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Home Opinion Republic Day 2025: नये संकल्पों एवं नये प्रयोगों से समृद्ध होता गणतंत्र

Republic Day 2025: नये संकल्पों एवं नये प्रयोगों से समृद्ध होता गणतंत्र

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Republic Day 2025: नये संकल्पों एवं नये प्रयोगों से समृद्ध होता गणतंत्र
Republic Day 2025

ललित गर्ग, स्तंभकार, दिल्ली

Republic Day 2025: इस वर्ष गणतंत्र दिवस की थीम ‘स्वर्णिम भारत- विकास के साथ विरासत’ है. यह थीम देश की विरासत को संभालते हुए भारत की प्रगति की यात्रा को दर्शाती है. किसानों, शिक्षकों, न्यायविदों, मजदूरों, वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों, व्यापारियों और इंजीनियरों की विविध भूमिकाओं की सामूहिक शक्ति हमारे देश को ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान’ की भावना के अनुरूप आगे बढ़ने में सक्षम बना रही है. इस बार गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के साथ-साथ पूरे भारत से कई ऐसे लोगों को भी आमंत्रित किया जा रहा है, जिन्होंने अपने गांव, समाज एवं राष्ट्र में विकास के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य किया है, इस तरह इस बार गणतंत्र दिवस समारोह ऐसे अनेक नये प्रयोगों एवं प्रदर्शनों का साक्षी बन रहा है.

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे विशिष्ट संविधान

भारतीय संविधान दुनिया का सबसे विशिष्ट संविधान माना जाता है. भारत की संविधान सभा ने दुनिया के सभी संविधानों का अध्ययन किया और हर संविधान के विशिष्ट प्रावधानों को अपने संविधान में शामिल किया. नागरिक स्वतंत्रता के जितने अधिकार भारतीय संविधान में हैं, उतने दुनिया के किसी अन्य संविधान में नहीं. भारतीय संविधान की दूसरी विशेषता संविधान की विशालता एवं समग्रता है. भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता का प्रावधान तो है, लेकिन इसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्मानुसार आचरण करने की पूरी स्वतंत्रता है. इसमें नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य की स्पष्ट विवेचना है. इसमें संघात्मकता भी है और एकात्मकता भी है.

भारतीय संविधान में केंद्र और राज्य सरकार के बीच विषयों और कार्यों का स्पष्ट विभाजन

भारतीय संविधान में सत्ता चयन के लिये संसदीय प्रणाली को सुनिश्चित किया है तथा संचालन के लिये विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जैसे तीन अंग सुनिश्चित किये. भारतीय संविधान में केंद्र और राज्य सरकार के बीच विषयों और कार्यों का स्पष्ट विभाजन है. केंद्र सरकार को कुछ आपात अधिकार भी दिये गये हैं, जिससे वह केंद्र राज्य में हस्तक्षेप कर सकता है. गणतंत्र का जब हम जश्न मनाते हैं, तो उसमें कुछ कर गुजरने की तमन्ना भी जागती है, तो अब तक कुछ न कर पाने की बेचैनी भी दिखती है. हमारी जागती आंखों से देखे गये स्वप्नों को आकार देने का विश्वास मुखर होता है, तो जीवन मूल्यों को सुरक्षित करने एवं नया भारत निर्मित करने की तीव्र तैयारी सामने आती है. अब होने लगा है हमारी स्व-चेतना, राष्ट्रीयता एवं स्व-पहचान का अहसास. इसमें आकार लेते वैयक्तिक, सामुदायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राष्ट्रीय एवं वैश्विक अर्थ की सुनहरी छटाएं हैं.

देश की राजनीति अनेक विसंगतियों एवं विडंबनाओं से घिरी है

राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस हमारी उन सफलताओं की ओर इशारा करता है, जो इतनी लंबी अवधि के दौरान अब जी-तोड़ प्रयासों के फलस्वरूप मिलने लगी हैं. यह हमारी विफलताओं पर भी रोशनी डालता है कि हम नाकाम रहे तो आखिर क्यों! क्यों हम राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ता नहीं दे पाये हैं? क्यों गणतंत्र के सूरज को राजनीतिक अपराधों, घोटालों और भ्रष्टाचार के बादलों ने घेरे रखा है? यह सही है और इसके लिए सर्वप्रथम जिस इच्छा-शक्ति की आवश्यकता है, वह हमारी शासन-व्यवस्था एवं शासन नायकों में सर्वात्मना नजर आनी चाहिए और ऐसा होने लगा है, तो यह सुखद अहसास है. बावजूद अभी भी देश की राजनीति अनेक विसंगतियों एवं विडंबनाओं से घिरी है. यह विडंबना है कि आजादी की हीरक जयंती मना चुके देश में मतदाता को हम इतना जागरूक नहीं बना पाये कि वो अपने विवेक से मतदान कर सकें. निस्संदेह, यदि देश में गरीबी और आर्थिक असमानता है, तो हमारे नीति-नियंताओं की विफलता ही है. लेकिन हम में कम से कम इतना राष्ट्र प्रेम तो होना चाहिए कि निहित स्वार्थों के लिए हम राष्ट्रीय हितों की बलि न चढ़ाएं.

राजनीतिक इच्छाशक्ति वाली सरकार अपने फैसलों से देश की दशा-दिशा बदल सकती है

एक संकल्प लाखों संकल्पों का उजाला बांट सकता है. यदि दृढ़-संकल्प लेने का साहसिक प्रयत्न कोई शुरू करे. अंधेरों, अवरोधों एवं अक्षमताओं से संघर्ष करने की एक सार्थक मुहिम हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2014 में शुरू हुई थी. उनके तीसरे प्रधानमंत्री के कार्यकाल में सुखद एवं उपलब्धि भरी प्रतिध्वनियां सुनाई दे रही हैं. कुछ समय पूर्व हमने मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा का दृश्य देखा. काशी में विश्वनाथ धाम का जो विकास हुआ है, उसे देखा. इनदिनों प्रयागराज में महाकुंभ का दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान होते हुए हम देख रहे हैं. मोदी ने अपने अब तक के कार्यकाल में जता दिया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति वाली सरकार अपने फैसलों से कैसे देश की दशा-दिशा बदल सकती है. कैसे देश को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर किया जा सकता है. कैसे राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखते हुए पड़ोसी देशों को चेता सकती है, कैसे दुनिया की महाशक्तियों के बीच भी अडिग खड़ी रह सकती है? कैसे स्व-संस्कृति एवं मूल्यों को बल दिया जा सकता है.

महाकुंभ की चमत्कारपूर्ण आभा गर्वित कर रही

गणतंत्र दिवस समारोह मनाते हुए भारत में धर्मस्थलों और तीर्थों के विकास की किसी भी पहल की भी प्रशंसा होनी ही चाहिए. महाकुंभ की एक चमत्कारपूर्ण एवं विलक्षण आभा सामने आयी है, जो हमे गर्वित कर रही है. भारत के गणतंत्र में और भी चार-चांद लग रहे हैं, जैसे प्रयागराज हो, काशी हो या अयोध्या या ऐसे ही धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रांति के परिदृश्य- ये अजूबे एवं चौंकाने वाले लगते हैं. इन परिदृश्यों को केवल चुनावी नफा-नुकसान के नजरिये से नहीं देखना चाहिए, बल्कि एक सशक्त होते राष्ट्र के नजरिये से देखा जाना चाहिए. सदियों की गुलामी के चलते भारत को जिस हीनभावना से भर दिया गया था, आज का भारत उससे बाहर निकल रहा है. यह स्थिति इस वर्ष का गणतंत्र दिवस समारोह मनाते हुए विशेष रूप से गौरवान्वित करेंगी. वाकई यहां अब कोई संदेह शेष नहीं है कि मोदी सरकार देश व समाज को बदल रही है, लोगों का जीवनस्तर उन्नत कर रही है.

देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया जा रहा

धार्मिक स्थलों को भव्य रूप ही नहीं दिया जा रहा है, बल्कि उनसे देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाया जा रहा है. इतना ही नहीं, सीमाओं की सुरक्षा भी बेखूबी हो रही है, समुंदर में हजारों किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर भी बिछाया जा रहा है, हर जिले में मेडिकल कॉलेज भी बनाये जा रहे हैं, उन्नत सड़कों का जाल बिछ रहा है, गरीबों को पक्के मकान भी बनाकर दिये जा रहे हैं, रोजगार, पर्यावरण-सुरक्षा, चिकित्सा, शिक्षा की अनूठी व्यवस्थाएं भी हो रही हैं. मतलब वर्तमान शासन-नायकों को विरासत और विकास की समन्वित चिंता है. हिंदुत्व की चिंता है, तो विकास की भी पूरी फिक्र है. अब सुधार, सुशासन, स्व-संस्कृति, स्व-पहचान के दीपक जल उठे हैं, तो उसकी रोशनी तमाम देशवासियों को नया विश्वास, नया आश्वास, नया विकास एवं सुखद जीवनशैली दे रही है.

हम वास्तविक भारतीयता का स्वाद चखने लगे हैं

भारत के संवैधानिक एवं संप्रभुता संपन्न राष्ट्र बनने की 76वीं वर्षगांठ मनाते हुए हम अब वास्तविक भारतीयता का स्वाद चखने लगे हैं, आतंकवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, क्षेत्रीयवाद, अलगाववाद की कालिमा धूल रही है, धर्म, भाषा, वर्ग, वर्ण और दलीय स्वार्थों के राजनीतिक विवादों पर भी नियंत्रण हो रहा है. इन नवनिर्माण के पदचिन्हों को स्थापित करते हुए हम प्रधानमंत्री के मुख से नये भारत-सशक्त भारत-विकसित भारत को आकार लेने के संकल्पों की बात सुनते हैं. गणतंत्र दिवस का उत्सव मनाते हुए यही कामना है कि पुरुषार्थ के हाथों भाग्य बदलने का गहरा आत्मविश्वास सुरक्षा पाये. एक के लिए सब, सबके लिए एक की विकास गंगा प्रवहमान हो.

नोट – ये लेखक के अपने विचार हैं

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