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सांप्रदायिकता पर आत्मचिंतन जरूरी

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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि भारत में पिछले वर्षों में सांप्रदायिक वैमनस्य इस कदर बढ़ गया है जिसे देखकर देश को स्वतंत्र कराने वाले महात्मा गांधी को भी सदमा लगता. कुछ दिन भारत यात्रा के दौरान भी ओबामा ने बयान दिया था कि सौहार्द और सहिष्णुता भारत के अस्तित्व और विकास के लिए अनिवार्य शर्त है.
अगर हम देश के समकालीन इतिहास पर नजर डालें, तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि सांप्रदायिकता लंबे अरसे से भयावह हिंसा की सबसे बड़ी वजह रही है. यह तर्क दिया जा सकता है कि यह हमारा आंतरिक मामला है और बाहर के लोगों पर इस पर टिप्पणी करने से परहेज करना चाहिए. पर, क्या ओबामा के बयानों के निकलते संकेत हमारी चिंता का कारण नहीं होने चाहिए? पूरी दुनिया में जिस देश की ख्याति और सम्मान का आधार सहिष्णुता की सुदीर्घ परंपरा रही हो, तथा जिसके कारण हम आज भी विश्व गुरु होने का दावा करते हैं, अगर आज दुनिया उसे सांप्रदायिक रुझानों में बंटे देश के रूप में देखने लगे, तो यह हमारे समाज की आत्मछवि के बारे में एक गंभीर दृष्टिकोण है.
छवि का यह प्रतिबिंबन एक समाज के रूप में हमसे ठोस आत्मचिंतन की मांग करता है. महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक शक्ति बनने के लिए भारत को विश्व के सामने अपनी छवि को सकारात्मक बनाना होगा. सामाजिक विभाजन के भयानक परिणामों को देश वर्षों से भुगत रहा है. अगर हम दो-तीन दशकों की घटनाओं पर दृष्टिपात करें, तो पायेंगे कि भारत का शायद ही कोई हिस्सा ऐसा है, जो सांप्रदायिक हिंसा की चपेट से बच सका हो.
ओबामा के बयान ने एक बार फिर इस जरूरत को रेखांकित किया है कि परस्पर दोषारोपण और सतही सरलीकरण की मानसिकता से ऊपर उठकर भारतीय समाज समस्या के समुचित समझ और समाधान की ओर उन्मुख हो. शंका और अविश्वास से विषाक्त समाज प्रगति के उच्चतम लक्ष्यों प्राप्त कर सकने में सफल नहीं हो सकता है. विविधता हमारी शक्ति है और विषमता एक अभिशाप. ऐसे में समाज में परस्पर विश्वास की भावना बननी चाहिए. यह जरूरी है कि हम राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर विनाशकारी सांप्रदायिक प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण के त्वरित उपाय करें.
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