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Home Opinion रमणिका गुप्ता : एक कल्ट का अवसान

रमणिका गुप्ता : एक कल्ट का अवसान

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संजीव चंदन

संपादक, स्त्रीकाल.कॉम

themarginalised@gmail.com

वह एक अभिनव समुच्चय थीं- सामाजिक समता के प्रति समर्पित योद्धा, आदिवासी अधिकारों की प्रवक्ता, स्त्री-पुरुष समता के प्रति प्रतिबद्ध चिंतक, जमीनी कार्यकर्ता, नेता, साहित्यकार, संपादक. जीजिविषा इतनी कि निजी व सार्वजनिक को सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों से भर देना चाहती थीं. आखिरी क्षण तक रचने की बेचैनी के साथ रमणिका गुप्ता सक्रिय रहीं.

पंजाब में 22 अप्रैल, 1930 को पैदा हुई रमणिका गुप्ता बीते 26 मार्च, 2019 तक की अपनी जीवन-यात्रा में बिहार (खासकर झारखंड) और दिल्ली में सक्रिय रहीं. बिहार-झारखंड में उनकी सक्रियता जमीनी संघर्ष की रही और दिल्ली में साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित. रमणिका जी के जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से धनबाद और हजारीबाग में बीते, जहां वे खुदमुख्तार स्त्री बनीं.

ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् और विधानसभा में उनकी भूमिका के तय होने के शहर रहे ये. उनकी आत्मकथा ‘आपहुदरी’ में इन शहरों में उनकी सक्रियता और उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की तस्वीर उभरती है, जिसे पढ़ते हुए कोयलानगरी की राजनीति को समझनेवाली नयी पीढ़ी को स्त्री की आंख से धनबाद/झारखंड से लेकर राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के मिजाज को समझने में मदद मिलेगी, और यह भी समझने में कि यदि कोई स्त्री इन पगडंडियों पर चलने के निर्णय से उतरी, तो उसे किन संघर्षों से गुजरना पड़ता रहा है.

रमणिका गुप्ता के होने का मतलब समझने के लिए उनकी जीवन-यात्रा को दो कालखंडों और दो व्यक्तित्वों में बांटकर देखा जा सकता है- सातवें से नौवें दशक तक झारखंड/ बिहार में ट्रेड यूनियन, जनांदोलन और बाद में संसदीय राजनीति में सक्रिय व्यक्तित्व तथा 90 के बाद से जीवनपर्यंत दिल्ली में साहित्य-संस्कृति को समर्पित व्यक्तित्व.

अपने पहले कालखंड में वे अपेक्षाकृत अधिक बेचैन व्यक्तित्व हैं, वे सांगठनिक प्रतिबद्धता से अधिक जनता के हित को तरजीह देती रहीं, इसलिए वे समाजवादी, वामपंथी और कांग्रेसी राजनीति में आवाजाही करती रहीं. मजदूरों, आदिवासियों और स्त्रियों के लिए संघर्ष उनकी पहली प्राथमिकता थी.

मजदूरों की अस्मिता और अधिकार के लिए उनका एक संघर्ष बहुत चर्चित रहा, जिसमें उनका नारा था, ‘हम कौन हैं लिखकर दो- हमारा नाम क्या है लिखकर दो- हम क्या काम करते हैं लिखकर दो- हमारा वेतन क्या है लिखकर दो- हम कहां खटते हैं लिखकर दो!’ पूंजीपतियों और सरकारी बाबुओं के रवैये को जाननेवाले इस नारे का महत्व समझते हैं.

महिलाओं के सम्मान और अधिकार के लिए वे किसी भी हद तक जाकर संघर्ष कर सकती थीं.

साल 1983 में 22 जुलाई को सदस्यों की महिला-विरोधी टिप्पणियों पर वे सदन में और बाहर खूब बरसी थीं. उन्होंने हाल के दिनों में बताया था- ‘जेंडर के आधार पर मुझे गालियां कई बार खानी पडीं. एक बार मैं कोई मुद्दा उठाते हुए टेबल पर चढ़ गयी, तो एक नेता चिल्लाये- ‘नाच नचनिया नाच.’ उन्होंने यह भी बताया था कि तब उनकी सीट के पीछे ही बैठनेवाले लालू प्रसाद ऐसी ओछी टिप्पणियों से दूर रहते थे. राजनीतिक जीवन के ऐसे कई वाकये रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे’ और ‘आपहुदरी’ में दर्ज हैं, जिनकी धमक दिल्ली की सत्ता के गलियारों तक पहुंची, इंदिरा गांधी तक भी.

नब्बे के बाद के समय की सक्रियता में उन्होंने अपनी रचनात्मकता को संभाला और उससे अधिक आदिवासी, महिला और दलित लेखन एवं अभिव्यक्ति को.

‘युद्धरत आम आदमी’ नामक पत्रिका में उन्होंने विभिन भाषाओं के आदिवासी, महिला और दलित रचनाकारों को जगह दी. कई प्रतिभाओं को तराशा, निखारा, सामने लायीं. उनकी खुद की दो दर्जन किताबों के प्रकाशन का कालखंड है यह, जिसमें कई कविता संग्रह, उपन्यास, कहानी संग्रह, बहु चर्चित आत्मकथा और यात्रा वृत्तांत आदि शामिल हैं. आखिरी दिनों में भी सक्रिय रहते हुए उन्होंने ‘हाशिये उलांघती औरत’ शीर्षक से पांच खंडों में विभिन्न भाषाओं की महिला रचनाधर्मिता को सामने लाया.

जीवन और कर्म में बेबाक रमणिका गुप्ता ने हिंदी समाज और भाषा की वर्चस्ववादी जड़ता के विरुद्ध संघर्ष किया.

नौवें दशक के बाद हिंदी साहित्य में राजेंद्र यादव और रमणिका गुप्ता दो कल्ट-व्यक्तित्व सामने आये, जिन्होंने हाशिये की अभिव्यक्ति से खुद को जोड़ा और उनके लिए प्लेटफाॅर्म तैयार किया. लगभग 90 सालों तक की रमणिका गुप्ता की जीवन-यात्रा ऐसे खुदमुख्तार स्त्री की यात्रा है, जिसने अपने लिए और एक स्त्री के लिए समाज में तय सारी हदों को पार किया.

समृद्ध पंजाबी खत्री परिवार में पैदा हुईं रमणिका जी के परिवार में भाई-भाभी कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे, शायद यह पहली प्रेरणा रही हो. निरंतर बेचैन मन और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व ने उन्हें वैचारिक संगठनों में स्थिर नहीं रहने दिया. कई बार निर्णयों की विसंगतियां भी सामने आयीं, लेकिन स्वनिर्मित सीमाओं के भीतर उनमें एक निरंतरता हमेशा रही- ‘हाशिये के लोगों’ के प्रति प्रतिबद्धता!

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