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Home World ईरान युद्ध पर पाकिस्तान-चीन का 5 पॉइंट पीस प्लान, मकसद- शांति है या चल रहे शातिर दांव?

ईरान युद्ध पर पाकिस्तान-चीन का 5 पॉइंट पीस प्लान, मकसद- शांति है या चल रहे शातिर दांव?

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ईरान युद्ध पर पाकिस्तान-चीन का 5 पॉइंट पीस प्लान, मकसद- शांति है या चल रहे शातिर दांव?

Iran War: ईरान युद्ध को रोकने के लिए कई पक्षों के बीच पहल चल रही है. इसी के मद्देनजर चीन और पाकिस्तान ने मिडिल ईस्ट में चल रहे इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए पांच सूत्री प्रस्ताव रखा है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार और चीनी फॉरेन मिनिस्टर वांग यी ने मंगलवार को बैठक के बाद खाड़ी क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता की बहाली और होर्मुज जलडमरूमध्य से पोतों के सुरक्षित आवागमन का आह्वान किया. पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री एक दिवसीय बीजिंग दौरे पर आए थे. यह पहल सिर्फ शांति प्रस्ताव नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में एक नए भू-राजनीतिक प्रयास के रूप में देखी जा रही है.

इस पहल के पांच प्रमुख बिंदुओं को विस्तार से समझिए:

1. तत्काल युद्धविराम और मानवीय सहायता पर जोर

इस पहल का पहला और सबसे अहम बिंदु है- तुरंत युद्धविराम. दोनों देशों ने संघर्ष प्रभावित इलाकों में हिंसा रोकने और आम नागरिकों तक जरूरी मानवीय सहायता पहुंचाने की मांग की है. इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए सबसे पहले जमीनी हालात को शांत करना जरूरी है.

2. संप्रभुता के सम्मान के साथ शांति वार्ता की शुरुआत

दूसरा बिंदु कहता है कि सभी पक्षों को जल्द से जल्द शांति वार्ता शुरू करनी चाहिए, जिसमें ईरान और खाड़ी देशों की संप्रभुता का पूरा सम्मान हो. इसका मतलब है कि बाहरी दबाव या सैन्य हस्तक्षेप के बजाय, क्षेत्रीय देशों को खुद बातचीत के जरिए समाधान निकालने का मौका दिया जाए.

3. कूटनीति को प्राथमिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन

तीसरे बिंदु में स्पष्ट किया गया है कि बल प्रयोग के बजाय कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. संघर्ष में शामिल पक्षों से अपील की गई कि वे आम नागरिकों और गैर-सैन्य लक्ष्यों पर हमले तुरंत बंद करें. इसके साथ ही ऊर्जा संयंत्र, बिजली केंद्र, विलवणीकरण प्लांट (डिसेलिनेशन प्लांट) और परमाणु ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करें और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन करें.

4. अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों की सुरक्षा (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज)

चौथे बिंदु में सबसे ज्यादा रणनीतिक महत्व है. ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा. यह समुद्री मार्ग दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा संभालता है. पाकिस्तान और चीन चाहते हैं कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता न फैले, क्योंकि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और उनकी अपनी ऊर्जा जरूरतें प्रभावित हो सकती हैं.

5. संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मजबूत करना

पांचवां और अंतिम बिंदु है- संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मजबूत करना. दोनों देश चाहते हैं कि पश्चिम एशिया में शांति प्रक्रिया का नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र के हाथ में हो, न कि पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाले गठबंधनों के पास. यह कदम वैश्विक शक्ति संतुलन में पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

क्या है इस पहल के पीछे असली रणनीति?

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, यह पहल सिर्फ शांति स्थापित करने के लिए नहीं बल्कि ‘नई भू-राजनीतिक स्थिति’ बनाने का प्रयास है. चीन इस मौके का इस्तेमाल ऊर्जा गलियारों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए करना चाहता है.

पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच एक मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है. 

इसके अलावा, यह भी आशंका जताई जा रही है कि पाकिस्तान अपने झंडे के तहत तेल ढोने वाले जहाजों को ‘रेंट’ पर देकर क्षेत्र में चीन की नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाने में मदद कर सकता है, जिससे भारत के लिए समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ सकती हैं.

पाकिस्तान-चीन की यह पहल ‘शांति’ के नाम पर एक बड़े रणनीतिक खेल का हिस्सा नजर आती है. यह दोनों देशों के लिए कम लागत में वैश्विक प्रभाव बढ़ाने का जरिया हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है.

चार देशों के बीच बातचीत का ब्यौरा पेश किया गया

बीजिंग में हुई बैठक में दोनों नेताओं ने खाड़ी एवं पश्चिम एशिया क्षेत्र की स्थिति की समीक्षा की. इस दौरान डार ने वांग को तुर्किये, मिस्र और सऊदी अरब के विदेश मंत्रियों के साथ हाल में हुई अपनी उस बातचीत के बारे में जानकारी दी जिसका उद्देश्य अमेरिका एवं ईरान के बीच जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए वार्ता को बढ़ावा देना था. 

इससे पहले, पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने कहा था कि इस्लामाबाद और बीजिंग के बीच रणनीतिक साझेदारी है, जो क्षेत्रीय विकास और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ‘घनिष्ठ समन्वय और नियमित परामर्श’ से परिभाषित होती है. चीन के लिए रवाना होने से पहले डार ने इस्लामाबाद में सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ एक चतुष्पक्षीय बैठक की. इस दौरान डार वांग से टेलीफोन पर बातचीत और पाकिस्तान में चीन के राजदूत के साथ बैठकों के माध्यम से चीन से संपर्क में रहे.

चीन खुद को पीस मेकर के रूप में दिखाना चाहता है!

इस युद्ध में चीन खुद को पीस डील कराने वाले के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है. सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब इस्लामाबाद में चारों देशों के बीच चर्चा चल रही थी, उसी दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी चीनी दूतावास में क्षेत्रीय शांति पर चर्चा के लिए चीनी दूतावास में थे. इसी रिपोर्ट में कार्नेगी एंडॉमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ फेलो टोंग झाओ के हवाले से सीएनएन ने कहा कि चीन खुद को राजनयिक मध्यस्थता को प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहा है. वह दुनिया को एक विरोधाभास दिखाना चाहता है, जहां संयुक्त राज्य अमेरिका अशांति और अराजकता पैदा करता है, वहीं चीन खुद को तनाव कम करने, स्थिरता और शांति की शक्ति के रूप में स्थापित करता है.

चीन ने दुनिया के अन्य हिस्सों में चल रहे युद्ध में भी खुद को शांति स्थापित करवाने वाले देश के रूप में पेश किया था. उसने पिछले साल कंबोडिया और थाईलैंड के बीच शांति करवाने के लिए बातचीत की मेजबानी की थी. इसके अलावा रूस और यूक्रेन युद्ध में भी चीन ने अब तक कई बार सुझाव पेश किए हैं. हालांकि, इन सभी प्रयास का नतीजा अब तक सिफर ही रहा है. हालांकि, चीन खुद को भले ही पीस डील बनाने वाले के रूप में पेश कर रहा हो, लेकिन पिछले हफ्ते जब चीन के मिडिल ईस्ट के दूत झाई जून से पूछा गया कि किन परिस्थितियों में युद्धविराम संभव हो सकता है, तो उन्होंने अमेरिका और इजराइल का स्पष्ट रूप से जिक्र करते हुए कहा, ‘जिसने घंटी बांधी है, उसे ही उसे खोलना होगा.’ यानी इस युद्ध को अमेरिका और इजरायल ही रोक सकते हैं.

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युद्ध विराम पर ईरान का रुख क्या है?

ईरान ने अभी तक पेश किए गए किसी भी पीस प्लान को स्वीकार नहीं किया है. मंगलवार को राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान युद्ध रोकने के लिए तैयार है, लेकिन इसके बदले में उसे अमेरिका के द्वारा दोबारा युद्ध या हमले की गारंटी देनी होगी. वहीं विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान अगले छह महीने तक युद्ध करने के लिए तैयार है. हालांकि, इन बयानो के बाद उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ से सीधी बातचीत को स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने ईरान के साथ चल रहे इस संघर्ष को समाप्त करने को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है.

भले ही इन दोनों नेताओं ने कुछ ऐसे बयान जारी किए हों, लेकिन ईरान में असली सत्ता सुप्रीम लीडर के हाथों में ही है. फिलहाल सर्वोच्च नेता मोजतबा अली खामेनेई प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आए हैं, लेकिन पर्दे के पीछे है उनके निर्णयों के बारे में बयान आते रहते हैं. असली फैसला लेने का निर्णय खामेनेई और आईआरजीसी के हाथ में ही है. जब तक इन दोनों की तरफ से कोई बयान नहीं आता तब तक किसी तरह के युद्ध विराम पर बात करना बेमानी होगी.

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चीन ने पहली बार कबूला- तीन जहाज होर्मुज क्रॉस करके आए

इस मुलाकात से पहले चीन ने कहा कि तेल लेकर आ रहे उसके तीन जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर चुके हैं. उसने इसे संभव बनाने और इसमें समन्वय के लिए संबंधित पक्षों को धन्यवाद दिया. चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने बीजिंग में एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि ईरान खाड़ी से जलडमरूमध्य पार करने वाले तेल के जहाजों की आवाजाही को नियंत्रित कर रहा है. माओ ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास का जलक्षेत्र अंतरराष्ट्रीय माल और ऊर्जा व्यापार का एक महत्वपूर्ण मार्ग है. उन्होंने कहा कि चीन खाड़ी में शांति और स्थिरता बहाल करने के लिए शत्रुता तत्काल समाप्त करने का आह्वान करता है.

अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन वर्षों से ईरानी तेल का एक बड़ा आयातक रहा है. चीन ने अपने जहाजों के होर्मुज जलडमरूमध्य को पार करने के बारे में पहली बार बात की. ऐसी खबरें हैं कि ईरान घनिष्ठ रणनीतिक संबंधों को देखते हुए चीनी जहाजों को जलडमरूमध्य पार करने दे रहा है. अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद से, चीन सभी देशों से सैन्य अभियान तुरंत रोकने का आह्वान कर रहा है.

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अनन्त नारायण शुक्ल प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट क्रिएटर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में करीब दो वर्षों का अनुभव है. वर्तमान में उनका मुख्य फोकस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों, वैश्विक भू-राजनीति (ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स), रक्षा नीति, कूटनीति और विश्व राजनीति से जुड़े विषयों पर है. वे दुनिया भर में घट रही महत्वपूर्ण घटनाओं को गहरी रिसर्च और तथ्यात्मक विश्लेषण के साथ पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं. अनन्त मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, वैश्विक सुरक्षा, रक्षा रणनीतियों, विदेश नीति, भारत के पड़ोसी देशों से जुड़े घटनाक्रम और विश्व स्तर पर भारत की भूमिका जैसे विषयों को कवर करते हैं. इजरायल-ईरान संघर्ष, अमेरिका की विदेश नीति, परमाणु सुरक्षा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के हालात, नेपाल-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे और वैश्विक कूटनीतिक घटनाक्रम पर उनकी विशेष पकड़ है. इसके अलावा वे अंतरराष्ट्रीय आपदाओं, विदेशों में बसे भारतीयों और वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते प्रभाव से जुड़ी खबरों पर भी नियमित रूप से लिखते हैं. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में उनकी गहरी रुचि रही है, जिसने उन्हें वैश्विक मामलों और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया. यही वजह है कि उनके लेखों में विषय की गहराई, एक्सपर्ट्स की राय के साथ उनके कमेंट्स, तथ्यों की सटीकता और व्यापक संदर्भ देखने को मिलता है. बदलते वैश्विक परिदृश्य पर उनकी पैनी नजर रहती है, जिससे वे पाठकों तक समय पर विश्वसनीय और विश्लेषणात्मक जानकारी पहुंचाते हैं. अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है. इसके साथ ही वह कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं. उत्तर प्रदेश की कालीन नगरी- भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं. तथ्यों की पुष्टि और सटीक जानकारी को वे अपनी पत्रकारिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं. उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को विश्व घटनाक्रम की भरोसेमंद, संतुलित और गहन जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो, ताकि वे वैश्विक मुद्दों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
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