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सकारात्मक आर्थिक संकेत

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वैश्विक अर्थव्यवस्था और विभिन्न देशों की घरेलू स्थिति में अनिश्चितता से आर्थिक वृद्धि का प्रभावित होना स्वाभाविक है. चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध और यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के निकलने जैसे कारक अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य-व्यापार के लिए चिंताजनक बने हुए हैं, लेकिन संतोष की बात है कि भारत की वृद्धि दर समूह-20 के देशों में अब भी सर्वाधिक है तथा आगे भी इसमें बढ़त का अनुमान है.

आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन का मानना है कि भारत की वृद्धि दर 2019 के 7.25 प्रतिशत से बढ़ कर 2020 में 7.5 प्रतिशत हो जायेगी. इस संस्था में 36 विकसित देश सदस्य हैं. व्यापार युद्ध के कारण अमेरिका और चीन को नुकसान उठाना पड़ रहा है. इसका एक परिणाम यह है कि दरों के हिसाब से भारत और चीन के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है.
वर्ष 2018 में अक्तूबर-दिसंबर की तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत पर पहुंच गयी थी, जो कि पूर्ववर्ती छह तिमाहियों में सबसे कम थी. विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में उत्पादन और मांग घटने तथा निर्यात और निवेश के कमतर रहने से हाल के महीनों में अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं जतायी जा रही थीं. ऐसे में यह अनुमान बहुत उत्साहवर्धक है.
आम चुनाव में भारी बहुमत के साथ मोदी सरकार के फिर से सत्ता में आने से भी यह भरोसा बना है कि राजनीतिक स्थिरता के कारण आर्थिक और वित्तीय नीतियों में निरंतरता बनी रहेगी तथा आर्थिक सुधार की पहलें चलती रहेंगी. जानकारों की मानें, तो अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध में नरमी आने तथा यूरोपीय स्थिरता की स्थिति में भारत निवेश के लिए दुनिया की बेहतरीन जगह बन जायेगा. इसका एक अर्थ यह है कि निवेश से संबंधित चिंताएं कम होंगी.
इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था की मजबूती के रूप में होगा, क्योंकि परियोजनाओं के लिए अधिक धन उपलब्ध होगा तथा दबाव कम होने से बैंकिंग सेक्टर को भी राहत मिलेगी. सरकार को जुलाई में बजट पेश करना है, इस कारण अंतरिम बजट के वादों, निवेश बढ़ाने, मांग में बढ़ोतरी करने, कराधान को सरल बनाने जैसे अहम मसलों पर नीति, योजना और कार्यक्रम की तैयारी हो चुकी है.
इसे नयी सरकार द्वारा अंतिम रूप दिया जाना है. शेयर बाजार और वित्तीय निवेशकों में इस कारण बहुत उत्साह है. मध्य आय वर्ग के हाथ में बचत को उत्साहित करने तथा लाभुकों के हाथ में नकदी देने से मांग बढ़ने की उम्मीद है. तेल के दाम में कमी या स्थिरता और रुपये की बेहतरी मुद्रास्फीति एवं चालू खाता घाटा के दबाव में कमी आयेगी.
इन पहलुओं के साथ सरकार को विनिवेश करने, वित्तीय संस्थाओं को बचाने, बैंकों के विलय, डूबतीं या दिवालिया परिसंपत्तियों के निबटारे, कोयले की कमी, जीएसटी में सुधार, नगरीकरण और किसानी संकट जैसे मसलों को प्राथमिकता देने की जरूरत है. चीन से व्यापार घाटा कम करने तथा वहां पैदा हो रहे अवसरों का लाभ उठाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. आर्थिकी को ठोस रूप देने का यह एक शानदार मौका है.
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