विश्व बैंक ने संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन (COP-28) में घोषणा की थी कि वह अपनी कुल वार्षिक ऋण (Annual Lending) का 45 प्रतिशत हिस्सा अनिवार्य रूप से जलवायु-संबंधी गतिविधियों के लिए सुरक्षित रखेगा. अब इस लक्ष्य के हटने से COP-29 (बाकू) और आगामी COP-30 (बेलेम) के उस रोडमैप को झटका लगा है, जिसमें बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) के जरिये 1.3 ट्रिलियन डॉलर का क्लाइमेट फंड जुटाने का लक्ष्य था. वर्ष 2024 में सभी एमडीबी ने मिलकर रिकॉर्ड 137 बिलियन डॉलर का क्लाइमेट फाइनेंस दिया था, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी विश्व बैंक की थी.
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भारत पर क्या होगा इसका असर?
वर्ल्ड बैंक के इस यू-टर्न पर भारत और दुनिया के शीर्ष नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों ने गंभीर चिंता जतायी है.
भारत में रिन्यूएबल एनर्जी को दिक्कत नहीं, लेकिन बाढ़-सूखे से निपटने वाले फंड पर ब्रेक : लावण्य प्रकाश जेना
क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी इनिशिएटिव के डायरेक्टर लावण्य प्रकाश जेना कहते हैं कि भारत हालांकि विश्व बैंक समूह का सबसे बड़ा कर्जदार (Borrower) है, लेकिन एक बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था होने के नाते हमारे पास पूंजी के कई अन्य स्रोत हैं. सौर और पवन ऊर्जा जैसे कॉमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए भारत को प्राइवेट कैपिटल मिल जायेगी. लेकिन असली खतरा क्लाइमेट एडाप्टेशन (Climate Adaptation) यानी जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं को है.
शहरों को अत्यधिक गर्मी से बचाना (Urban Heat Resilience), बाढ़ से बचने के लिए सुरक्षा दीवारें बनाना और जलवायु-मजबूत कृषि जैसे प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से विश्व बैंक के रियायती और आसान कर्ज (Concessionary & Patient Capital) पर निर्भर थे. कोटा खत्म होने से भारत में इन जनकल्याणकारी प्रोजेक्ट्स को फंड की भारी किल्लत झेलनी होगी.
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वैश्विक बहुपक्षवाद कमजोर, अब ‘एशिया ग्रीन फाइनेंस बैंक’ की जरूरत : ध्रुव पुरकायस्थ
क्लाइमेट, डेलबर्ग के वरिष्ठ सलाहकार ध्रुव पुरकायस्थ का मानना है कि वर्ल्ड बैंक भले ही इसे ‘इनपुट से आउटकम’ (लेंडिंग के लक्ष्यों से नतीजों पर ध्यान देना) की तरफ बढ़ना कह रहा हो, लेकिन यह असल में वैश्विक सतत विकास और कूटनीति की हार है. इससे ‘क्लाइमेट एक्शन’ को वैश्विक सार्वजनिक भलाई (Global Public Good) मानने की अवधारणा कमजोर हुई है. अब समय आ गया है कि हम वैश्विक संस्थाओं पर निर्भर रहने की बजाय क्षेत्रीय स्तर पर एशिया ग्रीन फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (Asia Green Finance Institution) या एशियन ग्रीन फंड जैसे फंड्स की स्थापना की तरफ कदम बढ़ाएं.
फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) उत्पादक देशों का दिखा दबदबा : प्रो सुरंजलि टंडन
NIPFP की एसोसिएट प्रोफेसर सुरंजलि टंडन कहती हैं कि इस टारगेट को हटाने के पीछे वैश्विक प्राथमिकताओं में बदलाव और बड़ी तेल व जीवाश्म ईंधन उत्पादक लॉबी का हाथ है, जिन्होंने क्लाइमेट चेंज के काम को आगे बढ़ाने का विरोध किया. टारगेट हटने से उन प्रोजेक्ट्स में फंडिंग सबसे पहले घटेगी, जिनके तात्कालिक परिणाम नजर नहीं आते हैं, विशेषकर एडाप्टेशन प्रोजेक्ट्स.
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अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया : यह कूटनीतिक तटस्थता नहीं, कमजोर देशों को संकट में छोड़ना है
- ECCO थिंक टैंक के क्लाइमेट फाइनेंस लीड एलेओनोरा कोगो ने कहा है कि विश्व बैंक का कहना है कि वह अपने क्लाइंट देशों की इच्छा का पालन कर रहा है, लेकिन डेटा बताता है कि विकासशील देशों को सोलर और विंड एनर्जी की सबसे ज्यादा जरूरत है. जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) बाजार की अस्थिरता के बीच टारगेट हटाना तटस्थता नहीं, बल्कि सबसे कमजोर देशों को जलवायु आपदाओं के सामने बेसहारा छोड़ना है.
- NRDC के इंटरनेशनल क्लाइमेट फाइनेंस डायरेक्टर जो थ्वाइट्स ने कहा कि इस लक्ष्य को वापस लिया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. राहत की बात यह है कि वर्ल्ड बैंक के पास क्लाइमेट फाइनेंस देने का मैंडेट और क्लाइमेट चेंज एक्शन प्लान (CCAP) अभी भी सुरक्षित हैं. अब शेयरधारकों को बैंक के नेतृत्व को जवाबदेह बनाना होगा.
- ब्रेटन वुड्स प्रोजेक्ट, यूके के जॉन स्वार्ड ने कहा है कि लंबे और कड़े संघर्ष के बाद एक्शन प्लान तो बच गया, लेकिन अमेरिकी दबाव ने बैंक के काम को कमजोर कर दिया. सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस पूरी बातचीत और फैसले से वैश्विक नागरिक समाज (Civil Society) को पूरी तरह बाहर रखा गया, जो बेहद चिंताजनक है.
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