[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion नयी सरकार का आर्थिक एजेंडा

नयी सरकार का आर्थिक एजेंडा

0

आरके पटनायक

पूर्व सेंट्रल बैंकर
एनडीए की नयी सरकार मई के अंत में पदभार संभालेगी. सरकार के सामने फौरी काम संघीय बजट तैयार करना तथा उसे संसद में पेश करना है, जिसे चार प्रतिशत की मुद्रास्फीति दर, सात प्रतिशत से थोड़ी ऊपर की वृद्धि दर तथा दो प्रतिशत से जरा ही ऊपर के चालू खाता घाटे की पृष्ठभूमि में संपन्न किया जाना है.
ऊपर से तो यह आर्थिक परिदृश्य संतोषजनक और अर्थव्यवस्था मजबूत जैसी दिखती है. मगर ये संख्या सही भीतरी स्थिति बयान नहीं करतीं. इस पर निम्नलिखित आलोक में विचार करें:
कृषि वृद्धि दर वित्तीय वर्ष 2017 की 6.3 प्रतिशत एवं वित्तीय वर्ष 2018 की 5 प्रतिशत की तुलना में वित्तीय वर्ष 2019 के लिए प्रथम अग्रिम आकलन के मुताबिक 3.8 प्रतिशत तथा द्वितीय अग्रिम आकलन के अनुसार 2.7 प्रतिशत तक गिर चुकी है;
औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के अप्रैल 2019 में जारी आंकड़े के अनुसार औद्योगिक उत्पादन में पिछले 21 महीनों के दौरान पहली बार कमी आयी है, जिसमें पूंजीगत माल के उत्पादन में वर्ष-से-वर्ष के आधार पर 8.7 प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है और तथाकथित जुड़वे बैलेंस शीटों (बैंकों एवं कॉरपोरेटों के बैलेंस शीटों) को लेकर एक लंबे वक्त से चली आ रही चिंताएं अब तक भी नहीं सुलझ सकी हैं.
इसके अलावा, एक विलंबित एवं सामान्य से कम मानसून, कच्चे तेल की कीमतों की नरम स्थिति में उलट की संभावनाएं और राजकोषीय चूक (बजटीय लक्ष्यों से विचलन) की लगभग निश्चितता की जोखिमें भी अपनी जगह कायम हैं. जॉब सृजन की ज्वलंत समस्या, जिस पर चुनावी अभियान के दौरान इतना ज्यादा जोर था एक और मुद्दा है, जो खुद पर खासा गौर करने की मांग करेगा.
हालांकि, उद्योगों एवं सेवाओं की बदौलत तेज वृद्धि दर हासिल की जा सकती है, पर यह कृषि क्षेत्र की वृद्धि ही है, जो निचले स्तर पर आर्थिक विकास को गति देते हुए दीर्घावधि स्थिरता प्रदान करती है. फिर भी, यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर जरूरी जोर दिया जाना अभी बाकी है. इसकी एक वजह तो यह है कि कृषि राज्यों का विषय रही है.
कृषि में सुधारों, खासकर भरोसेमंद शीत शृंखला (कोल्डचेन) से लेकर आधुनिक भंडारगृहों तक के विचारों के अलावा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिशों को अमली जामा पहनाने के लिए उच्चस्तरीय केंद्र-राज्य सहयोग की आवश्यकता होगी. एक सहयोगी राजकोषीय संघवाद के हित में नयी सरकार को चाहिए कि इसे संबोधित करने को एक मंच अथवा संस्थागत संरचना स्थापित करे.
इस संस्थागत ढांचे को नीति आयोग के तत्वावधान में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता और केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों समेत सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सदस्यता के आधार पर कृषि उत्पादकता, कृषि विपणन एवं कृषि निर्यातों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गठित किया जा सकता है. किंतु इस राह पर चल पाने के लिए उच्च स्तर के राजनीतिक कौशल की आवश्यकता होगी.
कृषि में रोजगार वृद्धि के पूरक के रूप में विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र में भी रोजगार सृजन करना होगा, जिसके दो पहलू हैं: पहला, भौतिक एवं सामाजिक अवसंरचना में अधिक निवेश और दूसरा, उच्च उत्पादकता के द्वारा दक्षता में बढ़ोतरी. सरकार के पास निधि की सीमित उपलब्धता को देखते हुए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को संस्थागत स्वरूप दिया गया है.
पर अब तक के अनुभव यह बताते हैं कि इस मॉडल को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है, जिसके लिए संभवतः राज्य सरकारों की अपर्याप्त भागीदारी जिम्मेदार है. फिर, सरकार नीति निर्माण, निधि की व्यवस्था एवं परियोजनाओं के क्रियान्वयन हेतु केंद्र तथा राज्य सरकारों सहित निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी एक संस्थागत स्वरूप देने की सोच सकती है.
उपर्युक्त संदर्भ में दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें सरकार के ध्यान की दरकार है. पहला, सरकार द्वारा कुछ कर छूट के अंतर्गत निजी क्षेत्र के द्वारा अवसंरचना बांड जारी करना तथा दूसरा, क्षेत्रगत सीमाओं को संशोधित करते हुए गुणवत्तापूर्ण कुशल विनियमनों के साथ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रोत्साहित करना.
अर्थव्यवस्था में निवेश अर्थव्यवस्था की ही बचत एवं ब्याज दर पर निर्भर है. अब जबकि सरकार को अपने अपूर्ण कार्य पूरे करने हैं, उसे वित्तीय सुधारों पर गौर करना ही होगा, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शेयर धारिता के ढांचे, सरकार एवं आरबीआइ द्वारा नामित निर्देशकों, डूबे हुए ऋणों तथा वित्तीय क्षेत्र तथा खासकर बैंकिंग क्षेत्र में कौशल विकास से संबद्ध मुद्दे शामिल हैं.
बचत तथा ब्याज दर के संदर्भ में यह अहम है कि बैंकों की ब्याज दर बढ़ा कर एवं बैंक जमा, म्यूचुअल फंड एवं लघु बचत जैसे साधनों पर कर छूट देकर उनके द्वारा वित्तीय बचत को प्रोत्साहित तथा सोने और रियल इस्टेट जैसे भौतिक बचतों को हतोत्साहित किया जाय.
विगत सरकार के निवर्तमान वित्त मंत्री ने कहा है कि देश अगले पांच वर्षों में पांच लाख करोड़ डॉलर एवं उसके अगले आठ वर्षों के दौरान 10 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने को तैयार है. किंतु पिछले कुछ वक्त से वृद्धि की संख्या ठिठकी पड़ी हैं. इस हेतु सरकार को विभिन्न दीर्घावधि तथा अल्पावधि उपाय अपनाने होंगे, जिसके लिए कुशल प्रबंधन की आवश्यकता होगी.
(अनुवाद: विजय नंदन)
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel