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Home World 20 साल के जेन जी ने यूरोप में बनाया अपना देश, बना राष्ट्रपति, पुलिस आई तो भागा लंदन

20 साल के जेन जी ने यूरोप में बनाया अपना देश, बना राष्ट्रपति, पुलिस आई तो भागा लंदन

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20 साल के जेन जी ने यूरोप में बनाया अपना देश, बना राष्ट्रपति, पुलिस आई तो भागा लंदन

Republic of Verdis Daniel Jackson: आज की दुनिया में एक-एक इंच जमीन पर किसी देश का अधिकार है. जमीन को लेकर विवाद भी हैं. भारतीय होने के नाते आप ऐसा समझ ही सकते हैं. चीन और पाकिस्तान के साथ हमारा सीमा विवाद आप भूल नहीं सकते! ऐसे में अगर कोई कहे कि उसने नया देश बना लिया है, तो यह बात सुनकर ज्यादातर लोग मुस्कुरा देंगे. लेकिन 20 साल के युवक डैनियल जैक्सन का दावा है कि उन्होंने यही काम कर दिखाया है. ब्रिटिश और ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता रखने वाले जैक्सन खुद को ‘फ्री रिपब्लिक ऑफ वर्डिस’ का राष्ट्रपति बताते हैं. दिलचस्प बात यह है कि उनका देश कागजों, वेबसाइट और सोशल मीडिया पर तो मौजूद है, लेकिन जमीन पर उसकी कहानी थोड़ी उलझी हुई है.

नदी किनारे का छोटा सा टुकड़ा, जिसे बताया ‘किसी का नहीं’

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, जैक्सन जिस इलाके को अपना देश बताते हैं, वह यूरोप में बहने वाली डैन्यूब नदी के किनारे स्थित एक छोटा सा इलाका है. यह भू-भाग सर्बिया और क्रोएशिया के बीच पड़ता है. यहां जंगल, झाड़ियां और रेत का एक छोटा सा हिस्सा है. जैक्सन का तर्क है कि यह जमीन ‘टेरा नलियस’ है, यानी ऐसी जगह जिस पर किसी देश का अधिकार नहीं है. टेरा नलियस शब्द का अर्थ है किसी की भूमि नहीं या बिना मालिक वाली जमीन. 

खैर, सर्बिया और क्रोएशिया के बीच सीमा को लेकर वर्षों से विवाद है. दोनों देश सीमा तय करने के अलग-अलग तरीके बताते हैं. क्रोएशिया कहता है कि यह जमीन सर्बिया की है, जबकि सर्बिया अपनी सीमा डेन्यूब नदी की मध्य रेखा मानता है. इसी वजह से कुछ छोटे भूभाग ऐसे बन गए हैं जिन पर दोनों देशों का दावा स्पष्ट नहीं है. 

दोनों देशों के बीच पहला गोरन्या सिगा है, जहां 2015 में चेक राजनेता विट जेड्लिक्का ने एक लिबर्टेरियन माइक्रोनेशन लिबरलैंड की घोषणा की थी. दूसरा क्षेत्र पॉकेट 3 है, जो रेत और जंगल वाला इलाका है और इस पर जैक्सन वर्डिस ने देश बनाने की घोषणा की है.

स्कूल प्रोजेक्ट से शुरू हुआ ‘देश बनाने’ का आइडिया

वर्डिस ने हाल ही में इजरायल के i24 न्यूज से बात की. इस दौरान उनकी कहानी सामने आई. उनकी कहानी किसी राजनीतिक आंदोलन से नहीं, बल्कि एक स्कूल के प्रयोग से शुरू हुई. जैक्सन जब 14 साल के थे, तब वह मेलबर्न में पढ़ाई कर रहे थे. दोस्तों के साथ इंटरनेट पर नक्शे देखते हुए उन्हें दुनिया के अजीब भौगोलिक इलाकों को ढूंढने का शौक लग गया. 

उसी दौरान उन्हें डेन्यूब नदी के पास यह छोटा सा इलाका मिला. मजाक-मजाक में उन्होंने सोचा, ‘क्यों न इसे अपना देश बना लिया जाए?’ धीरे-धीरे यह मजाक एक गंभीर प्रोजेक्ट में बदल गया. ऑनलाइन दोस्त जुड़े, चर्चा हुई और आखिरकार एक माइक्रोनेशन की घोषणा कर दी गई.

नाम, झंडा और संविधान- सब कुछ तैयार

2019 में जैक्सन और उनके समर्थकों ने आधिकारिक रूप से ‘फ्री रिपब्लिक ऑफ वर्डिस’ की घोषणा कर दी. उसी समय उनके समर्थकों ने उन्हें राष्ट्रपति चुन लिया. इस नए देश का नाम लैटिन शब्द Viridis से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है ‘हरा’ यानी प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ा.

इसके बाद देश के प्रतीक भी बनाए गए. झंडा डिजाइन हुआ, जिसमें हल्का नीला और सफेद रंग रखा गया. एक कोट ऑफ आर्म्स भी तैयार किया गया, जिसमें नदी की लहरें, ओक का पेड़ और सफेद सारस जैसे प्रतीक शामिल हैं.

यहां तक कि वर्डिस ने अपना संविधान भी तैयार कर लिया. विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य पदों के साथ एक छोटी-सी ‘सरकार’ भी बनाई गई. फर्क सिर्फ इतना है कि इन मंत्रियों के पास फिलहाल संसद नहीं, बल्कि लैपटॉप और इंटरनेट कनेक्शन है.

पासपोर्ट भी बने, नागरिक भी- लेकिन देश अभी ऑनलाइन

वर्डिस की ज्यादातर गतिविधियां इंटरनेट के जरिए चलती हैं. जैक्सन के मुताबिक इस माइक्रोनेशन को दुनिया भर से हजारों लोग समर्थन दे चुके हैं. करीब 3500 लोगों ने नागरिक बनने के लिए आवेदन भी किया है.

वर्डिस ने एक ई-रेजिडेंसी कार्यक्रम शुरू किया है. इसके जरिए लोग डिजिटल नागरिक बन सकते हैं. कुछ लोगों को पासपोर्ट और पहचान पत्र भी जारी किए गए हैं, हालांकि दुनिया का कोई भी देश इन्हें आधिकारिक दस्तावेज नहीं मानता. यानी तकनीकी रूप से लोग वर्डिस के नागरिक तो बन सकते हैं, लेकिन वहां घूमने के लिए अभी भी असली दुनिया का वीजा ही काम आएगा.

जब ‘राष्ट्रपति’ अपने ही देश में घुस नहीं पाए

2023 तक जैक्सन और उनका यह देश ऑनलाइन ही था. लेकिन इसी साल जैक्सन और उनके समर्थकों ने तय किया कि अब ऑनलाइन देश को जमीन पर भी बसाया जाए. वे नाव के जरिए उस इलाके में पहुंचे और वहां अपना झंडा लगा दिया.

लेकिन यह प्रयोग ज्यादा देर नहीं चला. अगले ही दिन क्रोएशियाई पुलिस वहां पहुंच गई. शिविर हटाया गया और समूह को हिरासत में ले लिया गया. कुछ घंटों बाद उन्हें इलाके से बाहर भेज दिया गया.

ज्यादातर लोगों पर कुछ महीनों का प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन जैक्सन और उनके सहयोगी पर स्थायी प्रतिबंध लगा दिया गया. यानी स्थिति यह है कि वर्डिस के ‘राष्ट्रपति’ अपने ही देश की जमीन पर कदम नहीं रख सकते.

उन्होंने सीएनएन को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अब वहां पहुंचना मुश्किल है. क्रोएशिया ने तट के आसपास कैमरे लगा दिए हैं और पुलिस की नावें वहां आने वाली किसी भी नाव को जल्दी रोक लेती हैं. उन्होंने कहा कि उनकी नावें वहां थीं, लेकिन अब पुलिस ने उन्हें गायब कर दिया है. 

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सपना अभी खत्म नहीं हुआ

आज जैक्सन युनाइटेड किंगडम के डोवर में रहते हैं. वह वहीं से अपने माइक्रोनेशन देश को चला रहे हैं. वह खुद को ‘निर्वासन में राष्ट्रपति’ कहते हैं. फंडिंग दान, मर्चेंडाइज और डिजिटल परियोजनाओं से आती है. कुछ समर्थकों ने क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भी पैसा जुटाया है. जैक्सन का कहना है कि यह सिर्फ शुरुआत है. 

वह लंदन में क्रोएशियाई दूतावास के सामने प्रदर्शन भी करते रहते हैं. जैक्सन का कहना है कि वह हमेशा राष्ट्रपति नहीं रहना चाहते. उनकी योजना है कि जब देश स्थापित हो जाएगा तो वह पद छोड़ देंगे और वर्डिस के सामान्य नागरिक बन जाएंगे. उनका विश्वास है कि एक दिन वर्डिस सच में जमीन पर मौजूद होगा. वह कहते हैं, ‘हम हार मानने वाले नहीं हैं. यह बस समय की बात है.’

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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