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Home Opinion संयुक्त शक्ति बन कर खड़े होते चार मुख्यमंत्री,पढ़े, प्रभु चावला का आलेख

संयुक्त शक्ति बन कर खड़े होते चार मुख्यमंत्री,पढ़े, प्रभु चावला का आलेख

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संयुक्त शक्ति बन कर खड़े होते चार मुख्यमंत्री,पढ़े, प्रभु चावला का आलेख
नीति आयोग की बैठक

NITI Aayog meeting : पिछले सप्ताह नीति आयोग की बैठक में चार मुख्यमंत्री याचक बनकर नहीं, संगठित और समन्वित शक्ति के रूप में पहुंचे. केरल के वीडी सतीशन, तेलंगाना के ए रेवंत रेड्डी, कर्नाटक के डीके शिवकुमार और तमिलनाडु के जोसेफ विजय ने एक साथ बैठक में प्रवेश किया और बैठक से निकलते हुए इन चारों ने भारतीय संघवाद की परिभाषा बदल दी. इन चार राज्यों की संयुक्त शक्ति की अनदेखी करना असंभव है. लोकसभा में इनके पास 104 सीटें हैं. ये राज्य देश की जीडीपी का लगभग 26 फीसदी उत्पन्न करते हैं और प्रत्यक्ष कर राजस्व में करीब 30 फीसदी का योगदान देते हैं. इनमें से किसी भी राज्य की सरकार केंद्र की सत्तारूढ़ व्यवस्था का हिस्सा नहीं है.


ये दिल्ली अपने साथ शिकायतों की सूची नहीं, संरचनात्मक समस्याओं का विश्लेषण लेकर गये थे. विपक्षी राजनीति ने दशकों से शोर को शक्ति समझने की भूल की है. दक्षिण के इन चार नेताओं ने पहली बैठक में ही यह परंपरा तोड़ दी. वैचारिक रूप से एकजुट समूह के रूप में सामने आकर इन्होंने दक्षिणी एकजुटता को प्रभावशाली बना दिया. इन्होंने राष्ट्रीय मंच पर जो मुद्दा रखा है, वह वास्तविक है और संवैधानिक व्यवस्था की उपज भी. दक्षिणी राज्यों ने हर प्रशासनिक और विकास मानक पर आदर्श संघीय नागरिकों-सा व्यवहार किया है. इन्होंने जनसंख्या वृद्धि को तब नियंत्रित किया, जब यह राष्ट्रीय विकास के लिए जरूरी था.

शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से इन्होंने मानव संसाधन की मजबूत नींव तैयार कीं और निर्यात उन्मुख अर्थव्यवस्थाएं विकसित कीं. पर अगली जनगणना के बाद प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया में इन्हें संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी मिलने की आशंका है. इन्हें लगता है कि सुशासन और विकास को दंडित किया जा रहा है, जबकि जनसंख्या विस्तार को पुरस्कृत किया जा रहा है. छप्पन वर्षीय रेवंत रेड्डी ने इस विरोधाभास को सबसे प्रभावी राष्ट्रीय अभिव्यक्ति दी है. इनका प्रस्तावित मिश्रित फाॅर्मूला, जिसमें आधी सीटें आबादी के आधार पर और आधी आर्थिक योगदान के आधार पर आवंटित की जायें, कोई नया सिद्धांत नहीं. यह केवल उस मान्यता को लोकसभा की संरचना तक ले जाता है, जो अभी बजटीय गणनाओं में मौजूद है. इस तरह इन्होंने एक क्षेत्रीय चिंता को संवैधानिक प्रश्न में बदल दिया है, जिसका सामना किसी भी गंभीर संघीय लोकतंत्र को करना ही होगा.

रेवंत रेड्डी परिसीमन बहस का राष्ट्रीय चेहरा बन चुके हैं और उनके पास इसे लंबे समय तक जीवित रखने की ऊर्जा और क्षमता भी है. बासठ वर्षीय वीडी सतीशन इस समूह के बौद्धिक और नैतिक स्तंभ हैं. सक्रिय वकील और छह बार विधायक रहे सतीशन ने केरल में कांग्रेस का पुनर्निर्माण धैर्यपूर्ण और सिद्धांतनिष्ठ कार्य से किया. उनके पास स्वच्छ शासन का प्रमाणित अनुभव है. जबकि चौंसठ वर्षीय डीके शिवकुमार इस समूह की अनिवार्य संगठनात्मक शक्ति हैं. आठ बार विधायक रह चुके शिवकुमार बूथ स्तर की राजनीति और गठबंधन गणित पर अद्वितीय पकड़ रखते हैं. इन्होंने कर्नाटक में लगभग समाप्तप्राय स्थिति से कांग्रेस को पुनर्जीवित किया और अस्तित्व की लड़ाई को स्थिर शासन में बदला. कर्नाटक केवल एक और दक्षिणी राज्य नहीं, बल्कि पूरे प्रायद्वीप का भौतिक व राजनीतिक सेतु है. जो भी राजनीतिक गठबंधन राष्ट्रीय महत्व प्राप्त करना चाहता है, उसे इस द्वार से होकर गुजरना होगा.


इक्यावन वर्षीय जोसेफ विजय इस समूह का सबसे परिवर्तनकारी तत्व हैं. इन्होंने वंशवादी राजनीति तथा स्थापित दल में लंबी राजनीतिक प्रशिक्षण प्रक्रिया के बगैर और बिना उस वैचारिक ढांचे के राजनीति में प्रवेश किया, जो आमतौर पर तमिलनाडु की राजनीति को आकार देता है. इन्होंने अपनी सांस्कृतिक लोकप्रियता को ऐसे बहुमत में बदला, जो अब दक्षिण भारत की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़े संसदीय प्रतिनिधित्व वाले राज्य पर शासन करता है. अपने पहले कार्यकाल में नीति आयोग की बैठक में इनकी उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति तमिलनाडु की पारंपरिक दूरी अब बदल रही है.

विजय के पास विभिन्न समुदायों में फैला ऐसा समर्थन आधार है, जिसे पारंपरिक राजनीतिक श्रेणियों में आसानी से नहीं बांधा जा सकता. ये चारों एक दिशा में काम करें, तो वह चीज पैदा कर सकते हैं, जिसे भारतीय विपक्षी राजनीति करने में बार-बार विफल रही है. भाजपा की संगठनात्मक उपस्थिति दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्सों में अब भी सीमित है. तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में उसकी चुनावी संभावनाएं संरचनात्मक रूप से बाधित हैं. केवल कर्नाटक ही वास्तविक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र है. यह असमानता इस चौकड़ी को वह रणनीतिक स्वतंत्रता देती है, जो हिंदी पट्टी के विपक्षी नेताओं को शायद ही प्राप्त हो. फिर भी इन चारों की वास्तविक प्रतिद्वंद्वी भाजपा नहीं है. क्षेत्रीय गठबंधनों का इतिहास बताता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं, राज्यों के परस्पर विरोधी हित और तात्कालिक राजनीतिक लाभ अक्सर उन्हें तोड़ देते हैं. जाहिर है, प्रभावशाली एकजुटता को स्थायित्व में बदलना चुनाव जीतने से अधिक कठिन कार्य है. इतिहास में सफलता की तुलना में असफलता के उदाहरण अधिक हैं.


फिर भी इस बार परिस्थितियां अपेक्षाकृत अनुकूल हैं. इस समूह की आर्थिक शक्ति और संसदीय संख्या इन चारों को वह राजनीतिक प्रभाव प्रदान करती है, जो केवल भावनाओं से संभव नहीं होता. परिसीमन का प्रश्न इन्हें एक स्थायी संवैधानिक मुद्दा देता है, जिसके इर्द-गिर्द समय के साथ समन्वय मजबूत हो सकता है. चूंकि इन चारों में से कोई भी राष्ट्रीय राजनीति की पारंपरिक चरम आयु से आगे नहीं निकला है, ऐसे में, इस परियोजना को अगले दशक तक आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त राजनीतिक ऊर्जा उपलब्ध है. यदि यह अनुशासन बना रहता है, तो इसका असर अगले चुनावी चक्र से कहीं आगे तक जायेगा. इतनी आर्थिक और संसदीय शक्ति वाला दक्षिणी गठबंधन समय के साथ संघवाद की शर्तों पर पुनर्विचार करवाने की स्थिति में पहुंच सकता है. वैसे में, राष्ट्रीय गठबंधन की राजनीति स्थायी रूप से बदल सकती है.

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ और ‘एक दल का प्रभुत्व’ जैसी अवधारणाओं की जगह ऐसी राजनीति ले सकती है, जिसमें केंद्र में शासन करने की आकांक्षा रखने वाली किसी भी पार्टी या गठबंधन को दक्षिणी राज्यों की शक्ति को स्वीकार करना पड़े. यह इस पर निर्भर करेगा कि ये चार नेता आगे क्या करते हैं. दक्षिण भारत को ऐसे नेता मिले हैं, जो दांव पर लगे मुद्दों की गंभीरता को समझते दिखाई देते हैं. राजनीतिक शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे स्थानांतरित हो रहा है-आबादी के संयोग से नहीं, बल्कि सुनियोजित संगठन और रणनीति के कारण. बहस बदल चुकी है. संभव है कि सत्ता की संरचना भी जल्द ही उसके पीछे-पीछे बदल जाये. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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