नेपाल में लोकतांत्रिक बदलाव का मतलब, पढ़ें डॉ सौरभ का आलेख

बालेन शाह के नेतृत्व में नेपाल एक नये दौर में प्रवेश कर रहा है. आने वाले महीने ये बतायेंगे कि क्या उनकी पार्टी अपने व्यापक सुधार एजेंडे को ठोस नीति और शासन परिणामों में बदल सकती है. बालेन शाह एक आत्मविश्वासी, तकनीकी और राष्ट्रवादी पीढ़ी का चेहरा हैं, जो भारत के साथ 'विशेष संबंध' को समानता और 'नेपाल पहले' के दृष्टिकोण पर आधारित करने को प्राथमिकता देते हैं. भारत की चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि शाह की 'नेपाल फर्स्ट' नीति 'चीन फर्स्ट' में न बदल जाए. भारत को अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक भूमिका को प्रभावी ढंग से जोर देना होगा.

By डॉ सौरभ | March 9, 2026 6:54 AM

नेपाल के चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) की ऐतिहासिक जीत हिमालय के राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक लोकतांत्रिक बदलाव का संकेत देती है. आरएसपी की स्थापना 2022 में रवि लामिछाने द्वारा की गयी थी, इसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बलेंद्र ‘बालेन’ शाह हैं. बालेन ने चुनाव अभियान के दौरान खुद को ‘मधेश के पुत्र’ के रूप में पेश किया था, और आरएसपी ने ‘अब की बार बलेंद्र सरकार’ टैगलाइन के साथ चुनाव अभियान शुरू किया था. पिछले साल जेन जी के आंदोलन ने नेपाल की राजनीति को पूरी तरह हिला दिया था. उस आंदोलन के कारण केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गयी थी और देश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गयी थी. इस चुनाव में भ्रष्टाचार और सिस्टम में बदलाव, आर्थिक संकट, बढ़ती बेरोजगारी और शासन के प्रति असंतोष जैसे मुद्दे थे.

नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक शक्तियों में सबसे प्रमुख नाम केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल है. इसके अलावा पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी भी बड़ी ताकत मानी जाती है. लेकिन आरएसपी की यह जीत मतदाताओं द्वारा पारंपरिक स्थापित पार्टियों की पूरी तरह से अस्वीकृति का संकेत है. चुनाव में 1.89 करोड़ योग्य मतदाताओं की मजबूत भागीदारी देखी गयी, जिसमें 2022 से 9,15,000 से अधिक नये मतदाताओं की वृद्धि शामिल है, जो जेन जी के महत्वपूर्ण प्रभाव को दर्शाती है. मतदान नेपाल के सभी 77 जिलों में एक ही चरण में हुआ. जैसे ही आरएसपी ने प्रतिनिधि सभा में भारी बहुमत हासिल किया, ध्यान तेजी से उन महत्वाकांक्षी सुधारों की ओर बढ़ रहा है, जिन्हें पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में लागू करने का वादा किया है.

घरेलू स्तर पर पार्टी ने व्यापक राजनीतिक सुधारों की वकालत की है, जिसमें मतदाताओं द्वारा सीधे चुने गये प्रधानमंत्री और पूरी तरह से आनुपातिक संसदीय प्रणाली की शुरुआत शामिल है. आरएसपी की महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताओं में से एक है सत्ता संभालने के तीन महीनों के भीतर संवैधानिक संशोधनों पर बहस शुरू करना. आरएसपी ने राज्य संचालन में संरचनात्मक बदलाव का भी प्रस्ताव रखा है, ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि सांसद एक ही समय में मंत्री के रूप में कार्य न करें, और पार्टी का कहना है कि यह कदम कार्यपालिका के संसदीय निरीक्षण को मजबूत करेगा. घोषणा पत्र में 1990 में लोकतंत्र बहाल होने के बाद से सभी सार्वजनिक कार्यालयधारियों की संपत्ति की व्यापक जांच कराने का भी प्रस्ताव है. अवैध तरीके से प्राप्त संपत्ति को राष्ट्रीयकृत किया जायेगा.

आरएसपी के सुधार एजेंडा का एक प्रमुख हिस्सा संघीय सरकार के पुनर्गठन से संबंधित है. इसने 18 संघीय मंत्रालयों तक संख्या को सीमित रखने का वचन दिया है, जबकि 14 मंत्रालयों को विशेषज्ञ मंत्रियों द्वारा संचालित करने का प्रावधान है. इसके अतिरिक्त, आरएसपी सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को राष्ट्रीय रणनीतिक उद्योग घोषित करने की योजना बना रही है, जिससे नेपाल को डिजिटल सेवाओं के लिए एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में स्थापित किया जा सके. पार्टी ने महत्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्य निर्धारित कर अगले दशक में 30,000 मेगावाट बिजली उत्पन्न करने का वचन दिया है. नेपाल में चुनाव के सफल और शांतिपूर्ण संचालन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘मैं नेपाल के लोगों और सरकार को हार्दिक बधाई देता हूं. यह देखकर खुशी होती है कि मेरी नेपाली बहनें और भाई अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इतने ऊर्जा के साथ उपयोग कर रहे हैं. यह ऐतिहासिक उपलब्धि नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा के गर्व का क्षण है. एक करीबी मित्र और पड़ोसी के रूप में, भारत नेपाल के लोगों और उनकी नयी सरकार के साथ मिलकर साझा शांति, प्रगति और समृद्धि की नयी ऊंचाइयों को प्राप्त करने के अपने संकल्प में स्थिर बना हुआ है.’

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और विदेशी निवेश का मुख्य स्रोत है. दशकों से भारत की नेपाल नीति नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल जैसी स्थापित पार्टियों के साथ स्थिर संबंधों पर आधारित है. बालेन शाह का उदय इस युग में बदलाव का संकेत देते हैं. बालेन शाह एक आत्मविश्वासी, तकनीकी और राष्ट्रवादी पीढ़ी का चेहरा हैं, जो भारत के साथ ‘विशेष संबंध’ को समानता और ‘नेपाल पहले’ के दृष्टिकोण पर आधारित करने को प्राथमिकता देते हैं. उनके पहले ‘वृहत नेपाल’ मानचित्र विवाद और काठमांडू में भारतीय फिल्मों पर उनकी अस्थायी रोक उनके जनवादी राष्ट्रवाद के शुरुआती संकेत हैं. संसद में दो-तिहाई बहुमत के साथ शाह को संवेदनशील मुद्दों, जैसे कि 1950 का शांति और मित्रता संधि और कालापानी-लिपुलेख सीमा विवाद पर यथार्थवादी रुख अपनाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है.

राष्ट्रवादी रुख रखने के बावजूद, शाह की मूल अपील उनके घोषणापत्र में निहित है, जो ‘विकास’ पर केंद्रित है, और 12 लाख नौकरियां सृजित करने, जीडीपी को 100 अरब डॉलर तक बढ़ाने और शहरी बुनियादी ढांचे में सुधार करने का वादा करता है. यह भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है. अगर भारत अपनी विकासात्मक सहायता को शाह की तकनीकी प्राथमिकताओं के साथ मिलाकर, खासकर जलविद्युत, डिजिटल कनेक्टिविटी और एकीकृत चेक-पॉइंट में काम कर कर सके, तो यह आर्थिक उपयोगिता पर आधारित नया साझेदार तैयार कर सकता है. आरएसपी ने नेपाल को ‘बफर स्टेट’ से ‘सक्रिय सेतु’ (वाइब्रेंट ब्रिज) में बदलने का संकल्प जताया है.

इसके तहत त्रिपक्षीय आर्थिक साझेदारी और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देने की योजना है, खासकर भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ. पार्टी ने यह माना है कि नेपाल में भारत और चीन के रणनीतिक हित हैं तथा वैश्विक शक्ति संतुलन में व्यापक बदलाव हो रहा है. ऐसे में नेपाल को सक्रिय और लचीली कूटनीतिक नीति अपनानी चाहिए, ताकि वह बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और पड़ोसी अर्थव्यवस्थाओं के उदय से लाभ उठा सके. शाह युग का सबसे नाजुक पहलू उनके भारत, चीन और अमेरिका के साथ’ संतुलित संबंध’ सिद्धांत होगा. भारत की चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि शाह की ‘नेपाल फर्स्ट’ नीति ‘चीन फर्स्ट’ में न बदल जाये. भारत को अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक भूमिका को प्रभावी ढंग से जोर देना होगा, तभी भारत और नेपाल अपनी गरिमापूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को नयी दिशा दे पायेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)