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नितिन नबीन के जरिये बंगाल को साधने की कोशिश

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नितिन नबीन के जरिये बंगाल को साधने की कोशिश
नितिन नबीन और राजनाथ सिंह

Nitin Nabin : नरेंद्र मोदी के दौर की बीजेपी का जब इतिहास लिखा जायेगा, तब उसकी तमाम खूबियों और खामियों के साथ एक तथ्य को शिद्दत से याद किया जायेगा. वह है पार्टी का हर बार चौंकाने वाला फैसला लेना. राजनीति के लिहाज से 45 वर्ष की उम्र युवा मानी जाती है. राजनीति में युवाओं को शीर्ष पर बैठाने की परंपरा कम ही रही है. पर बीजेपी ने 45 वर्षीय नितिन नबीन को अपना कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया है. नितिन को भले ही पार्टी ने कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है, पर ऐसा माना जा रहा है कि अगले वर्ष जनवरी के आखिर तक उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष के तौर पर चुन लिया जायेगा.


नितिन की ताजपोशी पर चर्चा से पहले बीजेपी से जुड़े अतीत के एक किस्से को याद कर लिया जाना चाहिए. मई 1996 में तेरह दिनी वाजपेयी सरकार के विश्वासमत पर चर्चा के दौरान सुषमा स्वराज ने कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व से पूछा था, कहां है आपकी सेकेंड लाइन ऑफ लीडरशिप. हमारी ओर देखिए, वेंकैया हैं, अनंत हैं, प्रमोद हैं. अटल-आडवाणी और जोशी के दौर की बीजेपी में बिना शक ये तीनों ही नाम शीर्ष नेतृत्व में शामिल थे. पार्टी की दूसरी पांत में स्वयं सुषमा स्वराज का नाम भी शामिल था.

बाद के दिनों में अरुण जेटली को भी इसी पंक्ति में शामिल कर लिया गया था. ऐसे में यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या नितिन नवीन का नाम दूसरी पंक्ति के नेताओं में शुमार होता है. निश्चित तौर पर इसका उत्तर न में है. भले ही वे पांच बार के विधायक हों, पर राष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम इतना चर्चित नहीं रहा है. बीजेपी के मुख्य संगठन में छत्तीसगढ़ के प्रभार की जिम्मेदारी छोड़ दें, तो इसके पहले कोई बड़ी भूमिका भी नहीं सौंपी गयी थी.

भारतीय जनता युवा मोर्चा की बिहार इकाई के वे अध्यक्ष और इसी मोर्चे के राष्ट्रीय महामंत्री जरूर रहे हैं. पर युवा मोर्चा संभालना और मुख्यधारा के संगठन को संभालना दो अलग-अलग बात है. ऐसे में नितिन के सामने बड़े और दिग्गज नेताओं से भरी बीजेपी को संभालना बड़ी चुनौती होगी. वैसे बीजेपी कैडर आधारित पार्टी है, लिहाजा यह भी माना जा सकता है कि उन्हें ज्यादा दिक्कत नहीं होनी है. बीजेपी के जानकारों का तर्क है कि नितिन को राष्ट्रीय भूमिका देकर पार्टी ने एक तरह से पीढ़ीगत बदलाव की शुरुआत की है.


हाल के दिनों में बीजेपी में पिछड़ा नेतृत्व पर कुछ ज्यादा ही फोकस किया गया. इससे बीजेपी का पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक दबे स्वर से नाराजगी भी जाहिर करता रहा है. विराट उभार से पहले बीजेपी को ब्राह्मण-बनिया की पार्टी भी कहा जाता था. इसमें कायस्थ और किंचित क्षत्रिय वर्ग भी जुड़ा हुआ था. नितिन नबीन इन्हीं में से एक कायस्थ वर्ग से आते हैं. वैसे बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान पाटलिपुत्र से कायस्थ उम्मीदवार न देने की वजह से बीजेपी का कायस्थ वोटर किंचित नाराज भी दिखा था.

इस संदर्भ को देखते हुए एक वर्ग कह रहा है कि नितिन को केंद्रीय नेतृत्व सौंपकर बीजेपी ने अपने पारंपरिक सवर्ण मतदाता वर्ग को साधने की कोशिश की है. वैसे कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नितिन की ताजपोशी आगामी पश्चिम बंगाल चुनाव को भी ध्यान में रखकर की गयी है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक कायस्थ समाज का दबदबा रहा है. नितिन के जरिये बंगाल के इस वर्ग के वोटरों को भी पार्टी ने बड़ा संदेश दिया है. उन्हें नेतृत्व सौंपे जाने को लेकर कुछ महीने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भाजपा को मिले संकेतों का भी जिक्र किया जा रहा है.

संघ ने बीजेपी को संकेत दिया था कि वह पिछड़े-दलित आदि को शासन और प्रशासन से मिले फायदों का जिक्र भले ही करे, लेकिन संगठन के मामलों में जातीय आधार पर फैसले न ले. वह संगठन की भूमिकाएं तय करते वक्त कार्यकर्ता भाव और उसकी संगठन क्षमता व निष्ठा को भी देखे. नितिन नबीन की नियुक्ति को इस निकष पर भी कसा जा सकता है. नितिन पार्टी के पुराने कार्यकर्ता हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहे हैं. संगठन ने जो भी भूमिका सौंपी, उसे संगठन के लिहाज से पूरा करने की कोशिश की है. छत्तीसगढ़ राज्य में बीजेपी की पिछली जीत ने उनके संगठन कौशल की ओर झांकने का मौका दिया. कह सकते हैं कि नितिन नवीन की नियुक्ति के पीछे ये भी कारण रहे होंगे.


बीजेपी अक्सर दावा करती है कि वह पढ़े-लिखे लोगों को तवज्जो देती है. इस आधार पर नितिन नवीन को लेकर बीजेपी असहज हो सकती है, क्योंकि वे महज बारहवीं पास हैं. बीजेपी अक्सर वंशवाद का विरोध करती है. जब पार्टी के अंदर के वंशवाद पर विपक्षी खेमे से सवाल उठता रहा, तब पार्टी का तर्क होता था कि शीर्ष पर उसके यहां वंशवाद नहीं रहा. नितिन के संदर्भ में वह क्या जवाब देगी, यह देखना महत्वपूर्ण रहेगा. क्योंकि नितिन के पिता नवीन किशोर सिन्हा बिहार बीजेपी के कद्दावर नेता रहे हैं. आखिर में एक और तथ्य की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए. वर्ष 1959 में जब दिग्गज नेताओं के रहते हुए भी कांग्रेस ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को अध्यक्ष बनाया, तब इंदिरा की उम्र महज 42 वर्ष थी. ठीक 66 वर्ष बाद आज की सत्ताधारी बीजेपी ने 45 वर्ष के नितिन नवीन पर भरोसा जताया है. नितिन आगे और कितनी ऊंचाई पर जायेंगे, यह देखने के लिए इंतजार करना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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