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Home World अब रुकेगा ईरान युद्ध! ट्रंप को अपनों से मिला झटका, US प्रतिनिधि सभा में पास हुआ सैन्य शक्तियां सीमित करने वाला प्रस्ताव

अब रुकेगा ईरान युद्ध! ट्रंप को अपनों से मिला झटका, US प्रतिनिधि सभा में पास हुआ सैन्य शक्तियां सीमित करने वाला प्रस्ताव

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अब रुकेगा ईरान युद्ध! ट्रंप को अपनों से मिला झटका, US प्रतिनिधि सभा में पास हुआ सैन्य शक्तियां सीमित करने वाला प्रस्ताव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. फोटो- एक्स (@WhiteHouse).

US House Limits Trump War Powers: ईरान के साथ जारी तनाव और सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी राजनीति में टकराव खुलकर सामने आ गया है. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया है, जिसका मकसद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कांग्रेस की मंजूरी के बिना ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रखने से रोकना है. खास बात है कि इस रिजोल्यूशन को पास कराने में ट्रंप की अपनी पार्टी (रिपब्लिकन) के लोगों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया.  

डेमोक्रेट्स के प्रस्ताव को मिला कुछ रिपब्लिकनों का साथ

बुधवार को प्रतिनिधि सभा में मतदान हुआ, जिसमें प्रस्ताव 215-208 मतों से पारित हो गया. इस दौरान रिपब्लिकन पार्टी के सांसद थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने अपनी पार्टी के रुख से अलग जाकर प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया. हाल के महीनों में डेमोक्रेट सांसदों की ओर से ट्रंप की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करने में कुछ रिपब्लिकन नेताओं का भी समर्थन मिलने लगा है.

संघर्ष की शुरुआत के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद

ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ 28 फरवरी से शुरू हुआ था. व्हाइट हाउस ने इस कार्रवाई के लिए कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी नहीं ली थी. अमेरिका में किसी युद्ध में जाने से पहले कांग्रेस की मंजूरी लेनी पड़ती है. हालांकि, ट्रंप ने बिना परमिशन ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था. इसी मुद्दे को लेकर डेमोक्रेट सांसद लगातार राष्ट्रपति की युद्ध संबंधी शक्तियों पर नियंत्रण की मांग कर रहे थे.

स्थिति तब और चर्चा में आई जब अप्रैल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्षविराम की घोषणा की. बाद में अमेरिकी युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि उनकी समझ के मुताबिक सीजफायर (8 अप्रैल) के बाद युद्ध से जुड़े 60 दिन की समय-सीमा फिर से शुरू हो गई थी.

क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन?

प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित यह प्रस्ताव ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ के रूप में जाना जाता है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना अमेरिका किसी सैन्य संघर्ष में लंबे समय तक शामिल न रहे. यह एक समवर्ती प्रस्ताव (कंकरेन्ट रिजॉल्यूशन) है, जिसे कांग्रेस के दोनों सदनों की मंजूरी की आवश्यकता होती है.

यानी इसे अब सीनेट के पास भेजा जाएगा. हालांकि इसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए नहीं भेजा जाता और सामान्य परिस्थितियों में इसे कानून का दर्जा भी नहीं मिलता. फॉक्स न्यूज पर कमेंटेटर जेस वाटर्स ने कहा कि अगर यह प्रस्ताव सीनेट से भी पास हो जाता है, तो ट्रंप के पास इसे वीटो करने का अधिकार है. लेकिन बाद में लोगों सोशल मीडिया पर इस दावे को खारिज कर दिया.

यह H.Con. Res. 86 प्रस्ताव कंकरेंट लिस्ट का है, इसलिए इस पर राष्ट्रपति के सिग्नेचर की आवश्यकता नहीं होती और वह इसे वीटो भी नहीं कर सकते. हां, यह जरूर है कि इस प्रस्ताव में कानून का बल नहीं होता. हालांकि, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में प्रस्ताव के पास होने से ट्रंप के ऊपर राजनीतिक रूप से दबाव जरूर बढ़ेगा. 

ग्रेगरी मीक्स ने बताया संविधान की रक्षा का कदम

यह प्रस्ताव न्यूयॉर्क से डेमोक्रेट सांसद और हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के वरिष्ठ सदस्य ग्रेगरी मीक्स ने पेश किया था. मतदान के बाद उन्होंने कहा कि उन्हें खुशी है कि कुछ रिपब्लिकन सांसद भी इस मुद्दे पर उनके साथ खड़े हुए. उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि सभी डेमोक्रेट सांसदों ने एकजुट होकर प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया. मीक्स ने कहा कि कांग्रेस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाती रहेगी और जब प्रशासन संविधान के अनुरूप काम नहीं करेगा तो विधायिका नियंत्रण और संतुलन की भूमिका निभाएगी.

पहले टल गया था मतदान

इस प्रस्ताव पर मतदान 21 मई को होना था, लेकिन उस समय रिपब्लिकन नेताओं ने अचानक प्रक्रिया रोक दी थी. बताया गया था कि सदन में कई सांसदों की अनुपस्थिति के कारण प्रस्ताव के पारित होने की आशंका बढ़ गई थी. ग्रेगरी मीक्स ने पहले आरोप लगाया था कि प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन जानबूझकर मतदान को टाल रहे हैं. 

उन्होंने यह भी कहा था कि महंगाई, ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों को लेकर रिपब्लिकन सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों में दबाव महसूस कर रहे हैं. हालांकि, अब रिपब्लिकन सांसदों की वोटिंग से लग रहा है कि अमेरिकी ईरान युद्ध से थक रहे हैं.

ट्रंप की नीतियों पर रिपब्लिकनों में भी असहमति

ईरान नीति को लेकर केवल डेमोक्रेट्स ही नहीं, बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद दिखाई दिए हैं. हाल ही में सीनेट में रिपब्लिकन सांसदों ने राष्ट्रपति समर्थित 1.8 अरब डॉलर के एक विवादित ‘एंटी-वेपनाइजेशन’ फंड का विरोध किया था. कुछ सांसदों को आशंका थी कि इस राशि का इस्तेमाल 6 जनवरी 2021 को अमेरिकी संसद भवन पर हुए हमले से जुड़े समर्थकों को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा सकता है.

इसके अलावा बुधवार को इमिग्रेशन पैकेज पर बातचीत के दौरान सीनेट रिपब्लिकनों ने ट्रंप के बॉलरूम की सुरक्षा व्यवस्था के लिए प्रस्तावित फंडिंग भी हटा दी. सीनेट की संसदीय सलाहकार इकाई ने माना था कि यह प्रावधान खर्च संबंधी नियमों के अनुरूप नहीं है.

माइक जॉनसन ने जताई चिंता

मतदान से पहले स्पीकर माइक जॉनसन ने राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगाने के प्रयासों का विरोध किया. उनका कहना था कि इस तरह के प्रतिबंध अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति और बातचीत की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं.

जॉनसन ने दावा किया कि ईरान में सैन्य अभियान के लक्ष्य स्पष्ट थे और उन्हें हासिल कर लिया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति अब शांति समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं, इसलिए उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता दी जानी चाहिए. उनके मुताबिक मौजूदा समय में वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन लाना देश के हित में नहीं है और इससे अमेरिका की स्थिति कमजोर हो सकती है.

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सैन्य अभियान की अलग से जांच भी शुरू

इसी बीच पेंटागन, विदेश विभाग और यूएसएआईडी के महानिरीक्षकों ने सैन्य अभियान की संयुक्त वैधानिक जांच शुरू कर दी है. बुधवार को जारी बयान में निगरानी एजेंसियों ने कहा कि कानून के तहत उन्हें किसी भी ऐसे विदेशी सैन्य अभियान की समीक्षा करनी होती है, जो 60 दिनों से अधिक समय तक चले.

यानी निगरानी संस्थाएं मान रही हैं कि 28 फरवरी को शुरू हुआ संघर्ष अब कानूनी रूप से 60 दिन की सीमा पार कर चुका है. अमेरिकी वॉर पावर्स एक्ट के तहत कांग्रेस की मंजूरी के बिना कोई भी राष्ट्रपति 60 दिनों से अधिक समय तक सक्रिय सैन्य कार्रवाई जारी नहीं रख सकता. यही वजह है कि ईरान को लेकर व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव अब और तेज होता दिखाई दे रहा है.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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