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जनता के काम से बेफिक्र नेता-अफसर

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झारखंड की आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए राज्य सरकार ने बिहार की तर्ज पर तय समयसीमा के अंदर कार्यो के निष्पादन के लिए 15 नवंबर, 2011 को एक कानून बनाया. इसके तहत तय किया गया कि आम जनता के कार्यो को सरकारी अफसर-कर्मचारी नियत समय में पूरा करेंगे. यदि नहीं करते हैं, तो उनकी शिकायत की जायेगी. शिकायत सही पाये जाने पर अधिकारियों को आर्थिक दंड दिया जायेगा.
यह राशि उनके वेतन से काटी जायेगी. हर काम के लिए समय सीमा और शिकायत के लिए स्थान निर्धारित किये गये. बावजूद इसके विभागों में आज भी पुराने र्ढे पर ही काम किया जा रहा है.
इस कानून को कमजोर करने और इसे लागू नहीं किये जाने की पूरी कोशिश यहां के अधिकारियों द्वारा की जा रही है. इस बीच एक सवाल यह भी पैदा होता है कि इतने कड़े कानून के बावजूद आज तक राज्य के विभिन्न शहरों के लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए अफसरों के आगे दर-दर भटकना पड़ रहा है. यातायात नियमों का उल्लंघन तो आम हो गया है. देखा यह जा रहा है कि इस कानून को लागू कराने में बात-बात पर धरना-प्रदर्शन और सड़क जाम करने वाले नेता भी चुप्पी साधे हैं. क्या उन्हें इस कानून के प्रावधानों का पता नहीं है? यदि नहीं है, तो फिर इस कानून के जरिये यहां के लोगों को फायदा कैसे पहुंचेगा?
बीती 16 फरवरी को मुख्यमंत्री महोदय ने सरकार और अफसरों के कार्यो में पारदर्शिता लाकर जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने की बात की थी, लेकिन अफसरों, नेताओं के रवैये से तो कम से कम ऐसा होता नहीं दिख रहा है. कारण कि यहां की जनता यदि समस्याओं से पस्त है, तो अफसर मस्त व नेता मदमस्त बने बैठे हैं.
गणोश सीटू, हजारीबाग
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