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Home World ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए अमेरिका पहले भी तीन बार लगा चुका है दांव, अब ट्रंप की नजर बर्फीले टापू पर!

ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए अमेरिका पहले भी तीन बार लगा चुका है दांव, अब ट्रंप की नजर बर्फीले टापू पर!

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ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए अमेरिका पहले भी तीन बार लगा चुका है दांव, अब ट्रंप की नजर बर्फीले टापू पर!
अमेरिका ने ग्रीनलैंड को खरीदने की तीन बार कोशिश की.

US Tried Buying Greenland: डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर बयान कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार दुनिया इसे हल्के में नहीं ले रही. वजह है हाल ही में वेनेजुएला में हुआ अमेरिकी सैन्य एक्शन. जब अमेरिकी सेना ने राजधानी कराकस में कार्रवाई कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनके घर से हिरासत में लिया, तो यह साफ हो गया कि ट्रंप सिर्फ बोलते नहीं, कर भी दिखाते हैं. इसी के बाद ट्रंप का ग्रीनलैंड को लेकर पुराना बयान फिर चर्चा में आ गया और अब यूरोप में बेचैनी बढ़ गई है.

US Tried Buying Greenland in Hindi: ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप क्यों फिर चर्चा में हैं?

वेनेजुएला की कार्रवाई के एक दिन बाद ट्रंप ने फिर कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड चाहिए और यह जरूरत “राष्ट्रीय सुरक्षा” से जुड़ी है. एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने दावा किया कि ग्रीनलैंड के आसपास रूसी और चीनी जहाज घूम रहे हैं और डेनमार्क उसकी सुरक्षा ठीक से नहीं कर पा रहा. इसके बाद व्हाइट हाउस ने भी कहा कि ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है और सैन्य विकल्प से भी पूरी तरह इनकार नहीं किया गया. सीएनएन के मुताबिक, विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बाद में यह भी कहा कि सरकार ग्रीनलैंड को खरीदने के विकल्प पर सोच रही है.

डेनमार्क और नाटो क्यों भड़क गए?

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने साफ कहा कि ग्रीनलैंड पहले ही कई बार बता चुका है कि वह अमेरिका का हिस्सा नहीं बनना चाहता. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने किसी नाटो देश के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल किया, तो इससे नाटो गठबंधन को भारी नुकसान हो सकता है. फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और इटली जैसे देशों ने संयुक्त बयान जारी कर डेनमार्क और ग्रीनलैंड का समर्थन किया. इन देशों ने कहा कि आर्कटिक इलाके की सुरक्षा नाटो देश मिलकर करेंगे, किसी एक देश की जबरदस्ती नहीं चलेगी.

ग्रीनलैंड आखिर है क्या और कैसा इलाका है?

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है, लेकिन यहां की आबादी सबसे कम है. यह करीब 8.36 लाख वर्ग मील में फैला है, लेकिन यहां सिर्फ लगभग 56 हजार लोग रहते हैं. इसकी 81 प्रतिशत जमीन सालभर बर्फ से ढकी रहती है. ग्रीनलैंड पहले डेनमार्क की कॉलोनी था और अब वह उसका स्वायत्त क्षेत्र है. यहां के करीब 90 प्रतिशत लोग इनुइट समुदाय से आते हैं. मछली पकड़ना यहां की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है. सीएनएन से बात करते हुए ग्रीनलैंड के फिल्ममेकर इनुक सिलिस होएघ ने कहा कि यहां कोई भी जमीन का निजी मालिक नहीं हो सकता. इसलिए ग्रीनलैंड को खरीदने या बेचने की बात यहां के लोगों को अपमानजनक लगती है.

ट्रंप को ग्रीनलैंड इतना जरूरी क्यों लगता है?

ग्रीनलैंड तीन वजहों से बहुत अहम है क्योंकि उसकी जगह, उसके संसाधन और आने वाले समय के समुद्री रास्ते. ग्रीनलैंड अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है और GIUK गैप नाम के अहम समुद्री रास्ते पर पड़ता है. यह रास्ता व्यापार और सैन्य नजरिए से बहुत अहम माना जाता है. ग्रीनलैंड में तेल, गैस और रेयर अर्थ मिनरल्स मौजूद हैं. ये वही खनिज हैं जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों, पवन ऊर्जा और आधुनिक हथियारों में होता है. अभी इन खनिजों पर चीन का दबदबा है, जिससे अमेरिका परेशान है. हालांकि ट्रंप कहते हैं कि ग्रीनलैंड खनिजों के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए चाहिए. लेकिन सीएनएन के अनुसार, उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइक वाल्ट्ज ने जनवरी 2024 में फॉक्स न्यूज से कहा था कि असली चिंता खनिज और प्राकृतिक संसाधन हैं.

ग्रीनलैंड में पहले से अमेरिका की मौजूदगी

अमेरिका का ग्रीनलैंड से रिश्ता नया नहीं है. शीत युद्ध के समय यह इलाका रूस की मिसाइल गतिविधियों पर नजर रखने के लिए बहुत अहम था. 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच रक्षा समझौता हुआ, जिसके तहत अमेरिकी सेना को यहां तैनाती की अनुमति मिली. आज भी यहां पिटुफिक स्पेस बेस मौजूद है, जो अमेरिकी रक्षा विभाग का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है.

ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड खरीदने की बात कर चुके हैं

अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने की बात उठाई थी. तब ग्रीनलैंड ने साफ कहा था कि वह बिक्री के लिए नहीं है. इसके बावजूद दिसंबर 2024 में ट्रंप ने फिर कहा कि वैश्विक सुरक्षा के लिए अमेरिका को ग्रीनलैंड पर नियंत्रण चाहिए. मार्च 2025 में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ग्रीनलैंड पहुंचे और डेनमार्क की भूमिका पर सवाल उठाए. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला वहां के लोगों को ही करना चाहिए. सर्वे बताते हैं कि ग्रीनलैंड के लोग अमेरिका में शामिल होने के खिलाफ हैं.

ग्रीनलैंड के लोग क्या चाहते हैं?

ग्रीनलैंड का इतिहास डेनमार्क के साथ जुड़ा रहा है. 1953 में यह डेनमार्क का हिस्सा बना, 1979 में इसे होम रूल मिला और 2009 में सेल्फ गवर्नमेंट. हालांकि कुछ लोग पूरी आजादी चाहते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग डेनमार्क की जगह अमेरिका को अपना शासक नहीं बनाना चाहते. ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने अमेरिकी बयानों को “पूरी तरह गलत” बताया. उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड को वेनेजुएला से जोड़कर सैन्य कार्रवाई की बात करना गलत और अपमानजनक है. उनका साफ कहना था कि अब किसी तरह के विलय के सपने बंद होने चाहिए.

US Tried Buying Greenland in Hindi: तीन बार ग्रीनलैंड लेने की कोशिश कर चुका है

1867-1868: अलास्का के बाद ग्रीनलैंड पर नजर

रूस से अलास्का खरीदने के बाद अमेरिका की नजर ग्रीनलैंड पर भी गई. उस समय विदेश मंत्री विलियम सीवर्ड के नेतृत्व में अधिकारियों ने इस पर चर्चा की. अमेरिका आर्कटिक इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहता था. सीवर्ड ने कहा था कि ग्रीनलैंड में कोयले जैसे अहम प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं. हालांकि अमेरिकी कांग्रेस ने इसमें रुचि नहीं दिखाई, इसलिए कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं रखा गया.

1910: जमीन की अदला-बदली का प्रस्ताव

राष्ट्रपति विलियम हॉवर्ड टाफ्ट के कार्यकाल में अमेरिका ने एक योजना रखी, जिसमें ग्रीनलैंड को अमेरिका को देने के बदले दूसरी जगहों पर जमीन देने की बात थी. डेनमार्क ने इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया और योजना यहीं खत्म हो गई.

1946: कोल्ड वॉर के दौर में खरीदने की पेशकश 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जब कोल्ड वॉर की शुरुआत हो रही थी, राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की सरकार ने ग्रीनलैंड को खरीदने के लिए डेनमार्क को 100 मिलियन डॉलर सोने में देने की पेशकश की. अमेरिका ने इसकी वजह ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत बताई. युद्ध के दौरान यहां बना अमेरिकी एयरफील्ड यूरोप जाने वाले सैन्य विमानों के लिए अहम ठिकाना था. डेनमार्क ने यह प्रस्ताव भी ठुकरा दिया, लेकिन अमेरिका को वहां सैन्य मौजूदगी बनाए रखने की अनुमति मिल गई. आज भी वहां पिटुफिक स्पेस बेस है, जो अमेरिकी रक्षा विभाग का सबसे उत्तरी ठिकाना माना जाता है.

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