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Home Opinion पूर्वी भारत का आर्थिक गौरव लौट सकता है

पूर्वी भारत का आर्थिक गौरव लौट सकता है

पूर्वी भारत का आर्थिक गौरव लौट सकता है
कोलकाता का हावड़ा ब्रिज

Eastern India : देश ने चुनावों के दौरान खासकर पश्चिम बंगाल में तीव्र राजनीतिक गर्माहट देखी है. तृणमूल कांग्रेस में हुए राजनीतिक घटनाक्रम और उसके बाद चले तीखे आरोप-प्रत्यारोपों से अलग हटकर अब समय आ गया है कि पश्चिम बंगाल के आर्थिक विकास और उसके पूरे पूर्वोत्तर के समेकित विकास पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार किया जाये. दिल्ली से पश्चिम बंगाल तक, झारखंड को छोड़ सभी राज्यों में भाजपा प्रत्यक्ष रूप से या प्रमुख गठबंधन सहयोगी के रूप में सत्ता में है. इसमें पूर्वोत्तर के सात में से छह राज्य भी शामिल हैं. दिल्ली को छोड़कर ये सभी राज्य आर्थिक विकास, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद और मानव विकास के मानकों में पिछड़े हुए हैं. इन राज्यों से लगातार हो रहा पलायन लंबे समय से सामाजिक-राजनीतिक चिंता का विषय रहा है.

भारत की आजादी के समय देश का आर्थिक भूगोल आज की तुलना में बिल्कुल भिन्न था. तब उत्तर प्रदेश, अविभाजित बिहार और पश्चिम बंगाल से मिलकर बना पूर्वी क्षेत्र देश की औद्योगिक और वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था. इस क्षेत्र के पास अधिकांश औद्योगिक आधारभूत संरचना, खनिज संसाधन, रेल नेटवर्क, नदी परिवहन और इंजीनियरिंग क्षमता उपलब्ध थी. उत्तर प्रदेश चीनी उत्पादन, वस्त्र निर्माण, चमड़ा उद्योग, कांच और पीतल उद्योग के साथ कृषि उत्पादन में अग्रणी था. कानपुर को वस्त्र मिलों और चमड़ा उद्योग के कारण ‘पूरब का मैनचेस्टर’ कहा जाता था. वाराणसी, आगरा, मेरठ और मुरादाबाद जैसे शहर भी अपने मजबूत विनिर्माण आधार के लिए प्रसिद्ध थे. तब बिहार कोयला, लौह अयस्क, अभ्रक, तांबा, बॉक्साइट और चूना पत्थर जैसे खनिजों तथा इस्पात उद्योग का प्रमुख केंद्र था. बोकारो, रांची, धनबाद और हजारीबाग जैसे शहर खनन, धातुकर्म और इंजीनियरिंग पर आधारित एकीकृत औद्योगिक तंत्र का निर्माण करते थे. तब पश्चिम बंगाल नि:संदेह देश का सबसे प्रमुख औद्योगिक राज्य था.

कोलकाता भारत का प्रमुख वाणिज्यिक और औद्योगिक केंद्र होने के साथ पूरे पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण पूर्व एशिया और यहां तक कि यूरोप तक व्यापार का मुख्य प्रवेश द्वार था. यह शहर बैंकिंग, बीमा और जहाजरानी का प्रमुख केंद्र भी था. पश्चिम बंगाल जूट, इंजीनियरिंग उत्पादों, रेलवे उपकरणों, भारी मशीनरी, फाउंड्री, रसायन उद्योग तथा चाय व्यापार और निर्यात में अग्रणी था. कोलकाता, हावड़ा, दुर्गापुर, आसनसोल और वर्धमान तक फैली औद्योगिक पट्टी भारत के भारी उद्योग की रीढ़ थी. शोधकर्ताओं का अनुमान है कि 1950-51 में देश के कुल औद्योगिक उत्पादन का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा अकेले पश्चिम बंगाल से आता था. इस क्षेत्र की एकीकृत अर्थव्यवस्था ने उच्च उत्पादकता सुनिश्चित की. स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में विकसित औद्योगिक ढांचे ने भारत के व्यापक आर्थिक परिवर्तन की नींव रखी थी. पूर्वोत्तर, पश्चिमी और दक्षिणी क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता अनेक जटिल ऐतिहासिक घटनाओं का परिणाम है, जिनमें व्यापक आर्थिक नीतियों की विकृतियां, संरचनात्मक असंतुलन और राजनीतिक परिवर्तन शामिल हैं.


इस गिरावट की शुरुआत 1952 की मालभाड़ा समानीकरण नीति से हुई. इस नीति के अंतर्गत केंद्र सरकार ने समानीकरण कोष के माध्यम से प्रमुख औद्योगिक कच्चे माल के लंबी दूरी के परिवहन पर सब्सिडी दी, जिससे खनिज संपन्न राज्यों को मिलने वाला प्राकृतिक भौगोलिक लाभ समाप्त हो गया. इस नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय आर्थिक संतुलन स्थापित करना था. इसके अंतर्गत कोयला और इस्पात जैसे खनिजों के परिवहन पर सब्सिडी दी गयी. किंतु कपास और तिलहन जैसी अन्य वस्तुओं के परिवहन पर ऐसा नहीं किया गया. उस नीति ने पूर्वी क्षेत्र के कम लागत वाले प्राकृतिक लाभ को समाप्त कर दिया. इससे पश्चिम बंगाल का राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 1960-61 के लगभग 10.5 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में केवल 5.6 फीसदी रह गया.

इस झटके को श्रमिक अशांति, आधारभूत संरचना के पतन, कुप्रशासन और तटीय अर्थव्यवस्थाओं के उदय जैसे अन्य कारणों ने और गहरा किया. पूर्वी क्षेत्र उपजाऊ गंगा के मैदानों, विस्तृत रेल और नदी नेटवर्क, कोयला तथा अन्य खनिज संसाधनों, ऐतिहासिक औद्योगिक केंद्रों, विशाल युवा आबादी और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच जैसी प्राकृतिक एवं आर्थिक शक्तियों से संपन्न है. नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और दक्षिण पूर्व एशिया की निकटता इसे विशाल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच प्रदान करती है. इतिहासकार और अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने कहा था, विकास और अविकास, दोनों संचयी प्रक्रियाएं हैं. पूर्वी क्षेत्र के पुनरुत्थान को भी एक संचयी प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए, जहां प्रत्येक राज्य को अलग-अलग कर देखने के बजाय पूरे क्षेत्र को एकीकृत अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित किया जाये. इसके लिए व्यावहारिक नीतियों और सहयोगात्मक दृष्टिकोण जरूरी है.


कानपुर, प्रयागराज व वाराणसी, पटना और धनबाद तथा आसनसोल, दुर्गापुर और कोलकाता को जोड़ने वाला एक अत्याधुनिक उच्च गति का माल परिवहन एवं औद्योगिक गलियारा विकसित किया जाना चाहिए. इसमें औद्योगिक पार्क, व्यापारिक केंद्र, गोदाम, लॉजिस्टिक हब व निर्यात क्षेत्र शामिल हों. माल परिवहन नेटवर्क को पूर्वी समर्पित माल गलियारे, अंतर्देशीय जलमार्गों, कंटेनर टर्मिनलों, कोल्ड स्टोरेज शृंखलाओं और बहु माध्यमीय लॉजिस्टिक पार्कों के इर्द-गिर्द विकसित किया जाना चाहिए. कोलकाता को बंदरगाह आधुनिकीकरण, प्रौद्योगिकी पार्क, लॉजिस्टिक हब और अंतरराष्ट्रीय व्यापार सुविधाओं के माध्यम से पुनः पूर्वी भारत के प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए. ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, चमड़ा, वस्त्र और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए.

बिहार में कृषि प्रसंस्करण, उर्वरक, इंजीनियरिंग, सीमेंट, निर्माण सामग्री तथा नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. पश्चिम बंगाल में इंजीनियरिंग, पेट्रोकेमिकल्स, जहाज निर्माण, रेलवे उपकरण एवं भारी उद्योगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. इन योजनाओं के साथ शहरी विकास, मानव संसाधन में निवेश, ऋण जमा अनुपात के पुनर्संतुलन तथा संस्थागत समन्वय पर विशेष बल देना होगा. भारत की ‘डेवलप ईस्ट नीति’ को सफल बनाने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और असम को शामिल करते हुए एक स्थायी पूर्वी क्षेत्रीय परिषद का गठन किया जाना चाहिए. एकीकृत गलियारा आधारित आर्थिक रणनीति इन संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करेगी और भारत को अधिक संतुलित, समृद्ध तथा समावेशी अर्थव्यवस्था बनाने में सहायता करेगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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