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Home Opinion खाड़ी से यूरोप तक असर छोड़ता भारत

खाड़ी से यूरोप तक असर छोड़ता भारत

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खाड़ी से यूरोप तक असर छोड़ता भारत
पीएम मोदी की पांच देशों की यात्रा का प्रभाव

PM Modi : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की यात्रा एक नियमित कूटनीतिक यात्रा नहीं थी. संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की यह यात्रा उस नये वैश्विक यथार्थ का प्रतिबिंब थी, जिसमें आर्थिक शक्ति, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी श्रेष्ठता और भू-राजनीतिक गठजोड़ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इस यात्रा ने साफ कर दिया कि भारत अब वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है. पिछले कुछ वर्षों में विश्व व्यवस्था तेजी से अस्थिर हुई है.

रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का संकट, ऊर्जा कीमतों में उछाल और तकनीकी प्रतिस्पर्धा ने दुनिया को नये ध्रुवीकरण की ओर धकेला है. ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी आर्थिक वृद्धि को सुरक्षित रखते हुए रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाये रखे. प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा थी. यह सिर्फ समझौतों व घोषणाओं का कार्यक्रम नहीं, भारत की दीर्घकालिक भू-राजनीतिक दृष्टि का संकेत भी था.


इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि भारत ने खाड़ी और यूरोप को साझा रणनीतिक ढांचे में देखने की कोशिश की. पहले भारत की पश्चिम एशिया नीति ऊर्जा आयात तक सीमित थी, जबकि यूरोप के साथ संबंध व्यापार और राजनीतिक संवाद तक सीमित थे. अब भारत दोनों क्षेत्रों को वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक नेटवर्क के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देख रहा है. इसी कारण मोदी की यात्रा में ऊर्जा, रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, हरित प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं जैसे विषय केंद्रीय रहे. यूएइ की यात्रा इस नयी रणनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण थी.

इसके साथ भारत के संबंधों में पिछले दशक में भारी बदलाव आया है. कभी केवल प्रवासी भारतीयों और तेल व्यापार तक सीमित रिश्ता अब निवेश, रक्षा, तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा तक फैल चुका है. यूएइ के साथ रणनीतिक रक्षा साझेदारी का ढांचा इसका ठोस संकेत है कि भारत अब खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा और सामरिक संतुलन में भी बड़ी भूमिका निभाना चाहता है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव और होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर संकट ने भारत को यह अहसास कराया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल बाजार का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है.

इसी कारण भारत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, दीर्घकालिक एलएनजी समझौतों और ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक ढांचे पर जोर दे रहा है. यूएइ का ओपेक से बाहर निकलना भारत के लिए अवसर के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे तेल उत्पादन में लचीलापन बढ़ सकता है. साथ ही, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार व ऊर्जा सहयोग यह संकेत देता है कि भारत डॉलर आधारित वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के विकल्पों पर भी विचार कर रहा है. प्रधानमंत्री की यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था-भारत का तकनीकी और औद्योगिक शक्ति बनने का प्रयास. यूरोप के साथ हुए समझौते प्रमाण हैं कि भारत अब केवल विदेशी निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक तकनीकी और औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं का प्रमुख केंद्र भी बनना चाहता है.


नीदरलैंड के साथ सेमीकंडक्टर सहयोग, स्वीडन के साथ एआइ और 6जी तकनीक में साझेदारी तथा इटली के साथ उन्नत विनिर्माण और रक्षा सहयोग इसी दिशा में उठाये गये कदम हैं. खासकर सेमीकंडक्टर क्षेत्र में भारत की सक्रियता महत्वपूर्ण है. कोविड और अमेरिका-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बाद दुनिया ने यह महसूस किया कि चिप निर्माण रणनीतिक शक्ति का आधार बन चुका है. भारत को भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभानी है, तो इस उच्च तकनीक विनिर्माण में मजबूत उपस्थिति बनानी होगी. एएसएमएल जैसी डच कंपनी के साथ सहयोग इसी का प्रमाण है. स्वीडन और नॉर्डिक देशों के साथ बढ़ते संबंध भी हमारी विदेश नीति में नया बदलाव दर्शाते हैं. नॉर्डिक देश छोटे हो सकते हैं, पर हरित प्रौद्योगिकी, डिजिटल नवाचार, स्वच्छ ऊर्जा और सतत विकास के क्षेत्र में उनकी भूमिका बड़ी है. भारत समझ चुका है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल सस्ते श्रम और पारंपरिक उद्योगों से नहीं चलेगी. नवाचार, हरित तकनीक और डिजिटल अवसंरचना उसकी नींव होंगे.

इसी कारण भारत-स्वीडन नवाचार साझेदारी और भारत-नॉर्डिक हरित रणनीतिक सहयोग को विशेष महत्व दिया गया. नॉर्वे के साथ ब्लू इकोनॉमी, हरित जहाजरानी और समुद्री प्रौद्योगिकी में सहयोग दर्शाता है कि भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भूमिका भी मजबूत करना चाहता है. यह समुद्री अर्थव्यवस्था को अब ऊर्जा, पर्यावरण, जलवायु और सुरक्षा से जुड़ी व्यापक अवधारणा के रूप में देख रहा है. यह दृष्टिकोण भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति से भी जुड़ा हुआ है.


प्रधानमंत्री मोदी की इटली यात्रा ने संकेत दिया कि भारत यूरोप के भीतर भी नये साझेदार तलाश रहा है. लंबे समय तक भारत की यूरोप नीति फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन के इर्द-गिर्द केंद्रित रही. पर इटली के साथ ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ दर्शाती है कि भारत भूमध्यसागरीय क्षेत्र को भविष्य की वैश्विक कनेक्टिविटी और व्यापार व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देख रहा है. भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारा इसी सोच का परिणाम है. इसे चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में भी देखा जा रहा है.

प्रधानमंत्री की इस पूरी यात्रा का एक और महत्वपूर्ण संदेश था-भारत अब स्वयं को केवल विकासशील देश के रूप में पेश नहीं कर रहा. प्रधानमंत्री ने हर मंच पर भारत को निवेश, नवाचार, विनिर्माण और प्रौद्योगिकी के वैश्विक केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया. ‘मेक इन इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘को-क्रिएट इन इंडिया’ और ‘डेवलप इन इंडिया एंड डिलीवर टू द वर्ल्ड’ जैसी अवधारणाएं दर्शाती हैं कि भारत वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका चाहता है. फिर भी इस यात्रा की वास्तविक सफलता केवल घोषणाओं और समझौतों से तय नहीं होगी. बड़ी चुनौती इन रणनीतिक साझेदारियों को ठोस आर्थिक और तकनीकी परिणामों में बदलने की होगी.

भारत को ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना होगा. यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण रही, क्योंकि इसने स्पष्ट किया कि भारत अब बदलती दुनिया में नयी वैश्विक व्यवस्था को आकार देने की आकांक्षा रखने वाला राष्ट्र बनना चाहता है. ऊर्जा से लेकर तकनीक तक और खाड़ी से लेकर यूरोप तक भारत अपने लिए ऐसी रणनीतिक जगह तैयार करने में लगा है, जहां वह आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभा सके. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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