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क्या नासिक के हरिहर किले में होने वाली है कोई दुर्घटना? एडवेंचर टूरिज्म के लिए प्रसिद्ध है फोर्ट

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क्या नासिक के हरिहर किले में होने वाली है कोई दुर्घटना? एडवेंचर टूरिज्म के लिए प्रसिद्ध है फोर्ट
हरिहर किला

Harihar Fort Viral Videos : हरिहर फोर्ट को भारत के हाइकिंग ट्रेल्स में से सबसे खतरनाक की लिस्ट में रखा गया है. हाइकिंग ट्रेल्स उसे कहा जाता है जो पैदल चलने के योग्य होते हैं और प्राकृतिक वातावरण के बीच होते हैं. हरिहर फोर्ट महाराष्ट्र के नासिक जिले में है और शहर से करीब 50 किलीमीटर दूर है. हरिहर फोर्ट का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें यह बताया जा रहा है कि हरिहर फोर्ट मानसून के दिनों में ऊपर चढ़ने के लिए बहुत खतरनाक हो जाता है और प्रतिदिन के हिसाब से यहां जितने पर्यटक पहुंच रहे हैं, वह किसी बड़ी दुर्घटना को आमंत्रण है.बेंगलुरु का भगदड़ अभी हम भूले नहीं हैं जब रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की विक्ट्री परेड के दौरान मची भगदड़ में 11 लोगों की मौत हुई थी. हालांकि टूरिज्म डिपार्टमेंट ने किसी दुर्घटना को टालने के लिए यहां एक दिन में सिर्फ 300 लोगों को ही प्रवेश की अनुमति दी है, बावजूद इसके यहां भीड़ नियंत्रित नहीं हो रही है.

हरिहर फोर्ट की क्या है खासियत

Harihar-Fort-Of-Nasik
नासिक का हरिहर किला


हरिहर फोर्ट की सीढ़ियां लगभग 90 डिग्री पर खड़ी हैं. यह सीढ़िया बहुत ही रोमांचक और डरावनी लगती है. यह किला त्र्यंबकेश्वर पर्वत श्रृंखला पर स्थित है जिसे सह्याद्री पर्वतमाला का हिस्सा माना जाता है. यह किला त्र्यंबकेश्वर पर्वत श्रृंखला में स्थित है, जो सह्याद्री पर्वतमाला का हिस्सा है. हरिहर फोर्ट पर चढ़ना बहुत ही रोमांचक है. जब आप पहुंचते हैं तो यहां एक छोटा महल है. एक तालाब है और भगवान शिव और हनुमान का मंदिर है. किले के ऊपर से आसपास के इलाकों पर नजर रखी जा सकती है, इसी वजह से इस किले का निर्माण यादव वंश के राजाओं ने कराया था.

किले का मराठा शासकों ने किया रणनीतिक उपयोग

हरिहर फोर्ट पर मराठा शासकों का भी कब्जा रहा, उस दौरान वे इस किले का रणनीतिक इस्तेमाल करते थे. मराठा शासक शिवाजी ने 17वीं शताब्दी में इस किले पर कब्जा किया और इस किले को अपना महत्वपूर्ण गढ़ बनाया. यह किला मराठा शासकों के लिए सैन्य चौकी के समान था. जहां से आसपास के इलाकों पर नजर रखा जाता था और संभावित खतरों को भांपकर उसका समाधान किया जाता था या उसके हिसाब से रणनीति बनाई जाती थी. मराठों से पहले अहमदनगर के सुल्तान का इस किले पर कब्जा था. मराठों के बाद मुगल और फिर अंग्रेजों ने इसपर कब्जा किया था. आज की स्थिति में यह किला महज खंडहर है, जहां कुछ ही निर्माण शेष हैं, लेकिन इसका प्राकृतिक वातावरण इस तरह का है कि लोग यहां आना पसंद करते हैं.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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