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मंदी की आहट

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अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों में गिरावट के गंभीर संकेत चिंताजनक हैं. घरेलू बचत के लगातार गिरते स्तर, निर्यात घटने, अपेक्षित निवेश न होने और उपभोग व मांग में कमी से इस स्थिति में जल्दी सकारात्मक बदलाव भी नहीं दिखते. यह आशंका इस कारण भी गहरी हो जाती है कि वैश्विक स्तर पर भी मंदी के बादल मंडरा रहे हैं. साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद भारत और अन्य कई अर्थव्यवस्थाओं में लगातार बढ़त का रुझान रहा है, लेकिन इसके बावजूद रोजगार और आमदनी में संतोषजनक प्रगति नहीं हुई.

अगर आर्थिक विकास की गाड़ी पटरी से उतरती है या उसमें ठहराव आता है, तो रोजगार की कमी और आय घटने से उसे फिर रास्ते पर लाना आसान नहीं होगा. हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर और उद्योग जगत से जुड़े कुछ अहम जानकारों ने भरोसा जताया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद के कारण जल्दी ही इसके गिरावट से बाहर निकलने की संभावना है, लेकिन उद्योग जगत के एक बड़े हिस्से का कहना है कि मौजूदा वित्त वर्ष में वृद्धि दर के सात फीसदी होने के सरकार के लक्ष्य को पूरा करना संभव नहीं होगा. हालिया कोशिशों से बैंकों पर फंसे हुए कर्ज का बोझ तो कम हुआ है, पर डवांडोल आर्थिकी को देखते हुए उन्होंने कॉरपोरेट और खुदरा कर्ज देने में संकोच करना शुरू कर दिया है. बजट के बाद वित्तीय बाजार से देशी-विदेशी निवेशकों ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक पूंजी की निकासी भी की है.

इस स्थिति के लिए कुछ हद तक अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती भी जिम्मेदार है, लेकिन असली चुनौती घरेलू मोर्चे पर है. यह समीकरण भी समझने की जरूरत है कि अगर घरेलू बचत कमतर हो रही है और उपभोग भी नहीं बढ़ रहा है, तो लोगों की आमदनी खर्च किस दिशा में हो रही है. मुद्रास्फीति की दर काफी समय से नियंत्रित है और घट रही है. इस कारण खर्च का दोष महंगाई के माथे भी नहीं मढ़ा जा सकता है.

जानकारों की राय है कि लोगों के खर्च का एक हिस्सा ऐसा है, जो उन्हें मजबूरी में या जीवन-शैली की मांग के मुताबिक करना पड़ रहा है. सरकार ने ग्रामीण संकट के समाधान के लिए अनेक पहल की है, परंतु वहां मांग बढ़ती नहीं दिख रही है. उद्योग व वित्तीय जगत को आशा थी कि उपभोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार बजट में कुछ उपाय करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उनकी सलाह है कि सरकार अब इस संबंध में कुछ ठोस उपाय करे.

सुधारों की रफ्तार भी कुछ कम करने की जरूरत है, क्योंकि नीति आयोग का कहना है कि मौजूदा संकट का एक कारण अतिशय सुधार भी है. आर्थिक मंदी के कारण छंटनी बढ़ रही है और भर्ती घट रही है. कमजोर मॉनसून भी परेशानी की एक वजह है. ऐसे में सरकार को जल्दी ही पहलकदमी करना चाहिए, ताकि बद-से-बदतर होने से पहले हालात पर काबू पाया जा सके.

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