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Home World US आर्मी के ‘पैसिफिक कमांड’ से हटा ‘इंडो’ शब्द, ट्रंप प्रशासन ने किया बदलाव, भारत पर क्या असर?

US आर्मी के ‘पैसिफिक कमांड’ से हटा ‘इंडो’ शब्द, ट्रंप प्रशासन ने किया बदलाव, भारत पर क्या असर?

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US आर्मी के ‘पैसिफिक कमांड’ से हटा ‘इंडो’ शब्द, ट्रंप प्रशासन ने किया बदलाव, भारत पर क्या असर?
डोनाल्ड ट्रंप और पैसिफिक कमांड का नया लोगो. फोटो- एक्स.

US Indo Pacific Command: अमेरिका ने अपने सबसे महत्वपूर्ण सैन्य कमांडों में से एक के नाम को लेकर बड़ा फैसला लिया है. अमेरिकी युद्ध विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ वॉर) ने घोषणा की है कि अब अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड (USINDOPACOM) को फिर से उसके पुराने नाम अमेरिकी पैसिफिक कमांड (USPACOM) के रूप में जाना जाएगा. यह वही नाम है जिसके तहत यह सैन्य कमांड सात दशकों से भी अधिक समय तक काम करता रहा था.

फिर पुरानी पहचान की वापसी

साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड कर दिया था. उस समय वॉशिंगटन का तर्क था कि हिंद महासागर क्षेत्र का रणनीतिक महत्व तेजी से बढ़ रहा है और उसकी सुरक्षा चुनौतियां प्रशांत क्षेत्र से गहराई से जुड़ती जा रही हैं.

अब अमेरिकी युद्ध विभाग ने इस बदलाव को वापस लेते हुए कहा है कि कमांड के मूल नाम को बहाल करने का उद्देश्य उसकी ऐतिहासिक पहचान और संस्थागत विरासत का सम्मान करना है. विभाग के अनुसार, ‘USPACOM नाम की बहाली कमांड की गहरी ऐतिहासिक जड़ों का सम्मान करती है और प्रशांत क्षेत्र में सेवा देने वाले सभी सैन्यकर्मियों के बीच गर्व तथा सामूहिक भावना को मजबूत करती है.’

नाम बदला, लेकिन क्षेत्र और जिम्मेदारियां वही रहेंगी

अमेरिकी युद्ध विभाग ने साफ किया है कि नाम बदलने से कमान की जिम्मेदारियों, रणनीतिक मिशन या भौगोलिक दायरे में कोई बदलाव नहीं होगा.

विभाग के अनुसार, USPACOM का संचालन क्षेत्र पहले की तरह अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला रहेगा. इसमें प्रशांत महासागर, हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा, पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्र शामिल हैं.

कमान आगे भी रक्षा तैयारियों, सैन्य अभ्यासों, साझेदार देशों के साथ सहयोग, समुद्री सुरक्षा अभियानों, आपदा राहत और संभावित संकटों की योजना बनाने जैसे कार्य करती रहेगी.

विभाग ने यह भी कहा कि क्षेत्रीय सहयोगियों और साझेदार देशों के साथ मिलकर ‘स्वतंत्र और खुला थिएटर बनाए रखने’ की उसकी प्रतिबद्धता पहले की तरह जारी रहेगी.

क्यों अहम है यह सैन्य कमांड?

अमेरिकी पैसिफिक कमांड की स्थापना 1 जनवरी 1947 को राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन के कार्यकाल में हुई थी. यह अमेरिकी सेना की सबसे पुरानी और सबसे बड़े संयुक्त लड़ाकू कमांडों में से एक माना जाता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद एशिया में सुरक्षा ढांचे को आकार देने में इस कमांड की महत्वपूर्ण भूमिका रही. कोरियाई युद्ध और वियतनाम युद्ध जैसे बड़े सैन्य अभियानों के दौरान भी इसने संयुक्त सैन्य संचालन का नेतृत्व और समन्वय किया. इसके अलावा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों में भी इसकी सक्रिय भूमिका रही है.

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हवाई से संचालित होता है विशाल रणनीतिक क्षेत्र

नाम बदलने से पहले तक USINDOPACOM अमेरिका का प्रमुख सैन्य कमांड पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सैन्य अभियानों, रणनीतिक योजना, रक्षा साझेदारियों और क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों की जिम्मेदारी संभाल रहा था.

हवाई स्थित मुख्यालय से संचालित यह कमांड प्रशांत महासागर, हिंद महासागर के बड़े हिस्से, पूर्वी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण एशिया के कुछ क्षेत्रों तक फैले विशाल भूभाग की निगरानी करता है.

इसके कार्यक्षेत्र में प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना, रक्षा तैयारियों को मजबूत करना, साझेदार देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री सुरक्षा अभियान, आपदा राहत कार्य और आपातकालीन रणनीतिक योजना शामिल हैं.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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