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जब 167 दिन पाकिस्तानी सेना के कब्जे में रहीं खालिदा जिया, 25 साल की बेगम का भयानक समय

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जब 167 दिन पाकिस्तानी सेना के कब्जे में रहीं खालिदा जिया, 25 साल की बेगम का भयानक समय
1971 में पाकिस्तानी सेना के कब्जे में 167 दिन तक रहीं खालिदा जिया.

Khaleda Zia Pakistani Army Captivity in 1971: बांग्लादेश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का 30 दिसंबर 2025 को निधन हो गया. वे बांग्लादेश की सबसे प्रमख पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सर्वेसर्वा थीं. उनका राजनीतिक करियर, एक हादसे से शुरू हुआ और शीर्ष तक पहुंचा. वे तीन बार बांग्लादेश की पीएम बनीं. देश की पहली और दुनिया के किसी भी मुस्लिम देश के इतिहास में दूसरी पीएम बनी थीं. उन्होंने 1991 से 1996 और फिर 2001 से 2006 तक बांग्लादेश का नेतृत्व किया. उनका कार्यकाल प्राकृतिक आपदाओं, आर्थिक चुनौतियों और राजनीतिक अशांति से भरा रहा. उनका पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा. लेकिन सबसे भयावह काल बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समय आया, जब पाकिस्तानी आर्मी ने उन्हें अपने कब्जे में रखा. 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान आर्मी के कब्जे में नजरबंद रहीं और 1981 में पति की हत्या के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. 

खालिदा खानम ‘पुतुल’ का जन्म वर्ष 1945 में ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत के जलपाईगुड़ी में हुआ था, जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल, भारत में स्थित है. वह मूल रूप से एक बंगाली मुस्लिम परिवार से थीं, जिसकी जड़ें वर्तमान बांग्लादेश के फुलगाजी क्षेत्र से जुड़ी थीं. वह अपने पिता इस्कंदर अली मजूमदार और माता तैयबा मजूमदार की पांच संतानों में तीसरे स्थान पर थीं. उनके पिता फेनी के रहने वाले एक चाय व्यवसायी थे, जबकि उनकी मां पश्चिम दिनाजपुर के इताहर क्षेत्र के चांदबारी गांव से थीं. उनके पिता के अनुसार, 1947 में भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार दिनाजपुर शहर आकर बस गया, जो अब बांग्लादेश में है.

15 वर्ष की आयु में जियाउर रहमान से हुआ था विवाह

खालिदा जिया खुद को स्व-शिक्षित मानती थीं. हालांकि कई जगह उन्हें हाईस्कूल तक पढ़ा हुआ माना जाता है, लेकिन इससे जुड़े कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं. प्रारंभिक शिक्षा के दौरान उन्होंने पहले दिनाजपुर मिशनरी स्कूल में पढ़ाई की और बाद में दिनाजपुर गर्ल्स स्कूल में दाखिला लिया. यह भी बताया जाता है कि उन्होंने दिनाजपुर के सुरेन्द्रनाथ कॉलेज में दाखिला लिया था, लेकिन इसका भी कोई रिकॉर्ड नहीं है. वर्ष 1960 में 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह जियाउर रहमान से हुआ, जो उस समय पाकिस्तान सेना में कप्तान के पद पर कार्यरत थे. विवाह के बाद उन्होंने अपने पति के नाम को उपनाम के रूप में अपनाते हुए अपना नाम खालिदा जिया कर लिया. यहां तक सबकुछ सही चल रहा था.

भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश की आजादी की भूमिका बन गई

1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया. युद्ध में भाग लेने के लिए, खालिदा अपने पति के साथ रहने के लिए पश्चिम पाकिस्तान चली गईं. उसी वर्ष भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जियाउर रहमान सेना अधिकारी के रूप में तैनात थे. हालांकि पाकिस्तान को उस युद्ध में करारी हार झेलनी पड़ी. मार्च 1969 में यह दंपती दोबारा पूर्वी पाकिस्तान लौट आया. बाद में सेना में तैनाती के कारण परिवार को चिटगांव स्थानांतरित होना पड़ा. और फिर आया पाकिस्तान का चुनाव, जिसमें शेख मुजीबुर रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में ऐतिहासिक जीत दर्ज की. लेकिन पश्चिमी पाकिस्तान इस नेतृत्व के खिलाफ था. उसने मुजीबुर रहमान को नजरबंद कर लिया और सत्ता हस्तांतरण से मना कर दिया. परिणामस्वरूप बांग्लादेश में आजादी की जंग छिड़ गई.

पाकिस्तान के कब्जे में कैसे आई थीं खालिदा?

1971 में बांग्लादेश में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी. भारत की मदद से मुक्ति संग्राम के योद्धा पाकिस्तानी सेना की चूलें हिला रहे थे. इसी दौरान, खालिदा जिया 16 मई 1971 को चिटगांव से ढाका पहुंचीं. वह अपने दो बच्चों तारिक रहमान ((पिनो) और अराफात रहमान (कोको) तथा कर्नल महफूज की पत्नी के साथ एक लॉन्च के जरिए शाम के समय नारायणगंज पहुंचीं. वहां से उनकी बड़ी बहन खुर्शीद जहां और बहनोई मोजम्मेल हक उन्हें जीप से ढाका के खिलगांव स्थित अपने घर ले गए. खुफिया गतिविधियों के कारण महज 10 दिनों के भीतर यह खबर फैल गई. 26 मई को उनके बहनोई मोजम्मेल हक को पता चला कि पाकिस्तानी सैनिकों को खालिदा जिया के ठिकाने की जानकारी मिल चुकी है. इसके बाद उनका छिपना शुरू हो गया.

शरण देने से डरते थे लोग

एक घर से दूसरे घर तक उन्हें लगातार स्थान बदलना पड़ा, क्योंकि ‘बेगम’ को शरण देने से लोग उत्पीड़न के डर से कतराने लगे थे. 28 मई को मोजम्मेल हक ने खालिदा जिया और उनके दोनों बेटों पिनो और कोको को एक अन्य स्थान पर पहुंचाया और फिर 3 जून को वहां से भी हटाया गया. इसके बाद एक अज्ञात पते से जिया की पत्नी भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के उपनिदेशक एस.के. अब्दुल्ला के सिद्धेश्वरी स्थित घर में रहने लगीं. खालिदा जिया उसी घर में रहीं. लेकिन पाकिस्तानी सेना को उनकी भनक लग गई.

2 जुलाई से 16 दिसंबर तक पाक सेना के कब्जे नजरबंद थीं खालिदा

2 जुलाई की सुबह पाकिस्तानी कब्जा बलों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के बाद खालिदा जिया और उनके दोनों बच्चों को पुराने संसद भवन के एक कमरे में रखा गया. बाद में उन्हें ढाका कैंटोनमेंट के भीतर स्थित एक घर में ले जाया गया, जहां वह दिसंबर 1971 के पहले सप्ताह तक नजरबंद रहीं. 16 दिसंबर की सुबह उन्हें रिहा किया गया. रिहाई के बाद उसी सुबह उन्हें जीप से पुराना पल्टन स्थित उनके रिश्ते के चाचा के घर ले जाया गया.

जियाउर रहमान ने पाकिस्तानी सेना के अधिकारी को लिखा था पत्र

21 अगस्त 1971 को जियाउर रहमान ने अपनी पत्नी खालिदा जिया के बारे में एक पत्र लिखा. उस समय पूर्वी कमान के जीएचक्यू, ढाका में पाकिस्तानी सेना के मेजर जनरल जमशेद तैनात थे और बेगम जिया उनकी निगरानी में हिरासत में थीं. जब जियाउर रहमान पश्चिम पाकिस्तान की पंजाब रेजिमेंट में कार्यरत थे, तब जमशेद उनके कमांडर रह चुके थे. जिया का यह पत्र ‘कब्जे वाले’ इलाके से शफायत जमील द्वारा भेजा गया और मेजर जनरल जमशेद तक पहुंचा.

रिहा होने के बाद कोमिला कैंटोनमेंट गईं

पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद खालिदा जिया और उनके दोनों बेटों को विमान से ढाका से सिलहट के शमशेरनगर ले जाया गया. जियाउर रहमान के अनुरोध पर जनरल अरोड़ा ने इसकी व्यवस्था की थी. मेजर चौधरी खालेकुज्जमान और कैप्टन ओली अहमद ने शमशेरनगर हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया और उन्हें एक स्थानीय रेस्ट हाउस ले गए. शमशेरनगर में थोड़े समय रुकने के बाद खालिदा जिया अपने दोनों बेटों के साथ जियाउर रहमान के पास कोमिला कैंटोनमेंट चली गईं.

हुसैन मुहम्मद इरशाद से लड़कर बांग्लादेश की पीएम बनीं

बांग्लादेश की आजादी के बाद शेख मुजीब उर रहमान देश के पहले पीएम बने. हालांकि उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चला, 15 अगस्त 1975 को उनकी पूरे परिवार सहित हत्या कर दी गई, सिवाय शेख हसीना और उनकी बहन के, जो उस वक्त देश में नहीं थीं. इसके बाद जियाउर रहमान ने 21 अप्रैल 1977 को देश की कमान संभाली, लेकिन उनकी भी 30 मई 1981 को हत्या कर दी गई. इसके बाद 1982 में सैन्य शासक हुसैन मुहम्मद इरशाद ने बांग्लादेश को हांकने की कोशिश की, लेकिन खालिदा जिया ने भी संघर्ष का रास्ता चुना और देश की सत्ता पाकर ही चैन लिया.

खालिदा का कार्यकाल कैसा रहा?

खालिदा जिया के प्रधानमंत्री कार्यकाल (1991–96 और 2001–06) को बांग्लादेश के लिए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से भरा दौर माना जाता है. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उद्योगों के निजीकरण, निजी निवेश को बढ़ावा देने और शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर जोर दिया, साथ ही महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों के विस्तार की कोशिश की. हालांकि 1991 के विनाशकारी चक्रवात, जिसमें एक लाख से अधिक लोगों की जान गई, ने उनकी सरकार के प्रयासों को गंभीर रूप से प्रभावित किया. 1996 में भारी बहुमत से जीत के बावजूद विपक्षी बहिष्कार और राजनीतिक अस्थिरता के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. 2001 में सत्ता में वापसी करते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म करने का वादा किया, लेकिन दूसरा कार्यकाल भी इन मुद्दों से जूझता रहा. 

सत्ता छोड़ने के बाद शुरू हुआ बुरा समय

2006 में उन्होंने पद छोड़ा और सत्ता एक कार्यवाहक सरकार को सौंप दी, जिससे उनके प्रधानमंत्री काल का अंत हुआ. 2008 में सत्ता परिवर्तन के बाद वर्षों के भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू हुई. 2018 में उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों में सजा सुनाई गई, जिसे उन्होंने राजनीतिक प्रतिशोध बताया. हालांकि स्वास्थ्य कारणों से बाद में उन्हें अस्पताल और फिर घर में नजरबंदी में रखा गया. खराब स्वास्थ्य के चलते 2020 में उन्हें अस्थायी रूप से रिहा किया गया. आखिरकार, 2014 में शेख हसीना सरकार गिरने के बाद उन्हें सशर्त रिहाई दी गई और नवंबर 2024 में भ्रष्टाचार के मामले में पूरी तरह बरी कर दिया गया. 

मृत्यु से पहले बेटे से हुई मुलाकात

पिछले महीने 23 नवंबर को उनकी हालत खराब होने लगी. जिसके बाद उन्हें ढाका के एवरकेयर अस्पताल में भर्ती करवाया गया, 11 दिसंबर को उनकी स्थिति और भी खराब हो गई, जिसके बाद उन्हें वेंटिलेटर पर भी रखा गया. उनके इलाज के लिए कतर में एक जहाज को तैयार रखा गया था, ताकि स्थिति बिगड़ने पर उन्हें लंदन एयरलिफ्ट किया जा सके. हालांकि उनकी निगरानी में लगे मेडिकल बोर्ड ने हालत बिगड़ने के बावजूद ऐसा करने से मना कर दिया. आखिरकार, 30 दिसंबर 2025 को सुबह 6 बजे के बाद ढाका के उसी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. हालांकि उनकी मृत्यु से पहले उनके बेटे तारिक रहमान की बांग्लादेश वापसी हो गई थी. 25 दिसंबर को वे 17 साल के निर्वासन को खत्म कर ढाका में लैंड हुए और अपनी मां से हॉस्पिटल में मुलाकात की. फिलहाल, बांग्लादेश हिंसा में झुलस रहा है, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में बीएनपी की सत्ता में वापसी की उम्मीदें उनके समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों- दोनों को नजर आ रही है, जिसकी जिम्मेदारी तारिक रहमान पर ही है.

संदर्भ: माहाफुजा उल्लाह की प्रेसिडेंट जिया ऑफ बांग्लादेश: ए पॉलिटिकल बायोग्राफी । बांग्लादेश प्रतिदिन – खालिदा जिया: अडिग नेतृत्व की प्रतीकखालिदा – मोहिउद्दीन अहमद । बीएसएस की मुक्ति संग्राम में खालिदा जिया की भूमिका: न्यूज फ्लैश । उल्लाह और महफूज की बेगम खालिदा जिया: हर लाइफ, हर स्टोरी । बांग्लापीडिया- जिया, बेगम खालिदा । बांग्ला आउटलुक इंग्लिश । द डेली स्टार- खालिदा की जीवनी का अनावरण । द डेली स्टार के लिए लिटन औक शखावत की मिशन वॉर हीरो एलिमिनेशन । bdnews24.com । ढाका ट्रिब्यून । बेगम खालिदा जिया: जीवन और संघर्ष – महफूज उल्लाह । विकिपीडिया ।

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