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Home Opinion ऊर्जा सुरक्षा हो अपनी प्राथमिकता, पढ़ें देबजित पालित और डॉ आकांक्षा जैन का आलेख

ऊर्जा सुरक्षा हो अपनी प्राथमिकता, पढ़ें देबजित पालित और डॉ आकांक्षा जैन का आलेख

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ऊर्जा सुरक्षा हो अपनी प्राथमिकता, पढ़ें देबजित पालित और डॉ आकांक्षा जैन का आलेख
ऊर्जा सुरक्षा पर देबजित पालित और डॉ आकांक्षा जैन का आलेख, फोटो- पीटीआई

देबजित पालित, सेंटर हेड, इनर्जी ट्रांजिशन, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन
डॉ आकांक्षा जैन, रिसर्च कंसल्टेंट, इनर्जी ट्रांजिशन, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन

Middle East Crisis: जैसे-जैसे पश्चिम एशिया में संघर्ष तीव्र हो रहा है और होर्मुज जलडमरुमध्य में व्यवधान जारी है, भारत की ऊर्जा संवेदनशीलता स्पष्ट रूप से सामने आ रही है. भारत के लिए इसके प्रभाव तत्काल और वास्तविक हैं, क्योंकि यह अपने कच्चे तेल का लगभग 40-50 फीसदी, अपने तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का 50 फीसदी से अधिक और आयातित तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का अधिकांश (90 फीसदी) इसी रास्ते से आयात करता है. भारत अपने कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85 फीसदी से अधिक, प्राकृतिक गैस का लगभग 50–55 प्रतिशत और एलपीजी की खपत का करीब 60 फीसदी आयात करता है. यह आयात निर्भरता बाहरी झटकों को बहुत तेजी से घरेलू संकट में बदल देती है.

हमने देखा कि शरुआत में संकट के गहराते ही साप्ताहिक एलपीजी आयात में लगभग 30 प्रतिशत की गिरावट आयी और बहत्तर घंटों के भीतर ही घबराहट में खरीदारी के कारण एलपीजी एजेंसियों के भंडार खाली हो गये. सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू किया, व्यावसायिक आपूर्ति को सामान्य स्तर के 20 फीसदी तक सीमित कर दिया और रिफाइनरियों से एलपीजी उत्पादन बढ़ाने को कहा. ऊर्जा संकट का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई परस्पर जुड़े क्षेत्रों में फैल गया. सबसे अधिक प्रभावित उर्वरक क्षेत्र हुआ, क्योंकि देश की लगभग 70 प्रतिशत यूरिया उत्पादन क्षमता गैस आधारित है, जिसमें से लगभग 86 फीसदी गैस पश्चिम एशिया से आती है. एलएनजी आपूर्ति में बाधा ने सब्सिडी का बोझ बढ़ा दिया और आपूर्ति संकट का खतरा पैदा कर दिया. मासिक यूरिया उत्पादन, जो सामान्यतः 25 लाख टन होता है, मार्च में घटकर 17 लाख टन होने का अनुमान है, क्योंकि संयंत्रों ने गैस बचाने के लिए रखरखाव कार्य पहले ही शुरू कर दिये.

खरीफ बुवाई का मौसम जून में शुरू होता है. ऐसे में, यदि यह संघर्ष अप्रैल के बाद भी जारी रहता है, तो स्थिति पूरी तरह बदल सकती है, जिससे उर्वरक संकट खाद्य सुरक्षा संकट में बदल सकता है. अन्य प्रभावित क्षेत्रों में परिवहन और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमइ) शामिल हैं. जाहिर है, ऊर्जा केवल एक अलग क्षेत्र नहीं है, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की आधारभूत जरूरत है, इसलिए इसमें व्यवधान का प्रभाव व्यापक और बहुगुणित होता है. मौजूदा संकट बार-बार घटित होने वाला एक पैटर्न है. वर्ष 1973 के अरब तेल प्रतिबंध ने वैश्विक तेल कीमतों को 300 फीसदी तक बढ़ा दिया था और भारत को पहली बार आयात निर्भरता के बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर किया था. वर्ष 1990 के खाड़ी युद्ध ने इराकी तेल निर्यात को कम कर दिया. उसके बाद 2010 और 2018 में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने भारत को अपने तीसरे सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता से आयात लगभग शून्य करने के लिए मजबूर किया. फिर फरवरी, 2022 में रूस-यूक्रेन संकट ने फिर से परिस्थितियों को बदल दिया.

मूल समस्या दरअसल संरचनात्मक है : ऊर्जा व्यवस्था स्थिर दुनिया में कीमतों के अनुकूलन के लिए बनायी गयी है, पर अस्थिर दुनिया के लिए उसमें कोई अतिरिक्त सुरक्षा नहीं है. भारत ने ऊर्जा सुरक्षा के लिए आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है-पश्चिम एशिया, रूस, अमेरिका और अफ्रीका से आयात बढ़ाकर. इससे किसी एक देश पर निर्भरता तो कम होती है, पर प्रणालीगत जोखिम समाप्त नहीं होता. एलपीजी संकट एक महत्वपूर्ण कमजोरी को उजागर करता है. भारत की रसोई ऊर्जा प्रणाली एलपीजी पर अत्यधिक निर्भर है. यदि विश्वसनीय बिजली आपूर्ति या विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा से समर्थित बिजली पर खाना पकाने के विकल्पों को बढ़ाया जाये, तो इस निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है. देश की ऊर्जा व्यवस्था पर पुनर्विचार की शुरुआत ‘इलेक्ट्रॉन्स बनाम अणु’ से होनी चाहिए. अणु यानी तेल, गैस, एलएनजी और एलपीजी जैसे वे ऊर्जा स्रोत, जिन्हें निकालना, परिवहन करना और वैश्विक आपूर्ति शृंखला के माध्यम से लाना पड़ता है. चूंकि भारत में इनका पर्याप्त उत्पादन नहीं होता, इसलिए ये भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील हैं. इसके विपरीत, ‘इलेक्ट्रॉन्स’ यानी बिजली का उत्पादन देश के भीतर होता है और इसका वितरण राष्ट्रीय ग्रिड के माध्यम से होता है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है.

सकारात्मक बात यह है कि भारत ने बिजली क्षेत्र में अपेक्षा से कहीं अधिक प्रगति की है. पिछले साल 29 जुलाई को पहली बार एक दिन में भारत की कुल बिजली मांग का 51.5 प्रतिशत नवीकरणीय स्रोतों से पूरा हुआ. ऐसे ही, सितंबर, 2025 तक देश की कुल स्थापित क्षमता 500 गीगावॉट से अधिक हो गयी, जिसमें 51 फीसदी से अधिक गैर-जीवाश्म स्रोतों से था-यह लक्ष्य 2030 से पांच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया गया. फरवरी, 2026 तक नवीकरणीय क्षमता 266 गीगावॉट से अधिक हो चुकी है. वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 50 गीगावॉट नयी नवीकरणीय क्षमता जोड़ी, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुनी है. इस बार के केंद्रीय बजट में ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर के लिए 600 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं. इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री भी तेजी से बढ़ रही है. ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है. हर इलेक्ट्रिक वाहन डीजल की मांग कम करता है. हर इंडक्शन चूल्हा एलपीजी सिलेंडर की आवश्यकता घटाता है. ऐसे ही, सौर ऊर्जा इकाई किसी विदेशी सरकार के निर्णयों पर निर्भर नहीं रहती. भारत की नवीकरणीय ऊर्जा क्रांति केवल पर्यावरण की दृष्टि से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है.

फिर भी, कुछ क्षेत्रों जैसे विमानन, शिपिंग, भारी उद्योग, माल परिवहन और पेट्रोकेमिकल्स में ‘अणु’ आवश्यक बने रहेंगे. इन क्षेत्रों के लिए भारत को हरित हाइड्रोजन, जैव ईंधन, बायोगैस और कृत्रिम ईंधनों जैसे घरेलू स्तर पर उत्पादित हरित विकल्पों को प्राथमिकता देनी चाहिए. जैसे, बायोगैस जैविक और कृषि अपशिष्ट से बनायी जा सकती है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा से हरित हाइड्रोजन तैयार किया जा सकता है, जिसे पाइप्ड प्राकृतिक गैस के साथ मिलाया जा सकता है. कोयले के गैसीकरण से सिंथेटिक गैस बनायी जा सकती है, जिससे डाइमिथाइल ईथर तैयार कर एलपीजी के साथ मिलाया जा सकता है. यानी जहां संभव हो, वहां बिजली का उपयोग, और जहां जरूरी हो, वहां ईंधन का उपयोग. अब समय आ गया है कि भारत ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के रूप में देखे और भू-राजनीतिक झटकों से निपटने के लिए अपनी क्षमता मजबूत करे. (ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)

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