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Home World अलास्का में डरावना बदलाव! नदी अचानक नारंगी हुई, जमीन से निकलने लगे जहरीले मेटल, वैज्ञानिक अलर्ट

अलास्का में डरावना बदलाव! नदी अचानक नारंगी हुई, जमीन से निकलने लगे जहरीले मेटल, वैज्ञानिक अलर्ट

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अलास्का में डरावना बदलाव! नदी अचानक नारंगी हुई, जमीन से निकलने लगे जहरीले मेटल, वैज्ञानिक अलर्ट
Melting Permafrost Alaska River Turns Orange / Ai Image

Melting Permafrost Alaska River: उत्तरी अलास्का की एक नदी इन दिनों चर्चा में है. वजह कोई आम नहीं, बल्कि बेहद अजीब है. इस नदी का रंग अचानक बदल गया. जो पानी कभी साफ-सुथरा दिखता था, वो अब नारंगी और लाल रंग में बह रहा है. शुरुआत में लगा कि शायद ये कोई अस्थायी बदलाव होगा, लेकिन जब वैज्ञानिकों ने जांच की, तो सामने आया कि मामला जमीन के नीचे से जुड़ा है. यानी ये बदलाव ऊपर-ऊपर का नहीं, बल्कि भीतर चल रही बड़ी हलचल का नतीजा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, नदी में घुले धातुओं यानी मेटल्स की मात्रा बढ़ रही है. यही प्रक्रिया अब धीरे-धीरे पूरे आर्कटिक इलाके में देखी जा रही है. बढ़ता तापमान और पिघलती जमी जमीन इसके पीछे की बड़ी वजह मानी जा रही है.

Melting Permafrost Alaska River in Hindi: परमाफ्रॉस्ट पिघला तो खुल गया जमीन का तिजोरी

आर्कटिक की जमीन सालों से जमी हुई रहती है, जिसे परमाफ्रॉस्ट कहा जाता है. ये परमाफ्रॉस्ट लोहे, जिंक, तांबे और निकल जैसे मेटल्स को मिट्टी के भीतर बंद करके रखता है. इसे वैज्ञानिक एक तरह की प्राकृतिक सील मानते हैं. लेकिन उत्तरी अलास्का में लंबे समय से बढ़ रही गर्मी ने इस सील को तोड़ दिया. जैसे ही जमी जमीन पिघली, खनिजों से भरी मिट्टी हवा, पानी और सूक्ष्म जीवों के संपर्क में आ गई. वैज्ञानिकों के अनुसार, जब ये खनिज ऑक्सीजन और पानी से मिलते हैं, तो उनमें रासायनिक बदलाव शुरू हो जाता है. खासतौर पर लोहे वाले खनिज पानी में घुल जाते हैं और यही नदी को नारंगी रंग दे देते हैं.

Melting Permafrost Alaska River Turns Orange in Hindi: नदी का रंग ही नहीं

नदी में मेटल्स के घुलने से सिर्फ रंग नहीं बदलता, पानी की प्रकृति भी बदल जाती है. ऐसा पानी ज्यादा अम्लीय हो जाता है, यानी पहले के मुकाबले तेज हो जाता है. जो नदियां कभी कम खनिज वाली और बेहद साफ मानी जाती थीं, अब उनमें मिनरल्स बढ़ गए हैं. इसका असर नदी की तलहटी, आसपास की जमीन और बाढ़ वाले इलाकों तक दिख रहा है. सबसे अहम बात ये है कि ये बदलाव किसी फैक्ट्री, खदान या इंसानी गतिविधि की वजह से नहीं हुए हैं. वैज्ञानिक कहते हैं कि ये सब मौसम में हो रहे लंबे समय के बदलावों का नतीजा है, जिन्हें रोकना आसान नहीं है.

रिसर्च ने कैसे खोली इस बदलाव की परतें

इस पूरे मामले को लेकर हाल ही में Nature Communications Earth and Environment नाम की वैज्ञानिक पत्रिका में एक रिसर्च छपी है. इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने अलास्का के कई इलाकों में नदी के पानी, मिट्टी और परमाफ़्रॉस्ट की स्थिति का अध्ययन किया. जांच में सामने आया कि जैसे ही जमी ज़मीन में मौजूद खनिज बाहर आते हैं, मेटल्स बहुत तेजी से पानी में घुलने लगते हैं. रिसर्च के मुताबिक, ये बदलाव उन इलाकों में भी देखे गए हैं, जहां इंसानी मौजूदगी बेहद कम है. कई जगहों पर लोहे के साथ-साथ दूसरे मेटल्स भी बढ़ते पाए गए, जो ज्यादा मात्रा में जलीय जीवों के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं.

मछलियों से लेकर पूरे इकोसिस्टम पर असर

आर्कटिक की मछलियां ठंडे और साफ पानी की आदी होती हैं. जब पानी में मेटल्स और अम्लता बढ़ती है, तो मछलियों पर इसका सीधा असर पड़ता है. लोहा मछलियों की सांस लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. अगर ये मेटल्स नदी की तलहटी में जमा हो जाएं, तो अंडे देने की जगहें भी खराब हो जाती हैं. नदी में रहने वाले छोटे जीव, जो पूरे फूड चेन की नींव होते हैं, सबसे पहले प्रभावित होते हैं. इसका असर धीरे-धीरे पूरे इकोसिस्टम तक पहुंच जाता है.

इंसानों के लिए भी बढ़ती चिंता

इन नदियों पर सिर्फ जीव-जंतु नहीं, बल्कि कई आदिवासी और ग्रामीण समुदाय भी निर्भर हैं. यही नदियां उनके लिए पीने का पानी, मछली और आने-जाने का रास्ता हैं. भले ही लोहा अपने आप में बहुत ज़हरीला न हो, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसकी मौजूदगी ये बताती है कि दूसरे खतरनाक मेटल्स भी बाहर आ सकते हैं. इन इलाकों में पानी को साफ़ करने की सुविधा बहुत सीमित है. इसलिए पानी की गुणवत्ता में आया बदलाव सीधे लोगों की सेहत से जुड़ जाता है.

गर्मी बढ़ी तो रंग बदलती नदियां बढ़ेंगी

वैज्ञानिक मानते हैं कि अलास्का की ये नारंगी नदी आने वाले समय की चेतावनी है. परमाफ्रॉस्ट पिघलने से जमीन धंसती है, नए जलमार्ग बनते हैं और खनिजों का असर और बढ़ जाता है. गर्मियां लंबी हो रही हैं, बारिश का पैटर्न बदल रहा है और मेटल्स का बहाव तेज़ होता जा रहा है. एक बार ये मेटल्स पानी में पहुंचे, तो ये कार्बन चक्र को भी प्रभावित कर सकते हैं. इसीलिए वैज्ञानिक अब सैटेलाइट तस्वीरों और जमीनी जांच के जरिए ऐसे इलाकों की पहले पहचान करने में लगे हैं.

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